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डीएनए के माध्यम से हाथियों की जनसंख्या का अनुमानः आधुनिक वन्यजीव विज्ञान की क्रांतिकारी तकनीक

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डीएनए के माध्यम से हाथियों की जनसंख्या का अनुमानः आधुनिक वन्यजीव विज्ञान की क्रांतिकारी तकनीक

परंपरागत तरीकों जैसे प्रत्यक्ष गणना, पदचिह्नों का अध्ययन या हवाई सर्वेक्षण में कई सीमाएँ होती हैं। इसी कारण वैज्ञानिक अब डीएनए आधारित तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। डीएनए से हाथियों की जनसंख्या का अनुमान लगाने की तकनीक आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी और संरक्षण विज्ञान का उत्कृष्ट उदाहरण है...

डीएनए के माध्यम से हाथियों की जनसंख्या का अनुमानः आधुनिक वन्यजीव विज्ञान की क्रांतिकारी तकनीक

प्रशान्त कुमारर्तमान में उत्तराखण्ड वन विभाग में वरिष्ठ परियोजना सहयोगी (वन्यजीव) के पद पर कार्यरत हैं तथा पिछले सात वर्षों से वन्यजीव अपराध नियंत्रण एवं संरक्षण में प्रभावी शोध एवं विश्लेषण कार्य कर रहे है। इन्होंने लगभग पन्द्रह हजार से अधिक वन कर्मियों को वन्यजीव फॉरेंसिक एवं वन्यजीव संरक्षण विषय में प्रशिक्षित किया है तथा पांच सौ से अधिक प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन भी किया है। प्रशान्त कुमार, फॉरेंसिक विज्ञान में बीएससी तथा एमएससी है एवं वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक्स में फील्ड के अनुभवी हैं।
डॉ इन्दर सिंह रौतेला, कुमाऊँ विश्विद्यालय से फॉरेस्ट्री विषय में पीएचडी हैं । वर्तमान में उत्तराखण्ड वन विभाग अंतर्गत हल्द्वानी वन प्रभाग में कनिष्ठ अनुसंधान अध्येता के पद पर कार्यरत है। डॉ० रौतेला, शोध कार्यों के अतिरिक्त पर्यावरण तथा वन संरक्षण पर जनजागरूकता कार्यक्रमों एवं प्रचार प्रसार के माध्यम से वन क्षेत्रो में सक्रिय कार्य कर रहे हैं।

