Your RTI
अभिषेक दुबे
पर्यावरण कार्यकर्ता, नेचर क्लब फाउंडेशन, गोण्डा (उप्र)
गंगा नदी तंत्र में गंगा को जल और जैवविविधता से समृद्ध बनाने वाली सैकड़ों छोटी नदियां भी हैं जो वर्षाजल को इकट्ठा करके आगे ले जाती हैं और भूजल के सोते से पानी प्राप्त करते हुए सालभर सदानीरा होकर बहती हैं। ऐसी नदियां न सिर्फ भूजल को रिचार्ज करती हैं, बल्कि जैवविविधता की भी बड़ी पोषक होती हैं। लेकिन आज ऐसी नदियों के जल प्रवाह और जैवविविधता के सामने एक बड़ा संकट बन चुकी हैं बंधिया जिसे मत्स्य अधिनियम में स्थित इंजन कहा गया है। बड़े मछुआरे अक्सर नदियों के दोनों किनारों को बांस के जाल, प्लास्टिक के मच्छरदानी वाले जाल और बालूध्मिट्टी की बोरियों से बाधित कर देते हैं ताकि एक इलाके की मछलियां इकट्ठा रहें और आसानी से उनका शिकार किया जा सके। ऐसी बंधिया कई बार वर्ष के कई महीने तो कई बार हमेशा के लिए नदी में लगी रहती हैं जिनकी मरम्मत होती रहती है।
ऐसे स्थित इंजन से नदी के जल का प्रवाह भी रुकता है, नदी के विभिन्न प्रजातियों की मछलियां, कछुए, जलीय सांप अपना प्राकृतिक प्रवास और प्रजनन नहीं कर पाते और कई बार ऐसे जालों में कछुए और सांप फंसकर मरते भी रहते हैं। इसके अतरिक्त ऐसी बंधिया से नदी के जल और वनस्पतियों का प्रवाह रुकने से जलकुंभी जमा होती है और बंधिया के स्थान पर धीरे धीरे मिट्टी के जमा होने से नदी भी उथली होने लगती है और लंबे समय में ऐसी बंधिया नदियों को बुरी तरह मारती हैं।
नदियां महज बहता हुआ पानी नहीं हैं, बल्कि एक पूरा संसार हैं जहां विभिन्न वर्ग और प्रजातियों के तमाम जीवजंतु रहते हैं। हर नदी में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची 1 व 2 में संरक्षित कछुए व सांप भी रहते हैं जो बंधिया से न सिर्फ अक्सर मारे जाते हैं बल्कि उनके जीवन में भी बड़ा खलल पड़ता है। वन्यजीवों और उनके पर्यावास में खलल डालने वाला ऐसा कृत्य न सिर्फ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में बल्कि जैवविविधता अधिनियम, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत भी गंभीर अपराध है। परंतु इसके बावजूद नदियों में बंधिया लगाने को मछुआरों का अधिकार मान लिया गया है और वन विभाग भी ऐसे वन्यजीव अपराध को रोकने के लिए कदम नहीं बढ़ाता। एक तरफ सरकार नदियों के पुनरुद्धार की बातें कर रही है तो दूसरी तरफ स्पष्ट नियमों की कमी, विभागों में अपनी समन्वय न होना, नदी की जैवविविधता के प्रति असंवेदनशीलता आदि से नदियों के पुनरुद्धार की सोच को ही ऐसी बंधिया ठेंगा दिखाती नजर आती है।
मत्स्य विभाग के द्वारा हर वर्ष नदियों में मत्स्य आखेट का पट्टा किया जाता है लेकिन उस प्रक्रिया में कछुए, सांपों जैसे वन्य प्राणियों के उस पर्यावास में दखल देने की मछुआरों को एकतरफा अनुमति दे दी जाती है, वन विभाग से कोई सहमति नहीं लिया जाता। नदियों के हितधारकों में सिर्फ मछुआरे व मत्स्य विभाग ही नहीं बल्कि वन विभाग, सिंचाई विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जैवविविधता बोर्ड और प्रकृति प्रेमी भी हैं अतः अन्य सभी हितधारकों की सहमति या सभी के हितों को संतुलित करने वाले स्पष्ट नियम होने भी चाहिए और धरातल पर लागू भी होने चाहिए।
हमने गोण्डा व आसपास के जिलों की हर नदी में ऐसी बंधिया हर कुछ किमी की दूरी पर लगी हुई पाया है और अक्सर हमें ऐसी बंधिया में मजगिधवा सांप (चेकर्ड कीलबैक) व कछुए फंसे हुए जीवित व मृत दोनों अवस्थाओं में मिले हैं। अधिकांश ऐसी बंधिया के स्थान पर नदी मिट्टी के जमाव से पटी हुई मिली है और नदी का प्रवाह बाधित मिला है। हम अक्सर ऐसी बंधिया की शिकायत भी मत्स्य विभाग से करते रहे हैं लेकिन उनके द्वारा लगभग हर बार फर्जी रिपोर्ट लगाकर शिकायतों का निस्तारण कर दिया जाता है, लेकिन धरातल पर कोई कार्यवाही नहीं किया जाता है।
मछुआरा समुदाय के हमेशा से कई स्पष्ट नियम रहे हैं जिनका उनकी पीढ़ियां अपनी स्वेच्छा से पालन करती रही हैं। वे कभी नदी या तालाब में आवश्यकता से अधिक मछली नहीं मारते थे, रात में शिकार नहीं करते थे, नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बाधक नहीं बनते थे, नदी की प्राकृतिक अवस्था का सम्मान और संरक्षण भी करते थे। परंतु आज नदी में मत्स्य आखेट अधिकाधिक फायदा कमाने का जरिया बन गया है। बड़े ठेकेदार नदियों का पट्टा प्राप्त करके सारे नियमों को और नदी के कल्याण को ढेंगा दिखाते हुए मनमाना व्यवहार करते हैं और ऐसी गंभीर समस्या उत्पन्न करते हैं और इससे छोटे मछुआरों के जीवन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
सरकार को सभी स्थित इंजन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाकर नदियों का संरक्षण सुनिश्चित कराना चाहिए और इन निर्देशों को स्पष्ट रूप से मत्स्य आखेट के पट्टे के निर्देशों में दर्ज करने के साथ नदी के सभी हितधारकों के साथ समन्वय को भी सुनिश्चित कराना चाहिए।
Leave a comment