Specialist's Corner
प्रशान्त कुमार वर्तमान में उत्तराखण्ड वन विभाग में वरिष्ठ परियोजना सहयोगी (वन्यजीव) के पद पर कार्यरत हैं तथा पिछले सात वर्षों से वन्यजीव अपराध नियंत्रण एवं संरक्षण में प्रभावी शोध एवं विश्लेषण कार्य कर रहे है। इन्होंने लगभग पन्द्रह हजार से अधिक वन कर्मियों को वन्यजीव फॉरेंसिक एवं वन्यजीव संरक्षण विषय में प्रशिक्षित किया है तथा पांच सौ से अधिक प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन भी किया है। प्रशान्त कुमार, फॉरेंसिक विज्ञान में बीएससी तथा एमएससी है एवं वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक्स में फील्ड के अनुभवी हैं।
पिछले कुछ वर्षों में वन्यजीवों के प्रति लोगों की जागरूकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पहले जहाँ घर या ?खेत में साँप दि?खाई देने पर लोग घबराकर उसे मार देते थे, वहीं अब धीरे धीरे सोच में बदलाव आया है और कई लोग उसे सुरक्षित तरीके से पकड़कर जंगल में छोड़ने की बात करते हैं। पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता के दृष्टिकोण से यह बदलाव सकारात्मक माना जाता है। हालाँकि इसके साथ एक नई और चिंताजनक प्रवृत्ति भी सामने आने लगी है। कई युवा साँप रेस्क्यू के नाम पर बिना किसी प्रशिक्षण और उचित सुरक्षा के इस जोखिम भरे काम में उतर रहे हैं। कुछ इसे रोमांचक शौक के रूप में अपनाते हैं, जबकि कुछ लोग सोशल मीडिया पर लोकप्रियता पाने या आर्थिक लाभ की उम्मीद में इस दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रवृत्ति खतरनाक साबित हो सकती है। बिना अनुभव और सुरक्षा के साँप पकड़ने की कोशिश न केवल युवाओं की जान को जोखिम में डालती है, बल्कि आसपास मौजूद लोगों और स्वयं साँपों के लिए भी खतरा पैदा कर सकती है। इसलिए इस तरह के कार्य केवल प्रशिक्षित और अनुभवी लोगों द्वारा ही किए जाने चाहिए।
सोशल मीडिया ने बढ़ाया आकर्षण
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया का प्रभाव युवाओं पर काफी ज्यादा है। कई प्लेटफॉर्म पर साँप पकड़ने और रेस्क्यू से जुड़े वीडियो तेजी से वायरल होते हैं। इन वीडियो में लोग बड़े बड़े विषैले साँपों को हाथ में उठाते, गले में डालते या उन्हें नियंत्रित करते दिखाई देते हैं। इन दृश्यों को देखकर कई युवा प्रभावित हो जाते हैं और उन्हें लगता है कि यह काम बेहद आसान और रोमांचक है। परिणामस्वरूप वे भी बिना किसी प्रशिक्षण के साँप पकड़ने की कोशिश करने लगते हैं। असलियत यह है कि ऐसे वीडियो अक्सर प्रशिक्षित लोगों द्वारा बनाए जाते हैं या कई बार उनमें जोखिम को कम दिखाया जाता है। लेकिन युवा दर्शक इन बातों को समझ नहीं पाते और वही जोखिम भरा काम दोहराने लगते हैं।
शौक से शुरू होकर बन रहा पहचान का जरिया
कई युवाओं के लिए साँप रेस्क्यू शुरू में केवल एक शौक के रूप में शुरू होता है। उन्हें लगता है कि वे लोगों की मदद कर रहे हैं और एक अलग पहचान बना रहे हैं। धीरे-धीरे यह शौक एक प्रकार की सामाजिक पहचान का रूप ले लेता है। इलाके में किसी घर या खेत में साँप निकलने की खबर मिलते ही लोग ऐसे युवाओं को बुलाने लगते हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब बिना प्रशिक्षण के किया गया यह काम नियमित गतिविधि बन जाता है। ऐसे में छोटी सी गलती भी गंभीर हादसे में बदल सकती है।
पैसों का लालच भी बन रहा कारण
कुछ मामलों में देखा गया है कि साँप पकड़ने या रेस्क्यू करने के बदले लोगों से पैसे लिए जाते हैं। कई बार लोग स्वेच्छा से इनाम या सेवा शुल्क दे देते हैं। धीरे धीरे यह आर्थिक लाभ भी युवाओं को इस काम की ओर आकर्षित करने लगता है। कुछ लोग इसे एक तरह का काम समझकर अधिक से अधिक रेस्क्यू करने की कोशिश करते हैं। लेकिन समस्या यह है कि अधिकतर ऐसे लोग प्रशिक्षित नहीं होते, न ही उनके पास उचित उपकरण या सुरक्षा व्यवस्था होती है। आजकल कई युवा साँप रेस्क्यू को सिर्फ शौक या रोमांच नहीं बल्कि कमाई का जरिया भी बना रहे हैं। वे साँप पकड़ने या रेस्क्यू की पूरी प्रक्रिया का वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपलोड करते हैं। इन वीडियो पर व्यूज, लाइक और फॉलोअर्स बढ़ने के साथ साथ विज्ञापन और स्पॉन्सरशिप के जरिए पैसे भी कमाए जा रहे हैं। कुछ युवा सीधे कंटेंट क्रिएटर की तरह यह काम करते हैं। वीडियो में खतरे और रोमांच दिखाने से व्यूज तेजी से बढ़ते हैं, जिससे प्लेटफॉर्म से मिलने वाला रिवॉर्ड या प्रमोशन अधिक हो जाता है। कई बार लोग लाइव रेस्क्यू दिखाकर और डोनेशन लिंक जोड़कर भी पैसे कमाने की कोशिश करते हैं।
