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भारतीय हॉग(पाढ़ा)ः गैर संरक्षित क्षेत्रों में नष्ट होती इनकी विशाल संख्या

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भारतीय हॉग(पाढ़ा)ः गैर संरक्षित क्षेत्रों में नष्ट होती इनकी विशाल संख्या

भारतीय हॉग डियर जिसे पाढ़ा भी कहते हैं, एक छोटी आकार की हिरण प्रजाति है, जिसका शरीर अन्य अनेक हिरणों के मुकाबले चपटा और मोटा होता है। ये सूअर की तरह आगे की ओर झुककर चलते हैं जिसके कारण ही इन्हें हॉग डियर नाम दिया गया...

भारतीय हॉग(पाढ़ा)ः गैर संरक्षित क्षेत्रों में नष्ट होती इनकी विशाल संख्या

Talking Point
अभिषेक दुबे
प्रकृति एवं पशु संरक्षण कार्यकर्ता, नेचर क्लब फाउंडेशन, गोण्डा (उप्र)
भारतीय हॉग डियर जिसे पाढ़ा भी कहते हैं, एक छोटी आकार की हिरण प्रजाति है, जिसका शरीर अन्य अनेक हिरणों के मुकाबले चपटा और मोटा होता है। ये सूअर की तरह आगे की ओर झुककर चलते हैं जिसके कारण ही इन्हें हॉग डियर नाम दिया गया। ये प्राणी अक्सर एक दो की संख्या में ही रहना पसंद करते हैं लेकिन कभी कभी यह झुंड बड़ा भी हो सकता है। यह प्रजाति घने घास के मैदानों, दलदली मैदानों और नदी के बाढ़ क्षेत्रों में पाई जाती है। अपने आकार के कारण यह घासों में तेजी से छिपने और ग्रासलैंड के छोटे पैच में भी जीवन बिताने के अनुकूल है। रात में और अंधेरे के समय यह अधिक सक्रिय रहती है, और दिन में घास-झाड़ियों व निचले वनस्पति में छिपकर रहती है। इनके प्रजनन, चारा और आश्रय की उपलब्धता सीधे इन घास के मैदानों की स्थिति पर निर्भर करती है।
दुर्भाग्यवश, हॉग डियर की वैश्विक और भारत की स्थितियाँ चिंताजनक हैं। आईयूसीएन की रेड लिस्ट में इसे संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है, जिसका अर्थ है कि इसके अस्तित्व पर वास्तविक खतरा मंडरा रहा है। भारत में कई क्षेत्रों में इसकी संख्या पहले के मुकाबले बहुत घट गई है। यह खास तौर से उन प्रजातियों में है जिनका संरक्षण पारंपरिक आरक्षित वनों जैसे नेशनल पार्क, वाइल्डलाइफ सेंचुरी तक सीमित नहीं रखा जा सकता, क्योंकि इनका मुख्य पर्यावास कृषि-क्षेत्रों, नदियों के बाढ़ क्षेत्र और सामुदायिक जमीनों में है, ऐसे इलाके जो अक्सर संरक्षित नहीं होते और जिनका प्रबंधन संगठित रूप से नहीं होता।
गोण्डा के टेढ़ी और सरयू नदियों के बाढ़ के मैदानों में हॉग डियर का एक महत्वपूर्ण एवं शायद असाधारण घनत्व मौजूद है। हमारे स्थानीय सर्वे, हर वर्ष घायल होने वाले पाढ़ा की सैकड़ों में संख्या, और क्षेत्रीय अवलोकन बताते हैं कि यहां की बाढ़ के मैदानों वाली घासभूमियों में सैकड़ों से लेकर हजारों तक हॉग डियर पाए जाते हैं और यह संख्या कई संरक्षित वनक्षेत्रों में मिलने वाले आंकड़ों से कहीं अधिक हो सकती है। यह तथ्य एक चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि इन महत्वपूर्ण पर्यावासों एवं संख्याओं का संरक्षण इनके पर्यावास के संरक्षण, जनजागरूकता एवं स्पष्ट नियमों के बिना मुश्किल है और अवसर इसलिए कि उचित नीतियों और सामुदायिक सहभागिता से बड़ी संख्याओं में जीवों का संरक्षण प्रभावी रूप से किया जा सकता है।
