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ट्रीटेक नेटवर्क
‘‘अरे भाई, तुम तो बिल्कुल गूलर का फूल हो गए हो!‘‘कृयह कहावत हम सबने अक्सर सुनी है, जिसका सीधा मतलब होता है ‘बेहद दुर्लभ होना‘ या ‘पूरी तरह से गायब हो जाना‘। लेकिन क्या वाकई गूलर का फूल आज तक किसी ने नहीं देखा? इस पुराने रहस्य के पीछे प्रकृति का एक बहुत ही दिलचस्प वैज्ञानिक और औषधीय सच छिपा हुआ है। दरअसल, गूलर के पेड़ पर कभी भी बाकी आम फूलों की तरह बाहर खिले हुए फूल दिखाई नहीं देते। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, गूलर का जिसे हम फल समझते हैं, वह असल में उसका फल नहीं बल्कि एक बंद खोखला फूल होता है। इसके गोल बंद घेरे के अंदर ही सैकड़ों छोटे-छोटे नर और मादा फूल छिपे होते हैं। इस बंद फूल के भीतर परागण की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए एक बेहद खास किस्म की छोटी ततैया इसके निचले हिस्से के एक बारीक छेद से अंदर प्रवेश करती है। यह जीव और गूलर का पेड़ पूरी तरह एक-दूसरे के जीवन पर निर्भर होते हैं। इसलिए, गूलर का फूल बाहर की दुनिया को कभी दिखाई नहीं देता क्योंकि वह फल के रूप में खुद को बाहर से पूरी तरह ढक कर रखता है।आयुर्वेद में इस अनोखे पेड़ के पत्तों, छाल, फल और दूध को सेहत के लिए किसी वरदान से कम नहीं माना गया है। गूलर अपनी ठंडी तासीर के लिए जाना जाता है, जो शरीर की अत्यधिक गर्मी और पित्त दोष को शांत करने में रामबाण की तरह काम करता है। यदि किसी को पेट में जलन, एसिडिटी या अल्सर की समस्या हो, तो इसके कच्चे फलों के चूर्ण का सेवन पेट को तुरंत ठंडक पहुंचाता है और पाचन क्रिया को दुरुस्त करता है। खूनी बवासीर या शरीर के किसी भी हिस्से से होने वाले अत्यधिक रक्तस्राव को रोकने में गूलर की छाल का काढ़ा बेहद असरदार साबित होता है। इतना ही नहीं, मधुमेह के रोगियों के लिए भी यह एक बेहतरीन प्राकृतिक औषधि हैय इसके सूखे फलों और पत्तों का नियमित सेवन रक्त में शर्करा के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद करता है। त्वचा से जुड़ी समस्याओं जैसे दाद, खाज, खुजली या चेहरे के मुंहासों पर गूलर के पेड़ से निकलने वाला ताजा दूध लगाने से त्वचा के रोग जड़ से खत्म हो जाते हैं और घाव भी तेजी से भरते हैं। शारीरिक कमजोरी और थकान को दूर करने के लिए इसके पके हुए फलों को सुखाकर बनाया गया चूर्ण बेहद पौष्टिक माना जाता है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। प्राचीन मान्यताओं के कारण भले ही इसे रहस्यमयी कहा गया हो, लेकिन यह पेड़ अपनी जड़ों से लेकर फलों तक हमारी सेहत को संवारने वाला एक अद्भुत और बेजोड़ प्राकृतिक खजाना है।
सेहत का सुगन्धित खजानाः हमारा पारंपरिक पान
आज समझ आता है कि जिस पान को हम सिर्फ मुंह लाल करने का खिलौना समझते थे, आयुर्वेद में उसे सेहत का असली खजाना माना गया है। बचपन में जो सिर्फ एक नटखट जिद थी, आज उसके औषधीय गुण हमें हैरान करते हैं। हमारी दादी-नानी भले ही स्वाद के लिए पान खाती थीं, लेकिन अनजाने में वह इसके अद्भुत फायदों का लुत्फ उठा रही थीं। पान का पत्ता सिर्फ एक साधारण माउथ फ्रेशनर नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे पाचन तंत्र के लिए एक वरदान की तरह काम करता है। भारी भोजन के बाद यदि गुलकंद, सौंफ और इलायची के