A First-Of-Its-Kind Magazine On Environment Which Is For Nature, Of Nature, By Us (RNI No.: UPBIL/2016/66220)

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मैं प्रकृति का एक कर्जदार इंसान हूँ

TreeTake is a monthly bilingual colour magazine on environment that is fully committed to serving Mother Nature with well researched, interactive and engaging articles and lots of interesting info.

मैं प्रकृति का एक कर्जदार इंसान हूँ

प्रकृति के वजह से ही मेरा अस्तित्व है। हर पल प्रकृति के द्वारा हवा, पानी, भोजन आदि प्राप्त करके ही तो जीवित अवस्था में हूं।

मैं प्रकृति का एक कर्जदार इंसान हूँ

Selfless Souls
अंकुश दवे आगरा के रहने वाले एक पर्यावरणविद हैं जो घासों, कीड़ों आदि के विशेष जानकार हैं
प्रश्न: आप प्रकृति के कर्जदार कैसे हैं ? 
प्रकृति के वजह से ही मेरा अस्तित्व है। हर पल प्रकृति के द्वारा हवा, पानी, भोजन आदि प्राप्त करके ही तो जीवित अवस्था में हूं। 
प्रश्न: तो आप प्रकृति के इस कर्ज को कैसे लौटाते हैं ?
मैं कोशिश करता हूं कि कम से कम संसाधनों में अपना जीवन जिऊं और अपने कार्यों से प्रकृति के उन हिस्सों संरक्षण में योगदान दे पाऊं, जो मानव के द्वारा सबसे ज्यादा नष्ट किए गए हैं जिसमें प्रमुख रूप से विभिन्न पर्यावासों को उनकी मूल अवस्था में लाना है और इसमें भी मेरा ज्यादा ध्यान ग्रासलैंड और रेगिस्तानी पर्यावास पर हैं क्योंकि इन्हें बहुत अधिक नजरअंदाज किया जाता है।
प्रश्न: ग्रासलैंड और रेगिस्तानी पर्यावास का क्या महत्व है ?
प्रकृति में जो महत्व जंगलों, नदियों, वेटलैंड का है, वही महत्व घास के मैदानों और रेगिस्तान का भी है क्योंकि ये कई प्रकार की जीवों की प्रजातियों का प्राकृतिक आवास हैं और धरती के कई प्राकृतिक चक्रों में भी इनकी बड़ी भूमिका है। और जब ये पर्यावास बचेंगे तभी इनमें रहने वाले जीव जंतु भी बच पाएंगे।
प्रश्न: इन पर्यावासों में सबसे बड़ी समस्या आपको क्या दिखती है ?
इनकी मूल अवस्था में परिवर्तन सबसे गंभीर बात है। जैसे अगर एक ग्रासलैंड में खूब पेड़ लगाकर उसे जंगल बना देना, या रेगिस्तान में वेटलैंड बना देना या इनमें किसी तरह का निर्माण करना ये सब इसे बुरी तरह से प्रभावित करता है। क्योंकि एक ग्रासलैंड में रहने वाली जीवों की प्रजातियां जंगल में नहीं रह सकती हैं, रेगिस्तान की शुष्क जलवायु के हिसाब से हजारों साल में खुद को ढाल कर जीने वाली प्रजातियां और उनका पूरा जैवतंत्र उस स्थान के वेटलैंड में परिवर्तित हो जाने से नष्ट होने लगता है।
प्रश्न: परंतु लोगों को लगता है कि रेगिस्तान या ग्रासलैंड बंजर जमीनें हैं, वहां खूब हरियाली और जंगल लगा देने चाहिए। तो फिर यदि हम ग्रासलैंड या डेजर्ट की तुलना जंगलों से करें तो ये कितने महत्वपूर्ण हैं।
प्रकृति में जितना महत्व जंगलों का है, उतना ही ग्रासलैंड और डेजर्ट का है क्योंकि ये एक विशेष प्रकार की जैवविविधता का पोषण करते हैं। इसके साथ ही किसी भौगोलिक हिस्से में मौजूद जंगल, पहाड़, रेगिस्तान, ग्रासलैंड, वेटलैंड आदि वहां के विभिन्न प्राकृतिक चक्रों, वहां की जलवायु में विशेष भूमिका अदा करते हैं। यदि इनमें कोई भी प्रभावित होता है तो उसका दुष्प्रभाव सभी प्राकृतिक चक्रों और पूरी जलवायु पर पड़ता है। जैसे यदि हम रेगिस्तान में चैड़ी पत्तियों वाले जंगलों के पेड़ लगाएं तो वे रेगिस्तानी भूमि का ज्यादा पानी इस्तेमाल करेंगे और उस इलाके में जल संकट और अधिक बढ़ जाएगा। अर्थात जिस तरह जलवायु में परिवर्तन होने से वहां की जीव जंतुओं की प्रजातियां उसे एडॉप्ट नहीं कर पाती हैं और विलुप्त होने लगती हैं उसी तरह किसी पर्यावास की जीव जंतुओं की प्रजातियों या उनकी संख्या में बदलाव पूरी जलवायु को भी परिवर्तित करता है। 
प्रश्न: वर्तमान समय में भारत व दुनिया में लोग और सरकारें इन ग्रासलैंड और डेजर्ट के संरक्षण को लेकर इतना सजग हैं ? क्या इन्हें बचाने की समझ आपको समाज या सरकारों में दिख रही है ?

