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अंतरराष्ट्रीय वन दिवस पर मुख्यमंत्री ने वनों को जीवन और अर्थव्यवस्था का आधार बताया

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अंतरराष्ट्रीय वन दिवस पर मुख्यमंत्री ने वनों को जीवन और अर्थव्यवस्था का आधार बताया

मुख्यमंत्री ने बताया कि उत्तर प्रदेश अब वृक्षारोपण के लिए आत्मनिर्भर है और इस वर्ष ‘एक पेड़ मां के नाम‘ अभियान के तहत 35 करोड़ पौधों के रोपण का लक्ष्य रखा गया है, जिसके लिए नर्सरियों में 50 करोड़ पौधे तैयार हैं...

अंतरराष्ट्रीय वन दिवस पर मुख्यमंत्री ने वनों को जीवन और अर्थव्यवस्था का आधार बताया

Green Update
ट्रीटेक नेटवर्क 
दिनांक 21 मार्च 2026 को इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित ‘अरण्य समागम‘ के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश की पर्यावरणीय और आर्थिक प्रगति का खाका प्रस्तुत किया। मुख्यमंत्री ने ‘वन एवं अर्थव्यवस्थायें‘ विषयक संवाद का उद्घाटन करते हुए कहा कि वन, जल और वायु का संतुलन ही जीवन का आधार है और भारतीय परंपरा में एक वृक्ष को दस पुत्रों के समान माना गया है। उन्होंने जानकारी दी कि पिछले 9 वर्षों में जनभागीदारी के माध्यम से प्रदेश का वनाच्छादन 10 प्रतिशत तक पहुँच गया है, जिसे अब 17 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य है। मुख्यमंत्री ने बताया कि उत्तर प्रदेश अब वृक्षारोपण के लिए आत्मनिर्भर है और इस वर्ष ‘एक पेड़ मां के नाम‘ अभियान के तहत 35 करोड़ पौधों के रोपण का लक्ष्य रखा गया है, जिसके लिए नर्सरियों में 50 करोड़ पौधे तैयार हैं। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि प्रदेश इंफ्रास्ट्रक्चर पर देश में सर्वाधिक 2 लाख करोड़ रुपये खर्च कर रहा है, फिर भी वृक्षारोपण अभियानों के कारण हरित क्षेत्र में लगातार वृद्धि हो रही है। राज्य में रामसर साइट्स की संख्या 11 से बढ़ाकर 100 करने का लक्ष्य है और अब तक 2,467 ग्रीन इकोनॉमी आधारित उद्योग स्थापित किए जा चुके हैं। उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है जिसने मानव-वन्यजीव संघर्ष को आपदा की श्रेणी में शामिल किया है। मुख्यमंत्री ने वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता पर जोर देते हुए सीतापुर के एक बाघ का उदाहरण दिया, जिसे हिंसक न होने के कारण चिड़ियाघर के बजाय वापस जंगल में छोड़ा गया। कार्यक्रम में पीलीभीत और सुहेलदेव वन्यजीव क्षेत्रों पर आधारित पुस्तकों का विमोचन किया गया और उत्कृष्ट कार्य करने वालों के साथ-साथ कार्बन क्रेडिट के लिए किसानों को धनराशि भी वितरित की गई।
ताज ट्रिपेजियम जोन में वृक्षों के पातन और छंटाई के नियमों में संशोधन
ताज ट्रिपेजियम जोन (टीटीजेड) के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण और जनहित के बीच संतुलन स्थापित करने के उद्देश्य से वृक्षों की कटाई और छंटाई की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। वर्ष 1984 के एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 8 मई 2015 को दिए गए आदेश के अनुसार पूरे टीटीजेड क्षेत्र में वृक्षों के पातन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था, जिसे अब उत्तर प्रदेश सरकार और टीटीजेड प्राधिकरण के प्रयासों से सरल बनाया गया है। नई व्यवस्था के तहत ताज महल से 5 किलोमीटर की हवाई दूरी की परिधि को मानक मानते हुए अलग-अलग श्रेणियों के लिए अनुमति की प्रक्रिया तय की गई है। 