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डॉ. मोनिका रघुवंशी
लेखिका, पत्रकार एवम् सामाजिक कार्यकर्ता
राष्ट्रीय समन्वयक (एन.वाई.पी.बी.), डॉक्टरेट ऑफ फिलॉसफी (ग्रीन मार्केटिंग), एम.बी.ए.(ट्रिपल विशेषज्ञता- मार्केटिंग, फाइनेंस व बैंकिंग), प्रमाणित कंप्यूटर, फ्रेंच और उपभोक्ता संरक्षण कोर्स प्राप्त, 550 प्रमाणित अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कार्यक्रमों में भाग लिया, 70 अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पत्रिका लेख प्रकाशित, राष्ट्रीय समाचार पत्रों में सक्रिय लेखक (750 लेख प्रकाशित), 20 राष्ट्रीय पुरस्कार, 150 ऑनलाइन और ऑफलाइन एन.जी.ओ. कार्यक्रम आयोजक।
हाल के वर्षों में पेड़ों और हरे-भरे पौधों को नुकसान पहुँचाने की घटनाएँ कई जगहों पर सामने आई हैं। इनमें सबसे चिंताजनक बात यह है कि कुछ लोग निर्माण कार्य, प्लॉटिंग, जमीन खाली कराने या किसी अन्य निजी स्वार्थ के लिए पेड़ों को धीरे-धीरे सुखाने की कोशिश करते हैं। यह काम अकसर बहुत चालाकी से किया जाता है, ताकि बाहर से देखने पर लगे कि पेड़ स्वाभाविक रूप से सूख रहे हैं, जबकि असली कारण उनके भीतर पहुँचाया गया रसायन या अन्य हानिकारक पदार्थ होता है। ऐसे मामलों में पेड़ एक-दो दिन में नहीं मरते, बल्कि कुछ समय के बाद उनकी पत्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं, तना कमजोर हो जाता है और धीरे-धीरे पूरा पेड़ सूखकर खड़ा रह जाता है। कई बार आसपास के लोग इसे मौसम, बीमारी या पानी की कमी समझ लेते हैं, लेकिन जांच होने पर सच्चाई कुछ और निकलती है। जो पेड़ काटता है वो एक बार मारता है, जो पेड़ सुखाता है वो पूरी पीढ़ी की हवा मारता है।
संदेहजनक मामले सामने आए
यह समस्या केवल किसी एक इलाके तक सीमित नहीं है। भारत के कई शहरों में ऐसे संदेहजनक मामले सामने आए हैं, जहाँ पेड़ों के असामान्य रूप से सूखने पर शिकायत दर्ज कराई गई। लुधियाना के दुगरी इलाके में सड़क किनारे खड़े कुछ पेड़ों और छोटे पौधों के अचानक सूखने पर लोगों ने आशंका जताई कि उन्हें जानबूझकर नुकसान पहुँचाया गया है। शिकायत के बाद पुलिस और संबंधित विभागों ने जांच शुरू की। इसी तरह मुंबई के कुछ हिस्सों में भी पेड़ों को काटने, नुकसान पहुँचाने और जहरीला करने की घटनाएँ सामने आईं। इन मामलों में नगर निगम और पुलिस ने कार्रवाई की। भोपाल में भी पेड़ों को रसायन डालकर नुकसान पहुँचाने के आरोपों पर जांच हुई और अधिकारियों को रिपोर्ट देने के निर्देश मिले। इन घटनाओं से यह साफ होता है कि हरियाली को नुकसान पहुँचाने की प्रवृत्ति अब गंभीर रूप ले चुकी है। ऐसे मामलों में सबसे ज्यादा चिंता की बात यह होती है कि पेड़ों को नुकसान पहुँचाने के तरीके बहुत छिपे हुए होते हैं। कुछ लोग पेड़ की जड़ों के पास मिट्टी में छेद करके उसमें रसायन डाल देते हैं। कुछ तने की छाल में छोटे-छोटे छेद करके भीतर विषैला पदार्थ भरते हैं। इससे पेड़ धीरे-धीरे अंदर से कमजोर होने लगता है। कभी-कभी तने की बाहरी परत पर रसायन लगाया जाता है, जिससे पेड़ की जीवन-प्रक्रिया बाधित होती है। कुछ मामलों में पत्तियों पर स्प्रे किया जाता है, लेकिन यह तरीका जल्दी पकड़ में आ सकता है। सबसे खतरनाक तरीका वही माना जाता है जिसमें जड़ों या तने के भीतर रसायन पहुंचाया जाता है, क्योंकि इससे पेड़ बाहर से कुछ समय तक सामान्य दिखता रहता है। बाद में जब उसका सूखना शुरू होता है, तब लोग समझते हैं कि शायद वह प्राकृतिक कारणों से मरा है। दुकान दिखाने के लिए पेड़ छुपाओगे, तो कल सांस लेने के लिए हवा कहाँ से लाओगे?
