हरेन्द्र नारायण सिंह
राप्ती नदी केवल एक जलधारा नहीं है। यह पूर्वांचल की स्मृतियों, भूगोल, कृषि, संस्कृति और सभ्यता को जोड़ने वाली एक जीवंत धारा है। नेपाल के हिमालयी अंचल से निकलकर उत्तर प्रदेश के बलरामपुर, श्रावस्ती, गोरखपुर और देवरिया सहित अनेक क्षेत्रों से गुजरती हुई यह नदी अंततः बरहज के पास घाघरा/सरयू नदी में मिल जाती है। इसके साथ जुड़ी गोर्रा और आमी जैसी धाराएँ इस पूरे भूभाग के प्राकृतिक जलतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं।
प्राचीन बौद्ध और पौराणिक साहित्य में राप्ती को अचिरावती अथवा इरावती के नाम से जाना जाता है। इसके तट पर स्थित श्रावस्ती बौद्ध सभ्यता का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। माना जाता है कि भगवान बुद्ध ने अपने जीवन का लंबा और महत्वपूर्ण समय श्रावस्ती में बिताया। इस दृष्टि से राप्ती का इतिहास केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक इतिहास से भी गहराई से जुड़ा है।
राप्ती का उद्गम नेपाल के लघु हिमालय क्षेत्र में रुकुमकोट के आसपास है। पर्वतीय ढालों से उतरकर यह नेपाल की घाटियों को पार करती हुई भारत में प्रवेश करती है। उत्तर प्रदेश के तराई और पूर्वांचल के मैदानों में पहुँचने के बाद इसका स्वरूप बदलता जाता है। मैदानों में इसकी धाराएँ फैलती हैं, सहायक नदियाँ और नाले इसमें मिलते हैं और बरसात में इसका जलग्रहण क्षेत्र विशाल हो जाता है।
राप्ती गोर्रा नदी और बचपन की नदी स्मृतियाँ :
राप्ती की कथा गोर्रा नदी और उससे जुड़ी छोटी-बड़ी जलधाराओं के बिना अधूरी है। गोरखपुर क्षेत्र में राप्ती और उससे जुड़ी जलधाराओं का स्वरूप स्थानीय भूगोल और लोक स्मृति में अलग अलग नामों से दिखाई देता रहा है। गोर्रा नदी भी इसी जलतंत्र की महत्वपूर्ण कड़ी रही है।
मेरे बचपन की स्मृतियों में राप्ती और गोर्रा नदी की अपनी एक अलग दुनिया है। गोर्रा गाँव के उत्तर तथा राप्ती दक्षिण से बहती है और हमारे गाँव के पास ही संगम हो जाता है ।गाँव जाते समय नाव से गोर्रा नदी पार करना, उसी नाव को राप्ती को पार करना , बरसात के दिनों में बीच धारा में उभरते छोटे छोटे टापू और उनके आसपास के बाग, जहां नाव कुछ देर के लिए ठहर जाती थी , ये केवल बचपन की यादें नहीं, बल्कि उस समय की जीवंत नदी संस्कृति के चित्र हैं।गांव से रुद्रपुर जो लगभग तीन किमी है नाव से पार करना आज भी स्मृतियों में है ।
आज जब उसी भूगोल को देखता हूं तो महसूस होता है कि नदी का स्वरूप कितना बदल गया है।
बथुआ नदी की मौन होती धारा:
गोर्रा नदी से जंगल भुसावल के पास से निकलने वाली बथुआ नदी कभी एक प्राकृतिक जलधारा के रूप में बहती हुई मदनपुर के पास राप्ती में मिलती थी। स्थानीय लोगों के अनुसार, 1990 के दशक में इसके उद्गम क्षेत्र पर बांध बना दिए जाने के बाद इसका प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो गया।
परिणाम यह हुआ कि बथुआ की जीवंत धारा धीरे धीरे सिकुड़ती गई और आज कई स्थानों पर वह नदी के बजाय एक गंदे नाले का रूप ले चुकी है। रुद्रपुर और आसपास के कस्बों का गंदा पानी इसमें आने से इसकी स्थिति और गंभीर हुई है।
यह केवल एक नदी के सूखने की कहानी नहीं है। यह उस प्राकृतिक जल निकास व्यवस्था के टूटने की कहानी है, जो सदियों से वर्षाजल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाती रही थी।यह हमारे आधुनिक विकास की कहानी है ।
रामगढ़ ताल, गोर्रा और आमी का जलतंत्र:
गोरखपुर क्षेत्र में रामगढ़ ताल और उससे जुड़े जलप्रवाह भी इस प्राकृतिक जलतंत्र का हिस्सा हैं। गोर्रा नाला तथा आमी नदी जैसे प्रवाह राप्ती के जलक्षेत्र को प्रभावित करते हैं। आमी नदी कभी इस क्षेत्र की जीवनरेखा मानी जाती थी। बरसात में इसका स्वरूप विशाल और प्रचंड हो जाता था, जबकि गर्मियों में कई स्थानों पर इसका प्रवाह बेहद कमजोर दिखाई देता है।
नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव, अतिक्रमण, प्रदूषण, बांधों और जलनिकासी की बदलती व्यवस्था ने इस पूरे नदी तंत्र को प्रभावित किया है।
राप्ती और गोर्रा के बीच 52 गांवों का जल-संकट:
इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण और आज का ज्वलंत अध्याय राप्ती और गोर्रा नदी के बीच स्थित जलग्रहण क्षेत्र से जुड़ा है।
