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याम हॉक मोथ का पर्यावरण में योगदान और विशेषताएं

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याम हॉक मोथ का पर्यावरण में योगदान और विशेषताएं

यह भारत के नमी वाले इलाकों, बगीचों और जंगलों में बहुत आसानी से देखा जा सकता है। इसके संरक्षण से स्थानीय पौधों की प्रजातियों को फलने-फूलने में सीधे मदद मिलती है। प्रकृति में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए इसने दुश्मनों से बचने के कई अनोखे तरीके विकसित किए हैं...

याम हॉक मोथ का पर्यावरण में योगदान और विशेषताएं

TidBits
ट्रीटेक नेटवर्क 
याम हॉक मोथ भारत में पाया जाने वाला एक बड़ा और आकर्षक पतंगा है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में थर्मेट्रा ओल्डनलैंडिए कहा जाता है। यह मुख्य रूप से पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के मैदानी और पहाड़ी इलाकों में पाया जाता है। इसके पंखों पर भूरे, मटमैले और चमकीले सुनहरे या चांदी जैसी धारियों का सुंदर पैटर्न होता है, जो इसे रात के समय उड़ते हुए भी विशिष्ट बनाता है। भारत के पारिस्थितिक तंत्र में इस कीट का बहुत बड़ा महत्व है। यह एक उत्कृष्ट परागणकर्ता है, जो रात के समय खिलने वाले फूलों और जंगली वनस्पतियों के परागण में मुख्य भूमिका निभाता है, जिससे पौधों का वंश आगे बढ़ता है। इसके लार्वा यानी कैटरपिलर मुख्य रूप से याम (जिमीकंद), तारो (अरबी) और बालसम जैसे पौधों की पत्तियों को खाते हैं, जिससे यह प्राकृतिक रूप से वनस्पतियों के संतुलन को बनाए रखता है। इसके अलावा, खाद्य श्रृंखला में भी इसकी केंद्रीय भूमिका है क्योंकि इसके अंडे, कैटरपिलर और वयस्क पतंगे कई स्थानीय पक्षियों, छिपकलियों, मेंढकों और चमगादड़ों का मुख्य भोजन बनते हैं। अपने छोटे से जीवनकाल में यह जीव अनोखी शारीरिक बनावट, तीव्र सूंघने की शक्ति, अंधेरे में देखने की अद्भुत क्षमता और दुश्मनों व कड़ाके की ठंड से बचने की विशेष रणनीतियों के साथ अपनी भूमिका निभाता है, हालांकि आज यह इंसानी गतिविधियों के कारण संकट में है और इसे हमारे बगीचों में संरक्षण की जरूरत है। वयस्क पतंगा अपनी तेज और सटीक उड़ान के लिए जाना जाता है, जो हवा में एक ही जगह स्थिर रहकर फूलों का रस चूस सकता है। यह मुख्य रूप से रात के समय सक्रिय होता है और इसकी बड़ी आंखें अंधेरे में भी फूलों को ढूंढने में मदद करती हैं। उड़ते समय यह किसी छोटे पक्षी जैसा दिखाई देता है, इसलिए कई लोग इसे पहली नजर में हमिंगबर्ड समझ लेते हैं। यह भारत के नमी वाले इलाकों, बगीचों और जंगलों में बहुत आसानी से देखा जा सकता है। इसके संरक्षण से स्थानीय पौधों की प्रजातियों को फलने-फूलने में सीधे मदद मिलती है। प्रकृति में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए इसने दुश्मनों से बचने के कई अनोखे तरीके विकसित किए हैं। इसके पंखों का मटमैला और भूरा रंग सूखी पत्तियों और पेड़ों की छाल से बिल्कुल मेल खाता है, जिससे दिन के समय आराम करते हुए शिकारी पक्षी इसे आसानी से देख नहीं पाते हैं। यदि कोई दुश्मन इसके बहुत करीब आ जाए, तो यह अचानक अपने पिछले पंखों को दिखाता है जिन पर डरावनी आंखों जैसे बड़े धब्बे बने होते हैं, जिससे शिकारी चैंककर