हालांकि, इन इलाकों में हॉग डियर के लिए खतरे कई स्रोतों से उभर रहे हैं। सबसे बड़ा खतरा इनके पर्यावास का विनाश है। स्थानीय खेती, घास की कटाई और कृषि विस्तार के कारण त्योहारों और गर्मियों के महीनों में घासभूमियाँ पूरी तरह खाली कर दी जाती हैं। अप्रैल आते-आते गेंहू और गन्ना की कटाई एवं अन्य फसल-तैयारी का काम शुरू हो जाता है, जिससे विशेषकर गर्मियों के दौरान आश्रय व इनके छिपने वाली वनस्पति मिट जाती है। गर्मी के मौसम में जब छुपने की जगह कम रह जाती है, तो हिरण खुले में चले आते हैं और सड़क दुर्घटनाओं, कुत्तों के हमले तथा खेतों व खुले मैदानों में लगे कंटीले तारों से जख्मी हो जाते हैं। 
कानूनी संरक्षण की कमी भी मुख्य समस्या है। भारत में वन्यजीव कानून और संरक्षण नीतियाँ व्यापक रूप से मौजूद हैं, पर अधिकांश कानूनी संरक्षित क्षेत्र जैसे नेशनल पार्क, वाइल्डलाइफ सेंचुरी और ज्यादातर पहाड़ी और जंगल वाले परिदृश्यों पर केंद्रित हैं। बाढ़ क्षेत्र, सामुदायिक घासभूमि और नदी के किनारे के दलदली मैदान अक्सर कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर रहते हैं। हॉग डियर जैसे प्राणी जिनका भारी हिस्सा इन असुरक्षित बाढ़ के मैदानों में रहता है जिससे वे अतिसंवेदनशील बन जाते हैं। इसलिए सिर्फ प्रजाति पर कड़े कानून लागू करने से समाधान नहीं होगा बल्कि इन महत्वपूर्ण पर्यावासों के कानूनी और प्रशासनिक संरक्षण जरूरी है।
नदियों के बाढ़ क्षेत्र को उनके उच्च बाढ़ स्तर अर्थात मानसून के दौरान नदियों अपने बाएं और दाएं जितना फैलती है, उसके अंदर संरक्षित कराना एक व्यवहारिक और बेहतरीन रणनीति होगी। यदि सरकारें और स्थानीय प्रशासन इन बाढ़ क्षेत्रों को उनके अधिकतम फैलाव के आधार पर संरक्षित क्षेत्र या नियंत्रित उपयोग क्षेत्र घोषित करें, तो ये भूमि निर्माण, भारी कृषि विस्तार और घास की अत्यधिक कटाई से बच सकती हैं। संपूर्ण बाढ़ क्षेत्र के संरक्षण का एक बड़ा लाभ यह भी है कि बाढ़ के मौसम में ये क्षेत्र स्वाभाविक रूप से संरक्षण के लिए उपयुक्त श्रेणी में रखे जाते हैं और मानवीय गतिविधियों की सीमाएं तय किए जा सकते हैं, जैसे सीमित चराई, घासों की कटाई के स्पष्ट नियम जिसमें 20 प्रतिशत से अधिक घासें न काटी जाएं, जो हॉग डियर व अन्य जैवविविधता के लिए सहायक होगी।
इसके साथ-साथ कुछ तत्काल प्रबंधकीय कदम आवश्यक हैं जैसे स्थानीय घासभूमि प्रबंधन जिसमें घास की कटाई के समय और स्थान के लिए नियम निर्धारित करें जैसे स्थान बदल बदल कर घासों की कटाई, बफर जोन और घासों की कटाई के निषिद्ध क्षेत्र बनाए जाएं ताकि उनके छिपने के स्थान और भोजन संरक्षित रहे। एनिमल बर्थ कंट्रोल रूल्स के तहत कुत्तों की नसबंदी किया जाए। अवरोधों का निवारण हो अर्थात आसान और घायल न करने वाली सुरक्षा बाड़ ही लगाया जाए, खेतों और सड़क किनारे खतरनाक कंटीले तार हटवाएं। सड़क सुरक्षा के लिए जगह जगह ऐसे संकेत लगाए जाएं जिसमें बाढ़ क्षेत्रों के पार और उनके आसपास वाली सड़कों पर गति-सीमाएँ, चेतावनी संकेत और रात के समय कम-आकर्षक रोशनी का प्रयोग किया जाए, चिकित्सा सहायता को मजबूत किया जाए जिसमें वेटनरी डॉक्टर और पैरा वेट का इस प्रकार प्रशिक्षण हो कि वे हॉग डियर के उपचार संबंधी चुनौतियों एवं सावधानियों को बेहतर समझें ताकि कार्डियो मायोपैथी की समस्या न हो, इसके साथ वन्यजीव-मित्र वॉलंटियर नेटवर्क तैयार करना भी बड़ा आवश्यक है जो जन जागरूकता, हॉग डियर की संख्या, उनके घायल होने पर आवश्यक प्राथमिक उपाय आदि को गति दिला सकें। इसके अतरिक्त गांवों के साथ सामुदायिक सहयोग भी बढ़ाना चाहिए जिसमें स्थानीय लोगों को रोजगार में सहयोग देने वाले संरक्षण मॉडल जैसे घास कटाई पर उचित मुआवजा, इको टूरिज्म, या संरक्षण-सम्बन्धी स्वयंसेवक गतिविधियाँ जैसे हॉग डियर के प्रति सहानुभूति और सहयोग बढ़ाया जाए।
