Thinking Point
डॉ. योगेश वाय. सुमठाणे
सहा. प्राध्यापक तथा वैज्ञानिक, वन उत्पाद एवं उपयोग वानिकी महाविद्यालय, बाँदा कृषि एवं प्रायोगिकी विश्वविद्यालय, बाँदा
बुन्देलखण्ड, भारत के मध्य भाग में स्थित एक ऐतिहासिक और भौगोलिक क्षेत्र है जो उतर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 13 जिलों में फैला हुआ है। अपनी पथरीली भूमि, नदियों के कटाव, और विषम जलवायु के लिए जाना जाने वाला यह क्षेत्र सदियों से एक विशिष्ट कृषि परिदृश्य प्रस्तुत करता रहा है। महान दलहनी फसलों (दालें) और तिलहनी फसलों (तेल बीज) के उत्पादन का केंद्र होने के बावजूद, बुन्देलखण्ड की कृषि अक्सर सूखे, बाढ़ और गरीबी जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझती रही है। यह लेख बुन्देलखण्ड की कृषि की वर्तमान स्थिति, औषधीय पौधों का महत्व, इसमें निहित अपार संभावनाओं और किसानों के सामने खड़ी विकट चुनौतियों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
बुन्देलखण्ड क्षेत्र, जिसे ऐतिहासिक रूप से ‘जेजाकभुक्ति के नाम से जाना जाता है, अपनी विशिष्ट भौगोलिक, भूवैज्ञानिक और जलवायु परिस्थितियों के कारण भारतीय कृषि मानचित्र पर एक जटिल किन्तु संभावनाओं से पूर्ण क्षेत्र के रूप में स्थापित है। यह क्षेत्र, जो उत्तर प्रदेश के सात जनपदों (झॉसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, महोबा, बांदा और चित्रकूट) और मध्य प्रदेश के छह जनपदों (दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, सागर और दमोह) में विस्तृत है. वर्तमान में एक कृषि संक्रमण काल से गुजर रहा है। परम्परागत खाद्यान्न कृषि, विशेष रूप से दलहन उत्पादन में अग्रणी होने के बावजूद, यह क्षेत्र निरंतर जल की कमी, मृदा क्षरण और अनिश्चित वर्षा के कारण आर्थिक अस्थिरता का सामना करता रहा है। ऐसी स्थिति में, वन औषधीय पौधों की खेती और संरक्षण एक ऐसे विकल्प के रूप में उभर रहे हैं जो न केवल इस शुष्क भूमि की पारिस्थितिकी के अनुकूल हैं, बल्कि वैश्विक हर्बल बाजार में बढ़ती मांग के कारण अत्यधिक लाभप्रद भी सिद्ध हो सकते हैं।
बुन्देलखण्ड की भौगोलिक संरचना और कृषि-पारिस्थितिकीय आधार
बुन्देलखण्ड की कृषि क्षमता को समझने के लिए इसकी मृदा संरचना और जलवायु के मध्य अंतर्संबंधों का विश्लेषण करना आवश्यक है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से विन्ध्यांचल पर्वतमाला की प्राचीन चट्टानों से निर्मित एक पठारी भूभाग है, जहाँ की भू-आकृति लहरदार और ढालू है। यहाँ की मृदा और जलवायु का संयोजन औषधीय पौधों के लिए एक प्राकृतिक प्रयोगशाला के समान कार्य करता है, जहाँ पौधों में द्वितीयक चयापचय के संश्लेषण हेतु आवश्यक पर्यावरणीय तनाव स्वाभाविक रूप से उपलब्ध होता है।
मृदा का वर्गीकरण और औषधीय उपयुक्तता