संलग्न मानचित्र में दिखाई देने वाला यह क्षेत्र लगभग 52 गांवों से संबंधित है। बरसात के मौसम में इन गांवों का वर्षाजल प्राकृतिक ढाल के अनुसार बहते हुए निचले क्षेत्रों की ओर आता है। सचौली पटवनियां ऐसा ही एक महत्वपूर्ण गांव है, जहां वर्षाजल जमा होता है और ऐतिहासिक रूप से गोर्रा के राप्ती में मिलने वाले क्षेत्र से इसका प्राकृतिक जलनिकास जुड़ा रहा है।
समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब दोनों ओर बने बांध और तटबंध प्राकृतिक जलनिकासी को बाधित कर देते हैं। खेतों और गांवों की ओर से आने वाला पानी नदी तक आसानी से नहीं पहुंच पाता। दूसरी ओर, जब राप्ती का जलस्तर खेतों की सतह से अधिक हो जाता है, तब नियामक (Regulator) के माध्यम से पानी को नदी में छोड़ना भी संभव नहीं रहता।
यानी स्थिति कुछ ऐसी बन जाती है पानी खेतों में जमा है, नदी सामने है, लेकिन नदी का जलस्तर खेतों से ऊंचा होने के कारण पानी नदी में नहीं जा सकता।
इसका सबसे सीधा प्रभाव कृषि भूमि पर पड़ता है। सचौली पटवनियां क्षेत्र की कृषि भूमि लंबे समय तक जलभराव की चपेट में आ जाती है। फसलें प्रभावित होती हैं, मिट्टी की उत्पादकता पर असर पड़ता है और किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
समाधान: नियामक (Regulator ) के पास पंपिंग स्टेशन:
इस समस्या का एक व्यावहारिक समाधान सचौली पटवानियाँ स्थिति नियामक ( Regulator) के पास एक आधुनिक पंपिंग स्टेशन की स्थापना हो सकता है।
जब राप्ती का जलस्तर खेतों से नीचे हो, तो रेगुलेटर के माध्यम से पानी प्राकृतिक ढाल से नदी में छोड़ा जा सकता है। लेकिन जब राप्ती का जलस्तर अधिक हो और नियामक ( Regulator) काम न कर सके, तब पंपिंग स्टेशन की सहायता से खेतों और जलग्रहण क्षेत्र में जमा पानी को नियंत्रित रूप से राप्ती में पहुंचाया जा सकता है।
ऐसी व्यवस्था केवल सचौली पटवनियां की कृषि भूमि को जलभराव से बचाने में मदद नहीं करेगी, बल्कि राप्ती और गोर्रा के बीच बसे इन 52 गांवों के लिए एक प्रभावी बाढ़ एवं जलनिकासी प्रबंधन प्रणाली का आधार बन सकती है।
इसके लिए आवश्यक है कि पूरे क्षेत्र का वैज्ञानिक जलनिकासी एवं जलग्रहण सर्वेक्षण कराया जाए, पुराने प्राकृतिक जलमार्गों को चिन्हित किया जाए, अवरुद्ध नालों और धाराओं को पुनर्जीवित किया जाए तथा तटबंधों और नियामकों की वर्तमान क्षमता का तकनीकी परीक्षण किया जाए!
नदी को केवल बाढ़ की समस्या नहीं, जीवन की धारा समझना होगा :
राप्ती, गोर्रा, बथुआ और आमी , ये अलग अलग नाम अवश्य हैं, लेकिन इनके जल का संबंध एक व्यापक प्राकृतिक तंत्र से है। किसी एक धारा को रोकना या उसके प्राकृतिक मार्ग को बदलना केवल उसी नदी को प्रभावित नहीं करता; उसका प्रभाव पूरे जलग्रहण क्षेत्र, खेतों, गांवों और भूजल पर पड़ता है।ग्रीन ट्रिब्यूनल को स्वतः संज्ञान लेकर बथुआ के उद्गम स्थल को खोल देने की आदेश पारित करना चाहिये ।
आज आवश्यकता है कि हम नदियों को केवल बाढ़ आने पर याद न करें। नदी के उद्गम से संगम तक उसके पूरे जलतंत्र को समझना होगा।
राप्ती की धारा में अचिरावती की ऐतिहासिक स्मृति है, गोर्रा में लोकजीवन की यादें हैं, बथुआ में एक खोई हुई नदी की पीड़ा है और आमी में पुनर्जीवन की प्रतीक्षा। सचौली पटवनियां और उसके आसपास के 52 गांव आज हमें यह संदेश दे रहे हैं कि पानी को रोकना ही जल प्रबंधन नहीं है, पानी को उसके प्राकृतिक मार्ग तक सुरक्षित पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है।
यदि सचौली पटवनियां के नियामक क्षेत्र में उचित क्षमता वाला पंपिंग स्टेशन, प्रभावी जलनिकासी व्यवस्था और पुराने जलमार्गों का पुनरुद्धार किया जाता है, तो यह केवल खेतों को डूबने से बचाने की योजना नहीं होगी; यह राप्ती गोर्रा जलतंत्र को समझने और पुनर्जीवित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
नदी को बचाना केवल नदी को बचाना नहीं है।
नदी को बचाना, खेत, गांव, किसान, भूजल, जैव-विविधता और आने वाली पीढ़ियों को बचाना है।
आज जरूरत है कि राप्ती की इस प्रवाहमान कथा को केवल इतिहास के पन्नों में न रहने दिया जाए, बल्कि उसके प्राकृतिक प्रवाह को फिर से जीवन दिया जाए।
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