वर्तमान में तो लोगों और सरकारों का ध्यान कहीं युद्ध में है, कहीं युद्ध से खुद को बचाने में है, कहीं विकास में है तो कहीं खूब पैसा कमाने में है। ग्रासलैंड और डेजर्ट को वैसे ही लोग बेकार जमीन कहते आए हैं और आज उसका उसी भावना से और अधिक शोषण कर रहे हैं। जैसे गुजरात के कच्छ के ग्रासलैंड और डेजर्ट में आज बड़ी तेजी से उद्योग लगाए जा रहे हैं, कहीं पर खनन हो रहा है। कुछ समय पहले अरावली को भी उसकी ऊंचाई के आधार पर पहाड़ कहने या न कहने के सरकार के आदेश में भी यही लालच छिपी थी कि कैसे उसका अधिकाधिक हिस्सा हम खनन और विकास के लिए इस्तेमाल कर लें।
प्रश्न: आने वाले कुछ दशकों में आप इन ग्रासलैंड या डेजर्ट की क्या स्थिति देखते हैं ?
आने वाले समय में परिस्थितियां और भी ज्यादा खराब होने वाली हैं क्योंकि बढ़ती हुई जनसंख्या और पैसे कमाने की होड़ में अब लोग बचे खुचे ग्रासलैंड आदि में खेती करने लगे हैं, पशुओं की चराई कराई जाती है, बिल्डिंगें बन रही हैं। पहले जमीनें ज्यादा थीं तो लोग एक बार खेती करने जमीनों को कुछ साल के लिए छोड़ देते थे लेकिन अब बार बार जुताई और खेती और अन्य विकास कार्यों से ये पर्यावास हमेशा के लिए नष्ट हो रहे हैं। भारत में कुछ ही ग्रासलैंड या डेजर्ट संरक्षित क्षेत्रों में है। और अधिकांश ऐसे ग्रासलैंड नदियों के कछार में, गांवों में, पहाड़ों पर ऐसी जगह हैं जो राजस्व के अभिलेखों में लोगों की निजी भूमि के रूप में दर्ज हैं, या ग्रामसमाज आदि की भूमि के रूप में हैं और इसलिए ये लगातार नष्ट किए जा रहे हैं।
प्रश्न: यदि कोई व्यक्ति या युवा अपने आसपास के ग्रासलैंड आदि को बचाना चाहे तो क्या कर सकता है ?
हमें सबसे पहले उस ग्रासलैंड या डेजर्ट में मौजूद घासों, पौधों, जीव जंतुओं की प्रजातियों को डॉक्यूमेंट करना चाहिए। उसकी वर्तमान स्थिति, अतीत में उसकी स्थिति, उसपर मानवीय प्रभाव आदि का अवलोकन करके रिपोर्ट बनाकर स्थानीय प्रशासन, सरकार, मीडिया, पर्यावरणविदों से साझा करना चाहिए दिए उसके बारे में आसपास के स्कूलों, गांवों में जनजागरूकता का प्रसार हो। ऐसे पर्यावासों के महत्व और उनके नष्ट होने से उत्पन्न होने वाले खतरों के बारे में लोगों को बताया जाए। उसके बाद कुछ युवाओं के साथ मिलकर वहां यदि वह घासें, पौधे नष्ट हुए हैं तो उनका रोपण हो, मानवीय हस्तक्षेप, पशुओं की चराई पर सबको समझाकर रोक लगाने की कोशिश किया जाए। 
प्रश्न: यदि कोई अपने आसपास ऐसा ग्रासलैंड या डेजर्ट भूमि का संरक्षण करना चाहे और उसे मार्गदर्शन की आवश्यकता हो तो क्या करे।
तो ऐसे लोगों को आसपास के पर्यावरणविदों से संपर्क करना और उनके साथ जुड़ना चाहिए। यदि मुझसे कोई जानकारी या मार्गदर्शन चाहिए तो मैं भी इसमें मदद कर सकता हूं।                                      -इंटरव्यू अभिषेक दुबे द्वारा 
 

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