बुन्देलखण्ड की मृदा को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता हैः काली मिट्टी और लाल मिट्टी। इन दोनों ही मृदा समूहों की अपनी भौतिक और रासायनिक विशेषताएँ हैं जो विभिन्न औषधीय प्रजातियों के विकास को निर्धारित करती हैं। लाल मृदा समूह, विशेष रूप से राकर और परबा, औषधीय पौधों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि औषधीय पौधों की जड़ें जल भराव के प्रति संवेदनशील होती हैं। राकर मिट्टी की भुरभुरी प्रकृति जड़ों के प्रसार और विकास में सहायक होती है, जो शतावर और सफेद मूसली जैसी कंद वाली फसलों के लिए अनिवार्य है।
जलवायु और पर्यावरणीय चुनौतियाँ
बुन्देलखण्ड की जलवायु अर्ध-शुष्क है, जहाँ तापमान की चरम सीमाएँ देखी जाती हैं। ग्रीष्मकाल में तापमान 45 से 47 अंश तक पहुँच जाता है, जबकि शीतकाल में यह 4 से नीचे गिर सकता है। वार्षिक वर्षा का औसत 60 से 100 सेमी के मध्य रहता है, लेकिन इसका वितरण अत्यधिक अनियमित है। पिछले कुछ दशकों में जलवायु परिवर्तन के कारण सूखे की आवृत्ति में वृद्धि हुई है। उदाहरण के लिए, 2004-05 से 2007-08 के मध्य उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड भाग में मानसून की कमी 25 से बढ़कर 56 प्रतिशत तक पहुँच गई थी, जिससे न केवल खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हुआ बल्कि प्राकृतिक वनों में औषधीय वनस्पतियों का पुनर्जनन भी बाधित हुआ। उच्च तापमान के कारण वाष्पीकरण की दर बढ़ जाती है, जिससे मिट्टी की नमी तेजी से समाप्त होती है। यह स्थिति परम्परागत फसलों के लिए घातक है, लेकिन औषधीय पौधों जैसे गुग्गुल और अश्वगंधा के लिए अनुकूल है, जो शुष्क परिस्थितियों में भी जीवित रहने की क्षमता रखते हैं।
पारंपरिक ज्ञान और नृवंशविज्ञान का महत्व
बुन्देलखण्ड की जनजातियाँ, विशेष रूप से सहरिया, रावत, गॉड और भील, सदियों से वनों में उपलब्ध औषधीय पौधों के मुख्य संरक्षक रहे हैं। उनके पास मौजूद पारंपरिक ज्ञान न केवल रोगों के उपचार के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि आधुनिक फार्मास्युटिकल अनुसंधान के लिए एक आधारभूत डेटाबेस भी प्रदान करता है।
जनजातीय समुदायों की चिकित्सा पद्धतियाँ
झॉसी और ललितपुर जनपदों के दूरस्थ गांवों में किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि स्थानीय वैद्य और जनजातीय मुिखया लगभग 100 से अधिक पादप प्रजातियों का उपयोग 45 से अधिक विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए करते हैं। सहरिया जनजाति में ‘गुरु या ‘जड़ी?-बूटी विशेषज्ञ‘ का पद अत्यंत सम्मानित होता है. जो पौधों की पहचान और उनके औषधीय उपयोग की बारीकियों से परिचित होता है। यह पारंपरिक ज्ञान विशेष रूप से उन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है जहाँ आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं सीमित हैं। हालांकि, अनुसंधान संकेत देते हैं कि यह ज्ञान अब 40 वर्ष से अधिक आयु के लोगों तक ही सीमित होता जा रहा है. और नई पीढ़ी इस विरासत से दूर हो रही है।
प्रमुख औषधीय पौधों की कृषि-आर्थिकीः सम्भावनायें एवं लाभ
बुन्देलखण्ड के किसानों के लिए औषधीय पौधों की खेती एक आर्थिक ‘गेम चेंजर सिद्ध हो सकती है। परम्परागत फसलों की तुलना में ये फसलें कम पानी और कम उर्वरक में अधिक लाभप्रदान करती हैं, साथ ही इनमें नीलगाय और अन्ना पशुओं द्वारा नुकसान पहुँचाने का जोखिम भी कम होता है।