5 किलोमीटर की परिधि से बाहर स्थित क्षेत्रों में किसानों को विशेष राहत देते हुए यूकेलिप्टस, पॉपलर और मिलियाडुबिया जैसी प्रजातियों के 1 से 49 वृक्षों की छंटाई या कटाई के लिए प्रभागीय निदेशक अथवा वनाधिकारी को अधिकृत किया गया है। यह अनुमति मुख्य रूप से आकस्मिक परिस्थितियों जैसे संपत्ति या जनहानि से बचाव, यातायात को सुगम बनाने और विद्युत विभाग की हाईटेंशन लाइनों या पोल्स में बाधक बन रही शाखाओं की ट्रिमिंग और प्रूनिंग के लिए प्रदान की जाएगी। हालांकि, इसी क्षेत्र में अकृषकों के लिए नियम अलग हैं, जहाँ 1 से 49 वृक्षों के पातन हेतु नई दिल्ली स्थित सेंट्रल इम्पावर्ड कमेटी (सीईसी) से अनुमति लेनी होगी, जबकि 50 या उससे अधिक वृक्षों के लिए सीधे माननीय सर्वोच्च न्यायालय का रुख करना होगा। सूखे वृक्षों के मामले में भी सीईसी द्वारा भौतिक निरीक्षण के बाद ही अनुमति जारी करने का प्रावधान रखा गया है। सबसे संवेदनशील श्रेणी ताज महल से 5 किलोमीटर के भीतर आने वाले क्षेत्रों की है, जहाँ किसी भी प्रकार की छंटाई, कटाई या पातन के लिए आज भी केवल माननीय सर्वोच्च न्यायालय ही अनुमति प्रदान कर सकता है। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य कृषि वानिकी को प्रोत्साहित करना और आपातकालीन स्थिति में प्रशासनिक बाधाओं को कम करना है ताकि पर्यावरण सुरक्षा के साथ-साथ विकास और सुरक्षा कार्य निर्बाध रूप से चलते रहें।
छिंदवाड़ा में अफीम की खेती छिपाने के लिए बाघ की हत्या 
दिनांक 15 अप्रैल 2026 की शाम 05ः30 बजे छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश से प्राप्त जानकारी के अनुसार वन्यजीव सुरक्षा और अवैध मादक पदार्थों के व्यापार का एक अत्यंत गंभीर मामला सामने आया है। यहां सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के अंतर्गत आने वाले सांगा खेड़ा रेंज में एक साढ़े चार साल के बाघ की जहर देकर हत्या कर दी गई। शुरुआती जांच में इसे स्थानीय ग्रामीणों द्वारा मवेशियों के शिकार के बदले में की गई कार्रवाई माना जा रहा था, लेकिन वन विभाग और पुलिस की विस्तृत छानबीन ने इस घटना के पीछे एक बड़ी साजिश का खुलासा किया है। दरअसल, इस बाघ को इसलिए मारा गया ताकि घने जंगल के बीच अवैध रूप से की जा रही अफीम की खेती को वन विभाग की नजरों से बचाया जा सके। यह बाघ मूल रूप से बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व का था जिसे एक विशेष परियोजना के तहत यहां लाकर मुक्त किया गया था। इसकी सुरक्षा और आवाजाही पर नजर रखने के लिए इसके गले में एक अत्याधुनिक सैटेलाइट रेडियो कॉलर लगाया गया था। बाघ ने जिस इलाके को अपना ठिकाना बनाया था, वहीं अपराधियों ने भारी मात्रा में अफीम के पौधों की खेती कर रखी थी। रेडियो कॉलर के कारण वन विभाग की गश्ती टीमें लगातार जीपीएस सिग्नल का पीछा करते हुए उस गुप्त खेत के करीब पहुंच रही थीं। अपनी अवैध फसल के पकड़े जाने के डर से तस्करों ने बाघ को रास्ते से हटाने की योजना बनाई और एक मवेशी के शव में यूरिया व कीटनाशक मिलाकर बाघ को जहर दे दिया। बाघ की मौत के बाद आरोपियों ने सबूत मिटाने के लिए कीमती रेडियो कॉलर को जला दिया और बाघ के शव को दफना दिया। हालांकि सिग्नल अचानक बंद होने के बाद वन विभाग ने सक्रियता दिखाई और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर न केवल बाघ का शव बरामद किया बल्कि अफीम के विशाल खेत का भी पता लगा लिया। इस मामले में अब तक कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है जिन पर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम और नारकोटिक्स एक्ट के तहत कार्रवाई की जा रही है। वन्यजीव विशेषज्ञों ने इस घटना पर चिंता जताते हुए इसे निगरानी तंत्र की बड़ी चुनौती बताया है क्योंकि तकनीकी उपकरणों के कारण बाघ अपराधियों के लिए एक आसान निशाना बन गया था। फिलहाल प्रशासन इस पूरे इलाके में सर्च ऑपरेशन चला रहा है ताकि इस तरह के अन्य अवैध नेटवर्क को ध्वस्त किया जा सके।
यूपी में 51 नई आर्द्रभूमियों के संरक्षण को मिली हरी झंडी
