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हवा साफ करने वाला काई यंत्र

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हवा साफ करने वाला काई यंत्र

भोपाल के स्वामी विवेकानंद पार्क में 1 मई 2026 को आधिकारिक रूप से उद्घाटित और स्थापित किया गया देश का पहला ‘एल्गी ट्री‘ एयर प्यूरीफायर, जो 25 पेड़ों के बराबर हवा साफ करेगा...

हवा साफ करने वाला काई यंत्र

Your Right To Info
डॉ. मोनिका रघुवंशी
राष्ट्रीय समन्वयक (एन.वाई.पी.बी.), उपाध्यक्ष (अ.सा.मि.म.), डॉक्टरेट ऑफ फिलॉसफी (ग्रीन मार्केटिंग), एम.बी.ए.(ट्रिपल विशेषज्ञता- मार्केटिंग, फाइनेंस व बैंकिंग), प्रमाणित कंप्यूटर, फ्रेंच और उपभोक्ता संरक्षण कोर्स प्राप्त, 350 प्रमाणित अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कार्यक्रमों में भाग लिया, 65 अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पत्रिका लेख प्रकाशित, राष्ट्रीय समाचार पत्रों में सक्रिय लेखक (700 लेख प्रकाशित), 20 राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त, 55 ऑनलाइन और ऑफलाइन एन.जी.ओ. कार्यक्रम आयोजक
हवा साफ करने वाला काई यंत्र एक ऐसा शहरी उपकरण है जिसमें सूक्ष्म काई को पानी वाले पारदर्शी टैंक में रखा जाता है और पंखे या पम्प की मदद से प्रदूषित हवा उसमें से गुजारी जाती है। इस दौरान काई कार्बन डाइऑक्साइड को सोखती है और प्रकाश-संश्लेषण के जरिए ऑक्सीजन छोड़ती है, इसलिए इसे “कृत्रिम पेड़” जैसा समाधान माना जाता है। सरल भाषा में समझें तो यह सामान्य एयर प्यूरीफायर जैसा सिर्फ कमरे की हवा साफ करने वाला उपकरण नहीं है, बल्कि खुले शहर के लिए बनाया गया सिस्टम है। इसमें हवा पहले फिल्टर से गुजरती है, जिससे धूल और महीन कण कम होते हैं और फिर काई वाले द्रव में से निकलती है, जहाँ गैसों का आदान-प्रदान होता है।
क्या है काई से चलने वाला यंत्र
‘‘शैवाल या काई यंत्र‘‘ एक पारदर्शी, तीन मीटर ऊँचा सौर-चालित फोटोबायोरिएक्टर है जिसमें तरल माइक्रोएलगाई (सूक्ष्म शैवाल) की कल्चर भरी रहती है। यह हवा खींचकर उसे मल्टी-स्टेज फिल्टर के बाद अल्गल कल्चर के भीतर बुलबुलों के रूप में पास करता है। काई कॉर्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर ऑक्सीजन बनाती हैं और फिल्टर कणों को रोकते हैं। इस तरह शहरी हवा साफ होती है। इसे मशरूम वर्ल्ड ग्रुप ने विकसित किया है। दो वर्षों में लगभग पचास पर्यावरण विशेषज्ञों की टीम ने शोध किया। भोपाल के कुछ केंद्रों पर शुरू हो चुका है और अन्य शहरों में भी परिनियोजन हो रहा है।
कैसे काम करता है
ऊपर लगे सौर पैनल संपूर्ण सिस्टम को विद्युत देते हैं। पम्प, सेंसर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसध्कृत्रिम बुद्धिमत्ता से ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ती है। एयर इनटेक व प्री-फिल्ट्रेशन बेस पर लगे पम्प बाहर की हवा खींचते हैं। प्राथमिक स्टेज में बड़े कण जैसे धूल हटते हैं। इससे बाद की बायोलॉजिकल प्रक्रिया बाधित नहीं होती। फोटोबायोरिएक्टर सिलिंडर एक पारदर्शी सिलिंडर है जिसमें तरल माध्यम में मिली माइक्रोएल्गी रहती है। हवा बुलबुलों के रूप में नीचे से ऊपर जाती है। इससे कार्बन डाइऑक्साइड सॉल्यूबिलिटी बढ़ती है और काई तेजी से फोटोसिंथेसिस कर पाती हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसध्कृत्रिम बुद्धिमत्ता ऑटोमेशन, पोषक तत्व स्तर, तापमान, प्रकाश तीव्रता और शैवाल घनत्व मॉनिटर करते हैं।आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-कृत्रिम बुद्धिमत्ता नियंत्रण पोषण, सर्कुलेशन रेट और बबलिंग आदि समायोजित कर के अधिकतम कार्बन कैप्चर और ऑक्सीजन उत्पादन बनाए रखता है।
आउटपुट
साफ हवा और ऑक्सीजन निकलती है। अल्गल बायोमास या काई का कचरा समय≤ पर निकाला जा सकता है। यदि उपयोग किया जाए तो बायोफर्टिलाइजर, बायोएनर्जी या अन्य उपयोग के लिए भी काम होता है।