मिट्टी, जड़ों, तने और पत्तियों के नमूने से विश्लेषण
वनस्पति विशेषज्ञों और पर्यावरण से जुड़े लोगों का कहना है कि किसी पेड़ के अचानक और अलग-अलग ढंग से सूखने को हल्के में नहीं लेना चाहिए। यदि एक ही पंक्ति या एक ही भूखंड में कुछ पेड़ मर जाएँ और बाकी पेड़ स्वस्थ रहें, तो यह संदेह का विषय बनता है। यही कारण है कि ऐसे मामलों की वैज्ञानिक जांच बहुत जरूरी होती है। मिट्टी, जड़ों, तने और पत्तियों के नमूने लेकर उनका विश्लेषण किया जाता है। अगर उनमें कोई हानिकारक रसायन पाया जाता है, तो यह साफ हो सकता है कि पेड़ को प्राकृतिक रूप से नहीं, बल्कि जानबूझकर नुकसान पहुँचाया गया है। कई बार तने में ड्रिल के निशान, असामान्य छेद, जली हुई छाल या आसपास बिखरे रसायन के अवशेष भी जांच में मदद करते हैं। पेड़ सूखते नहीं, सुकाए जाते हैं - और इसके पीछे लालच की जड़ें होती हैं।
सूखने पर संदेह हो, तो स्थल निरीक्षण
भारत में ऐसे मामलों को लेकर प्रशासन की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। नगर निगम, वन विभाग, पुलिस और पर्यावरण से जुड़ी एजेंसियों को ऐसे संदेहजनक मामलों पर तुरंत ध्यान देना चाहिए। यदि किसी पेड़ के सूखने पर संदेह हो, तो तुरंत स्थल निरीक्षण होना चाहिए। प्रभावित क्षेत्र की तस्वीरें, वीडियो, तने और मिट्टी के नमूने सुरक्षित किए जाने चाहिए। गवाहों के बयान दर्ज होने चाहिए और आसपास के सीसी टीवी कैमरों की जांच की जानी चाहिए। कई बार इस तरह की जांच से यह पता चल जाता है कि पेड़ों के पास संदिग्ध व्यक्ति देखा गया था या वहां कोई मशीन, ड्रिल या केमिकल की बोतल पाई गई थी। यदि समय पर कदम उठाए जाएँ, तो दोषियों तक पहुँचना आसान हो जाता है। एक पेड़ का सूखना सिर्फ एक मौत नहीं, सैकड़ों पक्षियों के घर का उजड़ना है।
पूरा प्राकृतिक संतुलन नष्ट
इन घटनाओं को केवल पेड़ों की क्षति के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसका असर पूरे पर्यावरण पर पड़ता है। पेड़ हवा को साफ करते हैं, धूल को रोकते हैं, तापमान को कम करते हैं और बारिश के पानी को जमीन में समाने में मदद करते हैं। जब पेड़ कम होते हैं, तो गर्मी बढ़ती है, हवा भारी लगती है और आसपास का वातावरण अधिक प्रदूषित हो जाता है। शहरों में जहां पहले से ही कंक्रीट और वाहनों का दबाव बहुत है, वहां पेड़ों का कम होना जीवन की गुणवत्ता को सीधे प्रभावित करता है। पेड़ पक्षियों, मधुमक्खियों और छोटे जीवों का घर भी होते हैं। यदि पेड़ नष्ट हो जाते हैं, तो उनका पूरा प्राकृतिक संतुलन टूट जाता है। इसलिए हर पेड़ केवल लकड़ी का ढांचा नहीं, बल्कि एक जीवित पर्यावरणीय इकाई है। हरियाली कुदरती नहीं मरती, इंसानी नियत मारती है।
कानून की दृष्टि से भी गंभीर अपराध