पीछे हट जाता है। भारत के अलग-अलग मौसमों में खुद को सुरक्षित रखने के लिए इसकी सर्दियों में जीवित रहने की प्रक्रिया भी बहुत खास है। जब तापमान बहुत कम होने लगता है और चारों तरफ ठंड बढ़ जाती है, तब यह पतंगा अपने जीवन चक्र के प्यूपा चरण में चला जाता है। यह सूखी पत्तियों के नीचे या जमीन के भीतर मिट्टी में एक सुरक्षित कोकून बनाकर गहराई में छिप जाता है। कड़कड़ाती ठंड के दौरान इसकी शारीरिक गतिविधियां लगभग पूरी तरह से रुक जाती हैं और यह सुशुप्तावस्था में चला जाता है। जैसे ही वसंत का आगमन होता है और मौसम में दोबारा गर्माहट आती है, यह प्यूपा से बाहर निकलकर एक पूर्ण वयस्क पतंगे के रूप में नए जीवन की शुरुआत करता है। इसके भोजन के मुख्य स्रोतों में चमेली, धतूरा और तंबाकू जैसे पौधों के खुशबूदार फूल शामिल हैं, जिनका मीठा रस यह अपनी लंबी और पतली सूंड की मदद से चूसता है। इसके विपरीत, इसका कैटरपिलर केवल हरी पत्तियों को खाता है। इस पतंगे का पूरा जीवनकाल बहुत छोटा होता है, जो अंडों से लेकर वयस्क होने तक आमतौर पर कुछ ही हफ्तों या कुछ महीनों में सिमट जाता है। आज के समय में इस सुंदर जीव को अपने प्राकृतिक आवास के गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि तेजी से होते शहरीकरण, और खेती में रासायनिक कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग के कारण इनके छिपने के स्थान और पसंदीदा पौधे लगातार नष्ट हो रहे हैं। इस संकट से बचाने के लिए इसे अपने घर के बगीचे में सुरक्षित रखने के तरीके बहुत आसान और प्रभावी हो सकते हैं, जिसके अंतर्गत हमें अपने बगीचे में अरबी, जिमीकंद और खुशबूदार रात को खिलने वाले फूलों के देशी पौधे लगाने चाहिए, बगीचे के एक कोने में सूखी पत्तियों और प्राकृतिक मिट्टी को बिना छेड़े छोड़ देना चाहिए ताकि यह प्यूपा अवस्था में सुरक्षित रह सके, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पौधों पर किसी भी तरह के रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव बिल्कुल नहीं करना चाहिए।
ब्लैक डायमंड सेब के बारे में जानकारी
ब्लैक डायमंड सेब की कीमत लगभग 500 भारतीय रुपये प्रति पीस होती है क्योंकि इन्हें किलोग्राम के बजाय लक्जरी बाजारों में व्यक्तिगत रूप से बेचा जाता है। ये सेब विशेष रूप से तिब्बत के न्यांगची के उच्च ऊंचाई वाले पहाड़ों में उगते हैं, जहां अत्यधिक धूप और यूवी किरणें उनकी त्वचा को एक अनोखा गहरा बैंगनी रंग देती हैं जो हीरे जैसा दिखता है। इन्हें कटाई के लिए तैयार होने में लगभग आठ साल लगते हैं, इनका स्वाद नियमित सेबों की तुलना में बहुत अधिक मीठा और कुरकुरा होता है, और ये हर साल केवल दो महीने की छोटी अवधि के लिए ही उपलब्ध होते हैं। 2026 तक, यह दुर्लभ फल प्रीमियम वैश्विक बाजारों में एक अत्यधिक मांग वाली वस्तु बना हुआ है। वनस्पतिक रूप से, यह अनोखा सेब ‘मालुस डोमेस्टिका‘ प्रजाति के अंतर्गत आता है और यह चीन के प्रसिद्ध ‘हुआ नियू‘ (जिसे चाइनीज रेड डिलीशियस भी कहा जाता है) सेब परिवार की एक दुर्लभ कल्टीवार किस्म है। हुआ नियू नस्ल को पहली बार 1956 में चीन के गांसु प्रांत के तियानशुई में रेड डिलीशियस, गोल्डन डिलीशियस और राल्स जेनेट जैसी कई बेहतरीन किस्मों के क्रॉस-ब्रीडिंग से विकसित किया गया था। वर्ष 