प्रदर्शन और दावें
वास्तविक अर्थ में एक यूनिट सालाना औसतन डेढ़ टन कॉर्बन डाइऑक्साइड लेती है और लगभग एक टन ऑक्सीजन छोड़ती है। निर्माता का कहना कि यह पच्चीस परिपक्व पेड़ों के बराबर प्रभाव देता है। स्थानीय कण प्रदूषण पैंतालिस से पचपन प्रतिशत तक कमी का दावा है। यह प्रभाव पंद्रह मीटर के घेरे में मापा गया है। छोटे-छोटे जंक्शनों, बाजारों और बायपास क्षेत्रों में यह विशेष रूप से उपयोगी है जहाँ जमीन पर पेड़ लगाना मुश्किल है।
ऊर्जा-लागत और प्रति टन कैप्चर
सालाना संचालन खर्च दो लाख दस हजार से सवा चार लाख रुपए लगभग है। यह कार्बन कैप्चर टेक्नोलॉजी के मानदंडों में प्रतिस्पर्धी है, खासकर यदि स्थानीय एयर-क्वालिटी में तत्काल सुधार की आवश्यकता हो।
फायदे 
जगह बचत में उपयोगी है। स्मार्ट सिटी परिदृश्यों में जहां जमीन सीमित है, यह ऊर्ध्वाधर और विकल्पीय समाधान देता है। क्षेत्रीय प्रदूषण और गैस अनुपातों में तत्काल सकारात्मक प्रभाव दिख सकता है। ऊर्जा आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करता है। सोलर पैनलों के कारण चलाने की जरूरत कम पड़ती है और वेगन ऑपरेशन संभव है।मॉड्युलर और स्केलेबल भी है। कई यूनिट अलग-अलग ठिकानों पर तैनात की जा सकती हैं। शहरी जागरूकता में लोगों को प्रदूषण-समाधान के प्रति संवेदनशील बनाकर व्यवहारगत बदलाव में मदद करता है। संभावित कचरा सह-उपयोग होता है। निकले हुए अल्गल बायोमास का उर्वरक या बायोप्रोडक्ट्स में उपयोग किया जा सकता है।
सीमाएँ और चुनौतियाँ 
प्रदर्शन का वास्तविक डेटा देता है। निर्माता के दावों की स्वतंत्र, परीक्षण रिपोर्टों की जरुरत होती है। प्रयोगशाला में नियंत्रित परिदृश्यों में उपलब्ध आंकड़े अक्सर शहर की विविध परिस्थितियों में अलग दिखते हैं। स्थानिक प्रभाव सीमित है। पंद्रह मीटर का प्रभाव क्षेत्र बहुत स्थानीय है। यह पेड़ों का विकल्प नहीं, पूरक है। रखरखाव और बायो-सुरक्षा आवश्यक है। अल्गी कल्चर को स्वस्थ रखना, पोषक तत्व देना और संक्रमण से बचाना जरूरी है। खराब रखरखाव से प्रभाव घट सकता है। प्रारम्भिक निवेश और सालाना रखरखाव लागत कुछ नगरपालिकाओं के लिए बड़ा भार हो सकता है। आर्थिक मॉडल पर निर्भर करता है कि ये यूनिट किस हद तक व्यापक रूप से अपनाए जाएँ। मौसम पर निर्भरता है। लगातार सौर-उर्जा पर निर्भरता बादलों व मौसम से प्रभावित हो सकती है, हालाँकि बैकअप ग्रिड या बैटरी से समाधान मिल सकता है। अल्गल बायोमास प्रबंधन आवश्यक है। निकले हुए शैवालों का सुरक्षित निपटान या उपयोग जरूरी है, अन्यथा गंध व कीट आदि समस्याएँ हो सकती हैं। 
कहां सबसे उपयोगी हैं
बाजार, बस-स्टॉप, रेलवे प्लेटफार्म के पास जहाँ पेड-पौधे लगाना कठिन है। तंग चैराहे और व्यस्त फुटपाथ जिनमें वाहन-निर्गमन अधिक हो। स्कूल और अस्पताल के पास जहाँ तुरंत बेहतर हवा लाभप्रद है। ऐतिहासिक व कंक्रीट जोन जहाँ जड़ों के लिए जगह न हो। 
आगे की संभावनाएँ और अनुसंधान की आवश्यकताएँ
स्वतंत्र परीक्षण और मानकीकरण जरूरी है। सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियों और विश्वविद्यालयों द्वारा दीर्घकालिक फील्ड-स्टडी जरूरी है, ताकि प्रभाव, जीवनकाल और लागत-लाभ स्पष्ट हों। हाइब्रिड समाधान चाहिए होते हैं जैसे अल्गा टावर, पारंपरिक पेड़ व सड़क-साइड कमी नीतियाँ जैसे एफिल्टरेशन, वाहनों का इलेक्ट्रिफिकेशन मिलाकर बेहतर परिणाम देंगे। बायोमास वैल्यू-चेन बनती है। निकले हुए अल्गी का उपयोग उर्वरक, पशु-चारा, बायोफ्यूल या औद्योगिक बायओप्रोडक्ट में करके आर्थिक रिटर्न बढ़ाया जा सकता है। स्मार्ट नेटवर्किंग में शामिल है। कई यूनिटों का नेटवर्क बनाकर स्थानीय एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग और प्रतिक्रिया कर सकते हैं। बड़े पैमाने पर उत्पादन और टेक्नोलॉजी परिनियोजन से प्रति यूनिट लागत घट सकती है, जिससे छोटी नगरपालिकाएँ भी अपनाएँगी।
 

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