वन्यजीव संरक्षण आज पूरी दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती बन चुका है। जंगलों के घटते क्षेत्र, अवैध शिकार, जलवायु परिवर्तन और मानव-वन्यजीव संघर्ष के कारण अनेक प्रजातियाँ खतरे में हैं। इनमें हाथी एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील प्रजाति है। एशियाई और अफ्रीकी हाथियों की सही जनसंख्या का पता लगाना संरक्षण योजनाओं के लिए बहुत आवश्यक होता है। परंपरागत तरीकों जैसे प्रत्यक्ष गणना, पदचिह्नों का अध्ययन या हवाई सर्वेक्षण में कई सीमाएँ होती हैं। इसी कारण वैज्ञानिक अब डीएनए आधारित तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। डीएनए से हाथियों की जनसंख्या का अनुमान लगाने की तकनीक आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी और संरक्षण विज्ञान का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह विधि न केवल अधिक सटीक है बल्कि जानवरों को बिना नुकसान पहुँचाए उनकी संख्या का अनुमान लगाने में मदद करती है।
डीएनए क्या है?
डीएनए जीवित प्राणियों की आनुवंशिक जानकारी को संग्रहीत करने वाला अणु है। प्रत्येक जीव का डीएनए अलग होता है, ठीक उसी प्रकार जैसे मनुष्यों के फिंगरप्रिंट अलग होते हैं। डीएनए में जीव की शारीरिक संरचना, व्यवहार और वंशानुगत विशेषताओं की जानकारी होती है। हाथियों के शरीर की कोशिकाओं, बालों, मल, मूत्र, त्वचा और रक्त में डीएनए पाया जाता है।
हाथियों की जनसंख्या अनुमान की आवश्यकता
हाथियों की सही संख्या जानना कई कारणों से महत्वपूर्ण हैः
ऽ    संरक्षण नीतियाँ बनाने के लिए
ऽ    अवैध शिकार पर नियंत्रण हेतु
ऽ    मानव-हाथी संघर्ष कम करने के लिए
ऽ    वन क्षेत्र प्रबंधन हेतु
ऽ    प्रजनन और प्रवास पैटर्न समझने के लिए
यदि वैज्ञानिकों को यह पता न हो कि किसी क्षेत्र में कितने हाथी हैं, तो संरक्षण योजनाएँ प्रभावी नहीं हो सकतीं।
पारंपरिक जनगणना की समस्याएँ
पहले हाथियों की गणना निम्न तरीकों से की जाती थीः
ऽ    प्रत्यक्ष और शारीरिक गणना
ऽ    हवाई सर्वेक्षण
ऽ    पदचिह्नों की पहचान
ऽ    कैमरा ट्रैप
ऽ    डंग काउंट
ऽ    ब्लॉक काउंट और सैंपलिंग मेथड
लेकिन इन तरीकों में कई कठिनाइयाँ थींः
ऽ    घने जंगलों में हाथी दिखाई नहीं देते
ऽ    एक ही हाथी को कई बार गिना जा सकता है
ऽ    समय और धन अधिक लगता है
ऽ    मानव त्रुटि की संभावना रहती है
इसी कारण वैज्ञानिकों ने डीएनए आधारित “नॉन-इनवेसिव” तकनीक विकसित की।
डीएनए आधारित जनसंख्या अनुमान क्या है?
इस तकनीक में हाथियों को पकड़े बिना उनके छोड़े गए जैविक नमूनों से डीएनए निकाला जाता है। सबसे अधिक उपयोग हाथियों के मल का किया जाता है। प्रत्येक हाथी के मल में उसकी आंतों की कोशिकाएँ होती हैं जिनमें डीएनए मौजूद रहता है। वैज्ञानिक इन नमूनों का विश्लेषण करके अलग-अलग हाथियों की पहचान करते हैं।
प्रक्रिया कैसे काम करती है?
1. नमूना संग्रह 
वैज्ञानिक/शोधकर्ता/वनकर्मी जंगलों में जाकर हाथियों के मल के नमूने इकट्ठा करते हैं। प्रत्येक नमूने के साथ निम्न जानकारी दर्ज की जाती हैः
    स्थान (जीपीएस  लोकेशन)
    समय
    ताजगी
    पर्यावरणीय स्थिति
नमूनों को विशेष रसायनों(बफर) में सुरक्षित रखा जाता है ताकि डीएनए खराब न हो।
2. डीएनए निष्कर्षण
प्रयोगशाला में मल से कोशिकाएँ अलग की जाती हैं और उनसे डीएनए निकाला जाता है। यह प्रक्रिया अत्यंत सावधानी से की जाती है क्योंकि पर्यावरणीय कारकों के कारण डीएनए जल्दी नष्ट हो सकता है।
3. आनुवंशिक विश्लेषण 
