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नदियाँ बचेंगी, तभी जीवन बचेगा: सुप्रीम कोर्ट ने फिर दिखाया आईना

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नदियाँ बचेंगी, तभी जीवन बचेगा: सुप्रीम कोर्ट ने फिर दिखाया आईना

आगरा के लिए यमुना केवल एक नदी नहीं है। यह शहर की आत्मा है। यह ब्रज की संस्कृति, आस्था और इतिहास का हिस्सा है। इसके किनारे घाट बने, मंदिर बसे, बस्तियां विकसित हुईं और लोक परंपराओं ने जन्म लिया। ताजमहल भी इसी नदी के किनारे खड़ा होकर सदियों से इसकी कहानी कह रहा है।

नदियाँ बचेंगी, तभी जीवन बचेगा: सुप्रीम कोर्ट ने फिर दिखाया आईना

बृज खंडेलवाल

सुप्रीम कोर्ट ने नदियों को लेकर सरकारों को फिर आईना दिखाया है। यमुना प्रदूषण से शुरू हुई अदालत की स्वतः संज्ञान वाली कार्यवाही अब देश की नदियों में बह रहे सीवेज और प्रदूषण के व्यापक संकट तक पहुंच चुकी है। फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि स्वच्छ पर्यावरण और साफ पानी में जीवन का अधिकार निहित है।
इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तैयार यमुना एक्शन प्लान ने एक और कड़वी तस्वीर सामने रखी है। यमुना बेसिन में रोज करीब 7,999.63 मिलियन लीटर घरेलू सीवेज पैदा होता है। इसमें से लगभग 1,755.80 एमएलडी के उपचार की व्यवस्था अभी भी नहीं है। उत्तर प्रदेश में अकेले शहरी क्षेत्रों का सीवेज ट्रीटमेंट गैप करीब 940 एमएलडी बताया गया है। आगरा और मथुरा भी उन प्रमुख इलाकों में हैं, जहां बड़ी मात्रा में अनुपचारित गंदा पानी यमुना तंत्र में पहुंच रहा है।
पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं, "सवाल अब केवल यह नहीं है कि यमुना कितनी प्रदूषित है। सवाल यह है कि हम नदियों को आखिर कब तक कागजों पर बचाते रहेंगे? क्या हम नदियों के बिना भारत की कल्पना कर सकते हैं?"
नदियाँ केवल बहता हुआ पानी नहीं हैं। वे हमारी सभ्यता, संस्कृति, खेती, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों की जीवनरेखा हैं। गंगा हो, यमुना हो, नर्मदा हो, कावेरी हो या किसी गांव की छोटी नदी, हर नदी अपने साथ जीवन लेकर चलती है।
लेकिन आज हमारी नदियाँ संकट में हैं।
कहीं पानी कम हो रहा है। कहीं नदी का प्राकृतिक प्रवाह रोक दिया गया है। कहीं शहरों का सीवर और उद्योगों का जहरीला पानी नदी में गिर रहा है। कहीं बाढ़ क्षेत्र पर कब्जे हो रहे हैं। कहीं नदी की तलहटी गाद, प्लास्टिक और कचरे से भर रही है।
हमने नदी को जीवित धारा मानने के बजाय कभी नाला और कभी जमीन का टुकड़ा समझ लिया है।
यमुना इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण है।
आगरा के लिए यमुना केवल एक नदी नहीं है। यह शहर की आत्मा है। यह ब्रज की संस्कृति, आस्था और इतिहास का हिस्सा है। इसके किनारे घाट बने, मंदिर बसे, बस्तियां विकसित हुईं और लोक परंपराओं ने जन्म लिया। ताजमहल भी इसी नदी के किनारे खड़ा होकर सदियों से इसकी कहानी कह रहा है।
लेकिन आज ताजमहल के सामने सवाल सिर्फ उसकी खूबसूरती का नहीं है। सवाल उस नदी का है, जिसकी गोद में ताज का प्रतिबिंब दिखाई देता था।
अगर नदी में स्वच्छ और पर्याप्त पानी ही नहीं रहेगा, तो घाटों की सजावट और रोशनी किस काम की?
नदी को सजाने से पहले उसे बचाना होगा।
नदी का मतलब केवल पानी नहीं है। नदी का मतलब है उसका प्राकृतिक प्रवाह, साफ पानी, जीवंत तल और अपना बाढ़ क्षेत्र। नदी को सांस लेने की जगह चाहिए। उसका रास्ता रोककर, उसके किनारे पर कब्जा करके और उसमें गंदा पानी डालकर हम नदी को जिंदा नहीं रख सकते।
यही सवाल रिवर कनेक्ट कैंपेन वर्षों से उठा रहा है।
हमारी मांग साफ है। यमुना की तलहटी से गाद, कचरा और प्रदूषक निकाले जाएं। जरूरत के अनुसार डीसिल्टिंग और ड्रेजिंग हो। सभी नालों को टैप किया जाए। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट कागजों पर नहीं, पूरी क्षमता से जमीन पर चलें। औद्योगिक प्रदूषण पर सख्त निगरानी हो और जिम्मेदारी तय की जाए।
आगरा में यमुना पर बैराज की मांग भी लंबे समय से उठती रही है। यह मुद्दा बार बार सामने आता है, लेकिन फिर फाइलों और आश्वासनों के बीच कहीं खो जाता है। आगरा की जल जरूरतों और यमुना के पर्यावरणीय हितों को साथ रखकर इसका गंभीरता से अध्ययन और निर्णय होना चाहिए।
अब समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकारें नदियों को अलग अलग योजनाओं की नजर से देखना बंद करें।
भारत को एक व्यापक राष्ट्रीय नदी नीति चाहिए।
ऐसी नीति में हर नदी के लिए न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित हो। प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र सुरक्षित हों। सीवर और औद्योगिक प्रदूषण की जिम्मेदारी स्पष्ट हो। भूजल, बांध, बैराज, रेत, जलग्रहण क्षेत्र और नदी किनारे की जमीन को एक समग्र व्यवस्था में देखा जाए।
नदी नीति केवल सरकारी फाइल न बने। इसमें वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, किसानों, मछुआरों, नदी किनारे रहने वाले लोगों और नागरिक संगठनों की भागीदारी हो।
क्योंकि नदी केवल सरकार की नहीं होती। नदी समाज की होती है।
रिवर कनेक्ट अभियान का संकल्प साफ है। नदी बचेगी तो खेत बचेंगे। खेत बचेंगे तो किसान बचेंगे। पानी बचेगा तो शहर बचेंगे। नदी बचेगी तो संस्कृति बचेगी।
यमुना को अविरल और निर्मल बनाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। सरकार की जवाबदेही जरूर है, लेकिन समाज की भागीदारी भी जरूरी है।
हमें नदी को नाला बनने से रोकना होगा।
नदी को जमीन बनने से रोकना होगा।
नदी को कूड़ेदान बनने से रोकना होगा।
और सबसे बढ़कर, नदी को फिर से नदी बनाना होगा।
क्योंकि आने वाली पीढ़ियां हमसे पूछेंगी कि जब नदियां मर रही थीं, तब हमने क्या किया था? 

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