अश्वगंधा
अश्वगंधा बुन्देलखण्ड के लिए सबसे उपयुक्त औषधीय फसलों में से एक है। इसकी खेती मुख्य रूप से इसकी जड़ों के लिए की जाती है, जिनमें ‘विदानोलाइड्स‘जैसे सक्रिय तत्व होते हैं।
खेती की विधिः अश्वगंधा को खरीफ की फसल के रूप में वर्षा ऋतु के प्रारंभ में बोया जाता है। इसे 25-32 डिग्री सेल्सियस तापमान और 50-70 प्रतिशत आर्द्रता की आवश्यकता होती है। इसकी खेती के लिए 10-15 टन सड़ी गोबर की खाद या 5 टन वर्मी कंपोस्ट पर्याप्त होता है।
आर्थिक विश्लेषणः अश्वगंधा की खेती से प्रति हेक्टेयर लगभग 95,000 रुपये की शुद्ध आय प्राप्त की जा सकती है। वैश्विक स्तर पर अश्वगंधा की मांग 9.3ः की वार्षिक दर से बढ़ रही है, और 2034 तक इसका बाजार 1.86 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
औषधीय गुणः यह एक शक्तिशाली एडाप्टोजेन है जो कोर्टिसोल के स्तर को कम करके तनाव और चिंता को नियंत्रित करता है। यह प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने और कैंसर कोशिकाओं के विकास को रोकने में भी सहायक पाया गया है।
सफेद मूसली
सफेद मूसली को दिव्य औषधि‘ माना जाता है और यह बुन्देलखण्ड के शुष्क क्षेत्रों में स्वाभाविक रूप से पाई जाती है।
लाभप्रदताः औषधीय फसलों में सफेद मूसली सबसे अधिक लाभ देने वाली फसल है। इसकी खेती की लागत हालांकि अधिक (लगभग 3.12 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर) है, लेकिन सरकार इस पर 20% तक की सब्सिडी प्रदान करती है, जिससे किसानों का जोखिम कम हो जाता है।
बाजार क्षमताः इसकी जड़ों का उपयोग टॉनिक और कामोत्तेजक दवाओं में किया जाता है, जिसकी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारी मांग है।
लेमनग्रास और पामारोजा
बुन्देलखण्ड की बंजर और नमक प्रभावित भूमि के लिए सुगंधित घास जैसे लेमनग्रास और पामारोजा एक उत्कृष्ट विकल्प हैं। ये फसलें एक बार लगाने के बाद 4-5 वर्षों तक उत्पादन देती हैं और इन्हें बहुत कम सिंचाई की आवश्यकता होती है।
बुन्देलखण्ड में कृषि सम्बन्धी चुनौतियाँ और बाधाएं
अपार संभावनाओं के बावजूद, बुन्देलखण्ड में औषधीय पौधों के क्षेत्र का पूर्ण विकास नहीं हो पाया है। इसके पीछे कई संरचनात्मक, तकनीकी और आर्थिक कारण उत्तरदायी हैं।
जल संकट और मृदा स्वास्थ्य का क्षरण
बुन्देलखण्ड की कृषि का सबसे बड़ा अवरोध जल की उपलब्धता है। क्षेत्र का 52% कृषि क्षेत्र पूरी तरह से वर्षा पर निर्भर है। भू-जल स्तर के निरंतर गिरने से सिंचाई की लागत बढ़ गई है। इसके अतिरिक्त, मृदा में सल्फर, जिंक और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की भारी कमी देखी गई है, जो औषधीय पौधों की सक्रिय सामग्री की गुणवत्ता को प्रभावित करती है।
अन्ना प्रथा और सामाजिक चुनौतियां
‘अन्ना प्रथा‘ या लावारिस पशुओं की समस्या बुन्देलखण्ड की एक अनूठी चुनौती है। खरीफ की फसल के बाद किसान अपने पशुओं को खुला छोड़ देते हैं. जो खेतों में खड़ी फसलों को नष्ट कर देते हैं। हालांकि औषधीय पौधे कड़वे या अरुचिकर होने के कारण पशु कम खाते हैं, फिर भी पशुओं द्वारा खुरों से पौधों को कुचलना एक बड़ी समस्या बनी हुई है।