वैज्ञानिक माइक्रोसेटेलाइट मार्कर या एस एन पी (सिंगल नूक्लिओटाइड पॉलीमॉरफिस्म ) तकनीक का उपयोग करके प्रत्येक हाथी की आनुवंशिक पहचान बनाते हैं।
इससे यह पता चलता हैः
    कितने अलग हाथी मौजूद हैं
    कौन-कौन से हाथी आपस में रिश्तेदार हैं
    नर और मादा का अनुपात
    आनुवंशिक विविधता
4. कैप्चर-मार्क-रीकैप्चर मॉडल
जनसंख्या अनुमान के लिए वैज्ञानिक सांख्यिकीय मॉडल का उपयोग करते हैं। यह सबसे प्रसिद्ध मॉडल है, यह मॉडल इस सिद्धांत पर आधारित है कि यदि नमूनों में बार-बार वही डीएनए मिलता है, तो कुल आबादी का अनुमान लगाया जा सकता है।
डीएनए तकनीक के लाभ
1. बिना नुकसान के अध्ययन
हाथियों को पकड़ने या बेहोश करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
2. अधिक सटीकता
हर हाथी का डीएनए अलग होता है, इसलिए दोहराव कम होता है।
3. कठिन क्षेत्रों में उपयोग
घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों में भी यह तकनीक प्रभावी है।
4. आनुवंशिक विविधता का अध्ययन
वैज्ञानिक यह भी जान सकते हैं कि किसी क्षेत्र की आबादी आनुवंशिक रूप से कितनी स्वस्थ है।
5. अवैध शिकार रोकने में सहायता
जब्त हाथीदांत (आइवरी) के डीएनए का मिलान करके उसके स्रोत क्षेत्र का पता लगाया जा सकता है।
भारत में डीएनए आधारित हाथी अध्ययन
भारत में कई संस्थान हाथियों पर डीएनए आधारित शोध कर रहे हैंः
ऽ    भारतीय वन्यजीव संस्थान 
ऽ    नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज
ऽ    विभिन्न विश्वविद्यालय और जैव प्रौद्योगिकी प्रयोगशालाएँ
दक्षिण भारत, असम, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर राज्यों में इस तकनीक का सफल उपयोग हुआ है।
अफ्रीका में उपयोग
अफ्रीकी देशों में हाथियों के अवैध शिकार की समस्या बहुत गंभीर है। वहाँ डीएनए तकनीक का उपयोगः हाथी दांत तस्करी पकड़ने प्रवास मार्ग समझने जनसंख्या गिरावट का अध्ययन करने के लिए किया जा रहा है।
चुनौतियाँ
हालाँकि यह तकनीक अत्यंत उपयोगी है, फिर भी कुछ समस्याएँ हैंः
1. उच्च लागत
डीएनए विश्लेषण महँगा होता है।
2. तकनीकी विशेषज्ञता
विशेष प्रयोगशालाओं और प्रशिक्षित वैज्ञानिकों की आवश्यकता होती है।
3. नमूनों का खराब होना
गर्मी, नमी और बारिश से डीएनए नष्ट हो सकता है।
4. समय की आवश्यकता
नमूना संग्रह से परिणाम तक कई सप्ताह लग सकते हैं।
भविष्य की संभावनाएँ
भविष्य में डीएनए तकनीक और अधिक उन्नत होने की संभावना है। अब वैज्ञानिक “एनवायर्नमेंटल डीएनए (इ-डीएनए)” पर भी काम कर रहे हैं, जिसमें पानी, मिट्टी और हवा से डीएनए खोजकर जानवरों की उपस्थिति का पता लगाया जाता है। आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग के साथ मिलकर डीएनए विश्लेषण और तेज तथा सटीक बन सकता है।
निष्कर्ष
डीएनए आधारित हाथी जनसंख्या अनुमान तकनीक वन्यजीव संरक्षण में एक बड़ी उपलब्धि है। यह वैज्ञानिकों को बिना जानवरों को परेशान किए उनकी संख्या, आनुवंशिक विविधता और प्रवास के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती है। आज जब हाथियों के अस्तित्व पर कई खतरे मंडरा रहे हैं, तब ऐसी आधुनिक तकनीकें संरक्षण प्रयासों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। यदि सरकारें, वैज्ञानिक संस्थान और स्थानीय समुदाय मिलकर कार्य करें, तो भविष्य में हाथियों की आबादी को सुरक्षित रखा जा सकता है। डीएनए तकनीक केवल एक वैज्ञानिक उपकरण नहीं, बल्कि वन्यजीवों के संरक्षण की दिशा में मानवता की जिम्मेदारी का प्रतीक भी है।

 

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