नीति हस्तक्षेपों के स्तर पर निम्नलिखित कदम सुझाए जा सकते हैं जैसे उच्च बाढ़ स्तर आधारित संरक्षण नीति को स्थानीय जिला और राज्य स्तर पर अपनाया जाए, जिससे औपचारिक मान्यता और बजट आवंटन संभव हो। माननीय नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने घिर्राऊ लाल एवं एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के एक मामले में भी टेढ़ी नदी की मध्य धारा के 200 मीटर दाहिने एवं बाएं किसी भी निर्माण को प्रतिबंधित किया है। इस नीति से भी नदियों के बाढ़ क्षेत्रों के संरक्षण में भारी मदद मिल सकती है। नदी के बाढ़ क्षेत्र की पारिस्थितिक पहचान कर वो स्थान चिन्हित करना जहाँ हॉग डियर और अन्य संवेदनशील प्रजातियाँ निर्भर करती हैं, और इन इलाकों के लिए विशेष प्रबंधन योजनाएँ बनाना चाहिए। इसके साथ कृषि-नीति और सिंचाई योजनाओं में भी समन्वय हो ताकि बाढ़-मैदानों की पारिस्थितिक भूमिकाओं को प्राथमिकता दी जाए, और ऐसे उपयोग प्रतिबंधित हों जो इनके पर्यावासों को नष्ट करें। सामुदायिक अधिकारों और भू-उपयोग योजनाओं में बदलाव ताकि स्थानीय समुदायों को संरक्षण के निर्णयों में निर्णायक प्रतिनिधित्व मिले।
टीएसए फाउंडेशन इंडिया एवं नेचर क्लब फाउंडेशन साथ में मिलकर गोण्डा जनपद में हॉग डियर के संरक्षण हेतु प्रयास शुरू करने जा रहे हैं जिसमें ग्राम-स्तर पर वालेंटियर आधारित निगरानी नेटवर्क, घायल या बीमार हॉग डियर के लिए त्वरित-रिस्पॉन्स टीम, और स्कूलों तथा पंचायतों में जागरूकता कार्यक्रम प्रभावी साबित हो सकते हैं। कुछ उपयोगी क्रियाएँ तुरंत शुरू किया जाना है जिसमें गांवों में हॉग डियर संरक्षण समूह‘ बनाना और जोखिम-रिपोर्टिंग के लिये फोनध्व्हाट्सऐप हॉटलाइन स्थापित करना है। कंटीले तारों की निगरानी व उन्हें हटाने के लिए अभियान चलाना भी इसका हिस्सा है। खेतों में वन्यजीवों के अनुकूल गतिविधियों के लिए किसानों को प्रशिक्षण व आर्थिक प्रोत्साहन देना भी हमारी योजनाओं में रहेगा। स्थानीय विद्यालयों में प्रकृति शिक्षा व हॉग डियर के संरक्षण में जुड़ने के इच्छुक युवाओं को प्रशिक्षित करना भी अहम कार्य रहेगा।
अंत में यह स्पष्ट है कि हॉग डियर का संरक्षण केवल जैवविविधता की रक्षा नहीं है, बल्कि नदियों के बाढ़ क्षेत्र के पारिस्थितिकी और गांवों की दीर्घकालिक भलाई से जुड़ा सवाल है। जब तक हम नदियों के साथ रहने के पारंपरिक और पारिस्थितिक समझ को नई नीतियों और सामुदायिक सहभागिता के साथ जोड़कर नहीं अपनाएंगे, तब तक यह प्रजाति और उसके पर्यावास लगातार खतरे में रहेंगे। हॉग डियर की जो विशाल संख्या इन नदियों के बाढ़ क्षेत्रों में मौजूद है, वह एक बड़ी उम्मीद है कि यदि संगठित संरक्षण कदमों, कानूनी मान्यता और ग्राम-स्तरीय सहयोग के साथ इसे जोड़ा जाए तो गोण्डा के हॉग डियर आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकते हैं और लोगों के लिए कई तरह के अवसरों के द्वार भी खोल सकते हैं।

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