साथ सादा पान खाया जाए, तो यह मुंह में लार के निर्माण को तेजी से बढ़ाता है, जिससे भोजन को पचाने में बहुत मदद मिलती है। इतना ही नहीं, अक्सर बदलते मौसम में जब खांसी या कफ की समस्या परेशान करने लगती है, तो पान के पत्ते का ताजा रस थोड़े से शहद के साथ मिलाकर लेने से गले को तुरंत और गहरी राहत मिलती है। इसमें मौजूद कुदरती एंटी-बैक्टीरियल गुण मुंह की दुर्गंध को खत्म करते हैं और मसूड़ों की सूजन को दूर रखने में बेहद मददगार होते हैं। आयुर्वेद तो यह भी कहता है कि अगर शरीर में कहीं सूजन या हल्का दर्द हो, तो पान के पत्ते पर थोड़ा सा अरंडी का तेल लगाकर उसे हल्का गुनगुना करके प्रभावित जगह पर बांधने से दर्द में काफी आराम मिलता है। इसके इस्तेमाल का तरीका भी बेहद सरल और सुरक्षित है। तंबाकू, कत्था और चूने की अत्यधिक मात्रा वाले नुकसानदेह ‘पान मसाले‘ से पूरी तरह दूर रहकर, अगर हम सिर्फ इसके साफ और शुद्ध पत्तों का सही तरीके से इस्तेमाल करें, तो यह हमारी सेहत को सचमुच संवार देता है। आप इसे सादे रूप में आराम से चबा सकते हैं, या फिर आज के आधुनिक दौर की तरह इसका रिफ्रेशिंग ‘पान शॉट‘ या स्वादिष्ट शरबत बनाकर अपने मेहमानों को भी परोस सकते हैं। हरी-भरी बेल पर लटकते ये खूबसूरत दिल के आकार के पत्ते मानो आज भी हमसे धीरे से फुसफुसाते हैं कि जिंदगी में चाहे कितनी भी गंभीरता आ जाए, उस अरबी के पत्ते वाले बचपन की मिठास और थोड़ी सी शरारत हमेशा जिंदा रहनी चाहिए।
मखमली कुदरत का अनोखा मेहमानः बीरबहूटी
रेड वेलवेट माइट जिसे ग्रामीण इलाकों में अक्सर ‘रानी कीड़ा‘ या ‘बीरबहूटी‘ भी कहा जाता है, प्रकृति के सबसे खूबसूरत और अनोखे जीवों में से एक है। मखमली लाल रंग का यह छोटा सा जीव अपने आप में कई दिलचस्प रहस्य समेटे हुए है। इसके नाम के मुताबिक, इसका शरीर चमकीले लाल या नारंगी रंग के घने और छोटे-छोटे बालों से ढका होता है। जब यह जमीन पर चलता है, तो ऐसा लगता है जैसे मखमल का कोई छोटा सा टुकड़ा रेंग रहा हो। इसी वजह से इसे यह नाम मिला है। यह जीव सालभर जमीन के नीचे गहरी सुशुप्तावस्था में रहता है। जैसे ही मॉनसून की पहली फुहारें पड़ती हैं और मिट्टी की सोंधी खुशबू आती है, ये जमीन से बाहर निकल आते हैं। यही कारण है कि इन्हें बारिश का दूत भी माना जाता है। भले ही इसे रानी कीड़ा कहा जाता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह कोई कीड़ा नहीं है। यह मकड़ी वर्ग की प्रजाति का जीव है, यानी इसका सीधा संबंध मकड़ियों और बिच्छुओं के परिवार से है। एक वयस्क बीरबहूटी के आठ पैर होते हैं, जबकि आम कीड़ों के छह पैर होते हैं। दिखने में यह जितनी खूबसूरत होती है, उतनी ही नाजुक भी होती है। तेज धूप और गर्मी यह बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पाती, इसलिए धूप निकलते ही यह वापस मिट्टी के अंदर चली जाती है। इंसानों को इससे कोई खतरा नहीं होता क्योंकि यह न तो काटती है और न ही जहरीली होती है। पुराने समय में पारंपरिक दवाओं के लिए इनका काफी शिकार किया जाता था, जिसकी वजह से अब इनकी संख्या काफी कम देखने को मिलती है। ये पर्यावरण और मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी जीव हैं, इसलिए इन्हें सिर्फ दूर से देखना और संरक्षित करना ही सबसे बेहतर है।
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