साँपों के लिए भी नुकसानदेह
बिना अनुभव के किया गया रेस्क्यू केवल इंसानों के लिए ही नहीं बल्कि साँपों के लिए भी हानिकारक होता है। गलत तरीके से पकड़ने पर साँप के शरीर को चोट लग सकती है। कई बार उसकी रीढ़ को नुकसान पहुँच जाता है या वह अत्यधिक तनाव में आ जाता है। इसके अलावा कई लोग रेस्क्यू के बाद साँप को उचित स्थान पर छोड़ने के बजाय दूर ले जाकर छोड़ देते हैं, जिससे वह अपने प्राकृतिक आवास से भटक सकता है।
पिछले कुछ समय में भारत में साँप रेस्क्यू के दौरान कई लोगों की मौत या गंभीर हादसे भी हुए हैं, खासकर जब वे बिना प्रशिक्षण/सुरक्षा के खुद ही साँपों को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। यहाँ कुछ वास्तविक घटना उदाहरण हैंः
वैशाली (बिहार) में एक अनुभवी साँप रेस्क्यूअर जेपी यादव कोबरा को पकड़ने की कोशिश के दौरान साँप ने काट लिया था, जिससे उनकी बाद में मौत हो गई।
समस्तीपुर (बिहार) के मशहूर ‘स्नेक मैन’ जय कुमार सहनी ने अपने जीवन में हजारों साँपों को बचाया था, लेकिन एक कोबरा को रेस्क्यू करते समय साँप ने उन्हें काट लिया और उनकी मौत हो गई।
मध्य प्रदेश के दीपक महावर, जो वर्षों से साँप बचाने का काम करते थे, को कोबरा ने काट लिया, उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उन्होंने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया।
तमिलनाडु में भी सन्तोष कुमार नामक रेस्क्यूअर को रसेल वाइपर ने काट लिया, जिससे उनकी मौत हुई, यह भी ऐसे ही जोखिम भरे काम का परिणाम था।
कुछ दुर्लभ लेकिन गंभीर मामलों में लोग साँप के विष का इस्तेमाल करके हत्या करने की कोशिश करते हैं और इसे साँपदंश या प्राकृतिक मौत दिखा देते हैं। ऐसे अपराधों में आरोपी जानबूझकर जहरीले साँप को पीड़ित के पास छोड़ देते हैं या उसका विष छुपकर इस्तेमाल करते हैं, ताकि मौत अचानक और सामान्य लगे। पुलिस और फॉरेंसिक विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह के मामलों का पता लगाना मुश्किल होता है, क्योंकि ग्रामीण इलाकों में साँपदंश से होने वाली मौतें आम मानी जाती हैं। यह न केवल गंभीर अपराध है बल्कि वन्यजीव संरक्षण और कानून दोनों का उल्लंघन भी है, और ऐसे कृत्य समाज और आसपास के लोगों के लिए भी खतरनाक साबित होते हैं। हल्द्वानी में एक कारोबारी अंकित चैहान की हत्या के मामले में पुलिस ने पाया कि उसकी प्रेमिका माही और उसके साथी ने साँप का इस्तेमाल किया था। आरोप है कि माही और उसके अन्य साथियों ने उसे शराब पिलाकर बेहोश किया और उसके बाद एक कोबरा साँप से कटवाकर हत्या का प्रयास किया। इस मामले में सपेरा सहित कई लोगों को गिरफ्तार किया गया था और पुलिस ने हत्या की धारा में एफआईआर भी दर्ज की थी।
जिम्मेदारी के साथ संरक्षण जरूरी
साँप प्रकृति के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे खेतों में चूहों और अन्य कीटों की संख्या नियंत्रित करके किसानों की मदद करते हैं। इसलिए उनका संरक्षण जरूरी है। लेकिन संरक्षण के नाम पर शौक या पैसों के लालच में जोखिम उठाना समझदारी नहीं है। जरूरत इस बात की है कि लोग जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करें और इस काम को प्रशिक्षित विशेषज्ञों पर ही छोड़ें। तभी इंसानों और वन्यजीवों के बीच सुरक्षित सह-अस्तित्व संभव हो सकेगा।
Expert Columns
Tree TakeMar 15, 2026 09:30 PM
साँप रेस्क्यू के नाम पर बढ़ती असावधानीः शौक और पैसों के लालच में जान का जोखिम ले रहे युवा
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया का प्रभाव युवाओं पर काफी ज्यादा है। कई प्लेटफॉर्म पर साँप पकड़ने और रेस्क्यू से जुड़े वीडियो तेजी से वायरल होते हैं। इन वीडियो में लोग बड़े बड़े विषैले साँपों को हाथ में उठाते, गले में डालते या उन्हें नियंत्रित करते दिखाई देते हैं...
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