2015 से तिब्बत के पहाड़ों में इस विशिष्ट ब्लैक डायमंड कल्टीवार का व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया गया, जो भौगोलिक अनुकूलन के कारण मूल नस्ल से बिल्कुल अलग गहरे रंग का और अधिक मीठा हो गया। इसकी गहरे बैंगनी-काली त्वचा एंथोसायनिन से भरपूर होती है, जो कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाती है और पुरानी बीमारियों को रोकने में मदद करती है। इसमें मौजूद उच्च आहार फाइबर और प्राकृतिक पेक्टिन स्वस्थ पाचन तंत्र को बढ़ावा देते हैं और कब्ज को रोकते हैं। ये सेब विटामिन सी का एक उत्कृष्ट स्रोत हैं जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करते हैं और मौसमी बीमारियों से बचाते हैं। इनमें एपिकेटचिन और फ्लेवोनोइड्स होते हैं जो रक्तचाप को कम करने और हृदय संबंधी जोखिमों को कम करने में सहायता करते हैं। इसके आवश्यक विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट त्वचा के स्वास्थ्य को बनाए रखने और बुढ़ापे के शुरुआती लक्षणों को रोकने के लिए काम करते हैं।
छिपकली जहरीली नहीं होती है
भारत में पाई जाने वाली कोई भी छिपकली जहरीली नहीं होती है और यह पूरी तरह से एक अंधविश्वास है। दुनिया में केवल दो-तीन प्रजातियाँ ही जहरीली होती हैं जो भारत में नहीं मिलतीं। हमारे यहाँ रंग बदलने वाली छिपकलियों में सबसे प्रमुख बगीचे में मिलने वाली ‘ओरिएंटल गार्डन लिजार्ड‘ है, जिसका नर लड़ाई या प्रजनन के समय अपना सिर और गर्दन चमकीले लाल रंग में बदल लेता है। दूसरी छिपकली ‘पेनिनसुलर त्ॉक अगामा‘ है जो दक्षिण भारत के पत्थरों पर रहती है और धूप सेकते समय अपना आधा शरीर चमकीला नारंगी और आधा काला कर लेती है। तीसरी ‘फैन-थ्रोटेड लिजार्ड‘ है जो मैदानों में मिलती है और अपनी गर्दन के नीचे की त्वचा को नीले, नारंगी और काले रंग में चमका सकती है। घरों में मिलने वाली आम छिपकली रंग नहीं बदल सकती और उसके काटने पर भी कोई जहर नहीं चढ़ता क्योंकि उसके मुंह में जहर की थैलियां नहीं होतीं। खाने में छिपकली गिरने से मौत होने की खबरें भी गलत हैं क्योंकि उसकी त्वचा पर जहर नहीं होता। असल में उसकी त्वचा पर ‘साल्मोनेला‘ नाम का हानिकारक बैक्टीरिया होता है, जो खाने में मिलकर भयंकर फूड पॉइजनिंग और उल्टी-दस्त पैदा करता है, जिसे लोग गलती से जहर का असर मान लेते हैं। इसी तरह जंगलों में मिलने वाली बड़ी छिपकली ‘गोह‘ या ‘विषखोपड़ा‘ भी जहरीली नहीं होती, बस उसके काटने से बैक्टीरिया के कारण घाव में इन्फेक्शन हो सकता है। जहाँ तक इन दोनों जीवों में समानता की बात है, छिपकली और गिरगिट दोनों एक ही सरीसृप (तमचजपसम) परिवार के ठंडे खून वाले जीव हैं, दोनों अंडे देते हैं और कीड़े-मकोड़े खाते हैं। लेकिन इनमें बड़े अंतर भी हैंय असली गिरगिट की आँखें एक-दूसरे से स्वतंत्र होकर दो अलग दिशाओं में देख सकती हैं, उनकी उँगलियाँ आपस में जुड़ी होती हैं जिससे वे पेड़ों की टहनी पकड़ सकें, और शिकार के लिए उनकी जीभ बहुत लंबी होती है, जबकि आम छिपकलियों के पैर फैले हुए और दीवार पर दौड़ने वाले होते हैं, उनकी पलकें झपक सकती हैं, और वे खतरा होने पर अपनी पूँछ खुद तोड़कर अलग कर सकती हैं जो बाद में दोबारा उग आती है।

 

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