तकनीकी कौशल और गुणवतापूर्ण सामग्री का अभाव
किसानों के पास औषधीय पौधों की पहचान, वैज्ञानिक खेती और फसल कटाई के बाद के प्रबंधन के लिए आवश्यक तकनीकी कौशल की कमी है।
1. रोपण सामग्रीः गुणवत्तापूर्ण बीजों और पौध की अनुपलब्धता एक मुख्य समस्या है। किसान अक्सर स्थानीय स्तर पर उपलब्ध घटिया गुणवत्ता वाले बीजों का उपयोग करते हैं. जिससे उत्पाद की अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं हो पाती।
2. प्रसंस्करण इकाइयाँः बुन्देलखण्ड में प्रसंस्करण सुविधाओं का अभाव है। अधिकांश किसान अपने उत्पाद को कच्ची अवस्था में ही बेच देते हैं. जिससे उन्हें उचित मूल्य नहीं मिल पाता। ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूदा आसवन इकाइयाँ पुरानी तकनीक पर आधारित हैं और ऊर्जा की दृष्टि से अक्षम हैं।
विपणन प्रणाली और अवैध व्यापार का संकट
औषधीय पौधों का विपणन तंत्र अत्यधिक असंगठित है. जहाँ बिचैलियों का बोलबाला है। यह स्थिति न केवल किसानों के शोषण का कारण बनती है, बल्कि वनों से अवैध संग्रहण और तस्करी को भी बढ़ावा देती है।
तस्करी और पारिस्थितिकीय प्रभाव
वैश्विक बाजार में जड़ी-बूटियों की बढ़ती कीमतों ने बुन्देलखण्ड के वनों में एक संगठित अवैध नेटवर्क को जन्म दिया है। पलाश के फूलों, गुग्गुल के रेजिन और सर्पगंधा की जड़ों की तस्करी पड़ोसी राज्यों और यहाँ तक कि अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं (जैसे नेपाल और चीन) तक होने की खबरें मिलती रही हैं।
तस्करी का स्वरूपः स्थानीय संग्रहणकर्ता, जो अक्सर अत्यंत निर्धन होते हैं, बिचैलियों के माध्यम से बहुत कम कीमत पर ये उत्पाद बेचते हैं। ये उत्पाद बाद में बड़े आपराधिक नेटवर्क के माध्यम से फार्मास्युटिकल और कॉस्मेटिक कंपनियों तक पहुँचते हैं।
पारिस्थितिकीय क्षतिः गुग्गुल जैसे पौधों से रेजिन निकालने के लिए तांबे के सल्फेट और एसिड का उपयोग किया जाता है, जिससे पौधा कुछ ही समय में सूख जाता है। वनों से अनियंत्रित और अवैज्ञानिक निष्कर्षण के कारण कई प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं। वन विभाग द्वारा की जाने वाली छापेमारी में अक्सर लाखों रुपये के अवैध वन उत्पाद जब्त किए जाते हैं, लेकिन भौगोलिक दुर्गमता और सीमावर्ती क्षेत्रों में ढीली सुरक्षा के कारण यह तस्करी निरंतर जारी है।
बाजार की जानकारी का अभाव
किसानों को वर्तमान मंडी भाव, अंतर्राष्ट्रीय मांग और खरीदारों के बारे में जानकारी नहीं मिल पाती है। व्यापार का कोई निश्चित नियामक ढांचा न होने के कारण व्यापारियों द्वारा मूल्य निर्धारण में मनमानी की जाती है।
सरकारी नीतियां और संस्थागत सहयोग की भूमिका
औषधीय पौधों के क्षेत्र को संगठित करने के लिए राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड और विभिन्न राज्य स्तरीय बोर्ड महत्वपूर्ण प्रयास कर रहे हैं। इन प्रयासों का मुख्य उद्देश्य खेती को बढ़ावा देना, वनों का संरक्षण करना और किसानों को बाजार से जोडना है।
वित्तीय सहायता और सब्सिडी कार्यक्रम
मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकारों ने औषधीय खेती के लिए आकर्षक सब्सिडी योजनाएं शुरू की हैं। आयुष एवं सुगंधित फसल क्षेत्र विस्तार योजना के तहत 20 से 50 प्रतिशत तक का अनुदान प्रदान किया जा रहा है।
संरक्षण और संवर्धन हेतु वैज्ञानिक रणनीतियाँ
औषधीय पौधों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए केवल खेती पर्याप्त नहीं है, बल्कि वनों में मौजूद प्राकृतिक जर्मप्लाज्म का संरक्षण भी अनिवार्य है।
इन-सिटू और एक्स-सिटू संरक्षण
गुग्गुल जैसी गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए इन-सिटू संरक्षण के तहत उनके प्राकृतिक आवासों को ‘औषधीय पादप संरक्षण और विकास क्षेत्रों के रूप में घोषित किया जा रहा है। वहीं एक्स-सिटू‘ संरक्षण के तहत वनस्पति उद्यानों और ऊतक संवर्धन प्रयोगशालाओं में इन पौधों का संवर्धन किया जा रहा है।
ऊतक संवर्धनः यह तकनीक गुग्गुल और सर्पगंधा जैसी प्रजातियों के लिए वरदान है जिनकी बीज अंकुरण दर बहुत कम होती है। प्रयोगशाला में विकसित स्वस्थ पौधो को बाद में वनों या किसानों के खेतों में प्रत्यारोपित किया जा सकता है।
वैज्ञानिक टैपिंग तकनीकः गुग्गुल से रेजिन निकालने के लिए ‘मिची गोलज चाकू और एथेफोन जैसे रसायनों का संतुलित उपयोग करने की सलाह दी जाती है ताकि पौधे की मृत्यु न हो।
मृदा और जल संरक्षण तकनीकें
बुन्देलखण्ड के ढालू क्षेत्रों में स्टेगर्ड ट्रेचेज बनाना और ‘कंटूर बंडिंग‘ करना मृदा क्षरण को रोकने के प्रभावी तरीके हैं। ये गड्ढे वर्षा जल को संचित करते हैं जिससे पौधों को लंबे समय तक नमी मिलती रहती है और भू-जल पुनर्भरण में सहायता मिलती है।
सारः
बुन्देलखण्ड में औषधीय पौधों की खेती और संरक्षण पर आधारित इस शोध पत्र का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित हैः
1. भौगोलिक एवं प्राकृतिक अनुकूलता
बुन्देलखण्ड की अर्ध-शुष्क जलवायु और यहाँ की विशिष्ट मृदा संरचना (लाल और काली मिट्टी) औषधीय पौधों के लिए प्राकृतिक रूप से उपयुक्त है। यहाँ के उच्च तापमान और कम वर्षा के कारण पौधों में औषधीय गुणों वाले द्वितीयक मेटाबोलाइट्स‘ का निर्माण बेहतर होता है।
2. आर्थिक रूप से लाभकारी फसलें
पारंपरिक फसलों की तुलना में औषधीय पौधे कम पानी में अधिक मुनाफा देते हैंः
अश्वगंधाः इससे प्रति हेक्टेयर लगभग ₹95,000 की शुद्ध आय प्राप्त की जा सकती है।
शतावरः इसकी खेती से प्रति हेक्टेयर ₹3,50,000 तक का लाभ संभव है।
तुलसीः यह मात्र 2.5 महीनों में 260,000 प्रति एकड़ तक की आय दे सकती है।
सफेद मूसलीः इसे दिव्य औषधि माना जाता है और इसकी बाजार में भारी मांग है।
3. प्रमुख चुनौतियाँ
जल संकट और अन्ना प्रथाः बुन्देलखण्ड में सिंचाई के साधनों की कमी और लावारिस पशुओं (अन्ना पशु) द्वारा फसल को नुकसान पहुँचाना सबसे बड़ी समस्या है।
तकनीकी ज्ञान का अभावः किसानों के पास उन्नत बीजों, वैज्ञानिक खेती के तरीकों और फसल कटाई के बाद के प्रबंधन (प्रसंस्करण) के लिए कौशल की कमी है।