दिनांक 23 मार्च 2026 को वन मुख्यालय स्थित पारिजात सभागार में उत्तर प्रदेश राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण की छठी बैठक संपन्न हुई। इस महत्वपूर्ण बैठक की अध्यक्षता माननीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा की गई। बैठक में राज्य की पारिस्थितिक सुरक्षा के लिए आर्द्रभूमियों के संरक्षण और प्रबंधन हेतु बड़े निर्णय लिए गए। बैठक में नमामि गंगे परियोजना के तहत 14 गंगा जनपदों की 23 प्राथमिकता वाली आर्द्रभूमियों को अधिसूचित करने की संस्तुति दी गई, जो लगभग 750 हेक्टेयर में फैली हैं। साथ ही, महराजगंज, बलरामपुर, अयोध्या, संतकबीरनगर और सिद्धार्थनगर की 28 अन्य आर्द्रभूमियों (1130.653 हेक्टेयर) को भी नियमों के तहत अधिसूचित करने पर सहमति बनी। अब तक राज्य में 20 आर्द्रभूमियों को आरंभिक स्तर पर अधिसूचित किया जा चुका है और 30 अन्य पर कार्यवाही जारी है। इस अवसर पर वी० हेकाली झिमोमी, प्रमुख सचिव, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभागय सुनील चैधरी, प्रधान मुख्य वन संरक्षक और विभागाध्यक्षय अनुराधा वेमूरी, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, वन्यजीवध्मुख्य वन्यजीव प्रतिपालकय बी० चन्द्रकला, सचिव, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग और संजीव कुमार, सदस्य-सचिव, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। यह पहल प्रदेश में जैव विविधता और पर्यावरण संतुलन को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की पत्रिका का विमोचन 
उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपनी पहली ‘इन हाउस‘ पत्रिका का विमोचन माननीय राज्य मंत्री ( स्वतंत्र प्रभार) डॉ अरुण कुमार सक्सेना  वन , पर्यावरण, जंतु  उद्यान एवं जलवायु परिवर्तन ,उत्तर प्रदेश ने  किया। ‘प्रवाह‘ नाम से प्रकाशित होने वाली है पत्रिका साल में दो बार आएगी और यह हिंदी अंग्रेजी दोनों भाषाओं में होगी। इस मैगजीन के माध्यम से बोर्ड पर्यावरण संरक्षण की दिशा में किये गए अपने कार्यों, गतिविधियों और तकनीक के आधुनिक उपयोग के बारे में विशेषयज्ञों, पर्यावरणविदों और आम जनमानस को जानकारी उपलब्ध कराएगा। 
लखनऊ में स्थिरता और स्वदेशी उद्यमिता का महाकुंभ
दिनांक 05 अप्रैल 2026 को लखनऊ के हजरतगंज स्थित ऐतिहासिक हबीबुल्लाह एस्टेट में लखनऊ फार्मर्स मार्केट के बहुप्रतीक्षित ‘क्रॉप्स एंड वीव्स’ संस्करण का सफल आयोजन हुआ। वर्ष 2013 से अब तक 5,000 से अधिक उद्यमियों और 2 लाख परिवारों को सशक्त बनाने के 14 वर्षों के गौरवशाली सफर को चिह्नित करते हुए यह आयोजन स्थिरता, सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक उद्यमिता का एक जीवंत उत्सव बन गया। संस्थापिका ज्योत्सना कौर हबीबुल्लाह ने इस अवसर पर कहा कि स्थिरता कोई बोझ नहीं बल्कि हमारी विरासत का उत्सव और ग्रामीण किसानों व स्टार्टअप्स में सीधा निवेश है। इस संस्करण में पृथ्वी दिवस पर विशेष ध्यान देते हुए पर्यावरण के अनुकूल ब्रांड्स और पुनर्चक्रित उत्पादों को प्रदर्शित किया गया, साथ ही एक कचरा संग्रहण अभियान के माध्यम से जिम्मेदार पुनर्चक्रण के प्रति जागरूकता फैलाई गई। लखनऊ को यूनेस्को द्वारा ‘खान-पान के रचनात्मक शहर‘ के रूप में मान्यता मिलने के अनुरूप आगंतुकों ने स्थानीय और जैविक खाद्यों का आनंद लिया। पूरे दिन लाइव संगीत, कविता, ओपन माइक और अगरबत्ती बनाने जैसी विभिन्न कार्यशालाओं ने सांस्कृतिक माहौल को जीवंत रखा। बच्चों के लिए ईस्टर थीम आधारित गतिविधियों ने इस आयोजन में उत्साह भर दिया, जो सामूहिक जिम्मेदारी और जागरूक जीवनशैली के प्रति एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।

 

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