अवैध तस्करीः वनों से जड़ी-बूटियों का अनियंत्रित निष्कर्षण और तस्करी न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रही है. बल्कि कई प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट पैदा कर रही है।
4. सरकारी सहायता और भविष्य की राह
सब्सिडीः मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकारें औषधीय खेती को बढ़ावा देने के लिए 20ः से 50ः तक का अनुदान प्रदान कर रही हैं।
एफपीओः कृषक उत्पादक संगठनों के माध्यम से किसानों को सीधे बाजार और प्रसंस्करण इकाइयों से जोड़ा जा रहा है. जिससे बिचैलियों का प्रभाव कम हो रहा है।
पलायन पर रोकः इस क्षेत्र में कृषि-उद्यमिता विकसित होने से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं, जो क्षेत्र से होने वाले पलायन (डपहतंजपवद) को रोकने में सहायक हो सकते हैं।
यदि बुन्देलखण्ड के किसानों को सही प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराया जाए, तो यह क्षेत्र देश का एक प्रमुख औषधीय केंद्र बन सकता है।
निष्कर्ष और भविष्य का रोडमैप
बुन्देलखण्ड में औषधीय पौधों की खेती और संरक्षण न केवल एक आर्थिक आवश्यकता है, बल्कि यह इस क्षेत्र के पर्यावरणीय पुनरुद्धार का मार्ग भी है। इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए निम्नलिखित रणनीतिक कदम अनिवार्य है।
1. प्रसंस्करण हब की स्थापनाः झाँसी या ललितपुर में एक एकीकृत ‘औषधीय पादप क्लस्टर और प्रसंस्करण केंद्र स्थापित किया जाना चाहिए जहाँ उत्पादों की गुणवत्ता जाँच और मूल्यवर्धन की सुविधा हो ।
2. डिजिटल विपणन प्लेटफॉर्मः एक ऐसा पोर्टल विकसित किया जाना चाहिए जो किसानों को सीधे दवा निर्माताओं और निर्यातकों से जोड़े, जिससे कीमतों में पारदर्शिता आए।
3. कौशल विकासः स्थानीय युवाओं को औषधीय पौधों की पहचान, वैज्ञानिक संग्रहण और प्रारंभिक प्रसंस्करण में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए ताकि वे ‘कृषि-उद्यमी के रूप में उभर सकें।
4. सख्त कानूनी प्रवर्तनः वनों से अवैध निष्कर्षण को रोकने के लिए ‘जैव विविधता अधिनियम, 2002‘ का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना और स्थानीय समुदायों को इको-गाईर्ड्स के रूप में नियुक्त करना प्रभावी होगा।
अंततः, बुन्देलखण्ड की पथरीली और सूखी भूमि में छिपी औषधीय संपदा को यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नीतिगत समर्थन मिले, तो यह क्षेत्र भारत की ‘ग्रीन फार्मेसी बनने की क्षमता रखता है। यह न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करेगा, बल्कि विश्व को सुरक्षित और प्राकृतिक स्वास्थ्य विकल्प प्रदान करने में भी भारत की अग्रणी भूमिका सुनिश्चित करेगा।
Expert Columns
Tree TakeApr 20, 2026 10:09 PM
बुन्देलखण्ड की कृषि में औषधीय पौधों की सम्भावनायें एवं चुनौतियाँ
बुन्देलखण्ड की कृषि क्षमता को समझने के लिए इसकी मृदा संरचना और जलवायु के मध्य अंतर्संबंधों का विश्लेषण करना आवश्यक है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से विन्ध्यांचल पर्वतमाला की प्राचीन चट्टानों से निर्मित एक पठारी भूभाग है, जहाँ की भू-आकृति लहरदार और ढालू है...
Leave a comment