कई बार यह भी देखा गया है कि हरे-भरे क्षेत्रों को नुकसान पहुँचाने के पीछे जमीन के व्यावसायिक उपयोग की मंशा होती है। जहाँ पेड़ खड़े हों, वहाँ निर्माण करना कठिन होता है। ऐसे में कुछ लोग पेड़ों को हटाने के बजाय उन्हें धीरे-धीरे खत्म करने का रास्ता अपनाते हैं, ताकि बाद में कहा जा सके कि पेड़ तो पहले ही सूख चुके थे। यह तरीका न केवल अनैतिक है, बल्कि कानून की दृष्टि से भी गंभीर अपराध है। कई जगहों पर ऐसे मामलों में जुर्माना लगाया गया, शिकायतें दर्ज हुईं और पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की बात उठी। कुछ मामलों में तो ट्रिब्यूनल और अदालतों ने भी सख्त रुख अपनाया। इससे यह स्पष्ट है कि पर्यावरणीय नुकसान अब सिर्फ नैतिक मुद्दा नहीं, बल्कि कानूनी सवाल भी बन चुका है। जो आज पेड़ में ड्रिल करके जहर भर रहा है, वो कल अपनी ही औलाद की ऑक्सीजन में छेद कर रहा है।
वैश्विक स्तर पर चिंता
भारत के बाहर भी इस तरह की घटनाएँ लगातार सामने आई हैं। ऑस्ट्रेलिया के कुछ इलाकों में स्थानीय पड़ों और हरित क्षेत्रों को नुकसान पहुँचाने की शिकायतें आईं, जहाँ परीक्षण से रसायन के इस्तेमाल की पुष्टि हुई। स्थानीय प्रशासन ने इसे गंभीर पर्यावरणीय अपराध माना। अमेरिका के तहोई झील क्षेत्र में भी लंबे समय से पेड़ों के रहस्यमय तरीके से सूखने की शिकायतें आईं। जांचकर्ताओं को वहां कुछ पेड़ों के तने में ड्रिल किए गए छेद और जड़ों के पास संदिग्ध पदार्थ के संकेत मिले। दक्षिण कोरिया में भी एक पुराने जिनगो वृक्ष को नुकसान पहुँचाने का मामला सामने आया, जिसमें हरबिसाइट के इस्तेमाल का आरोप लगा। ये उदाहरण दिखाते हैं कि यह समस्या किसी एक देश की नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय है। बिल्डिंगें बड़ी करने से विकास नहीं होता, पेड़ सुखाने से तो सिर्फ विनाश होता है।
हर नागरिक की जिम्मेदारी
इस पूरे विषय का एक सामाजिक पक्ष भी है। जब किसी इलाके से पेड़ काट दिए जाते हैं या सूखने के लिए छोड़ दिए जाते हैं, तो वहां रहने वाले लोगों को भी उसका नुकसान उठाना पड़ता है। गर्मी बढ़ जाती है, छाया कम हो जाती है, बच्चों और बुजुर्गों को परेशानी होती है और मोहल्ले की सुंदरता भी खत्म होती है। कई बार लोग शुरुआत में इस विषय पर ध्यान नहीं देते, लेकिन कुछ ही समय बाद उन्हें गर्मी, धूल और प्रदूषण का असर महसूस होता है। इसलिए पेड़ों की सुरक्षा केवल पर्यावरण प्रेमियों का काम नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है। यदि लोग समय रहते शिकायत करें और आवाज उठाएँ, तो ऐसे अपराधों को रोका जा सकता है। पेड़ चिल्लाते नहीं, इसलिए हम उन्हें चुपचाप मार देते हैं - पर प्रकृति हिसाब जरूर रखती है।
सबसे जरूरी है जागरूकता
ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सबसे जरूरी है जागरूकता। जब किसी इलाके में पेड़ अचानक सूखने लगें, तो लोगों को इसे सामान्य बात मानकर चुप नहीं रहना चाहिए। सबसे पहले स्थानीय प्रशासन को सूचना देनी चाहिए। पेड़ों की तस्वीरें, वीडियो, सूखने की स्थिति और आसपास की जमीन की हालत का रिकॉर्ड रखना चाहिए। अगर संभव हो तो पेड़ के पास दिखने वाले छेद, रसायन के निशान या असामान्य बदलाव को नोट करना चाहिए। यह सब बाद में जांच में बहुत मदद करता है। जिन इलाकों में निर्माण कार्य चल रहा हो, वहां विशेष निगरानी रखनी चाहिए, क्योंकि ऐसे स्थानों पर पेड़ों को हटाने का दबाव अधिक होता है। पेड़ को जहर देना, अपनी ही थाली में जहर मिलाने जैसा है।
पर्यावरणीय क्षति की गंभीरता
सरकार और प्रशासन को भी ऐसे मामलों पर और सख्ती करनी चाहिए। केवल शिकायत दर्ज करना ही काफी नहीं है, बल्कि दोषियों पर ठोस कार्रवाई भी होनी चाहिए। यदि किसी ने जानबूझकर पेड़ सूखाए हैं, तो उस पर जुर्माना, कानूनी कार्रवाई और पुनरुद्धार की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। प्रभावित क्षेत्र में नए पेड़ लगाना और उनकी सुरक्षा करना भी जरूरी है। जहां मिट्टी में रसायन फैला हो, वहां उसकी सफाई और परीक्षण की भी व्यवस्था होनी चाहिए। यदि पर्यावरणीय क्षति को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो ऐसी घटनाएँ आगे भी दोहराई जाती रहेंगी। छाया चाहिए सबको, पर पेड़ किसी को नहीं चाहिए - यही सोच हरियाली को सुखा रही है।
कार्रवाई का दबाव
नागरिक समाज, स्कूल, कॉलेज और स्थानीय समितियाँ भी इस दिशा में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। बच्चों और युवाओं को यह समझाया जाना चाहिए कि पेड़ क्यों जरूरी हैं और उनकी हत्या जैसा नुकसान कितना गंभीर है। मोहल्ला समितियाँ यदि नियमित रूप से पेड़ों की निगरानी करें, तो संदेहजनक गतिविधियाँ जल्दी पकड़ी जा सकती हैं। पर्यावरण संगठन यदि इन मुद्दों को उठाएँ, तो प्रशासन पर भी दबाव बढ़ता है। मीडिया की भूमिका भी अहम है, क्योंकि जब ऐसे मामले समाचार में आते हैं, तो जनता की जागरूकता बढ़ती है और अधिकारियों पर कार्रवाई का दबाव पड़ता है। पेड़ को काटने से ज्यादा बड़ा पाप, उसे धीरे-धीरे जहर देकर सुखाना है।
सुनियोजित और गंभीर पर्यावरणीय अपराध
अंत में यह कहना उचित होगा कि पेड़ों को रसायन डालकर सूखाना एक सुनियोजित और गंभीर पर्यावरणीय अपराध है। यह केवल कुछ पौधों का नुकसान नहीं, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति, प्राकृतिक संतुलन और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर हमला है। ऐसे मामलों में वैज्ञानिक जांच, कानूनी कार्रवाई और जन-जागरूकताकृतीनों की समान रूप से जरूरत है। यदि हम अपने आसपास की हरियाली को बचाएंगे, तभी स्वच्छ हवा, ठंडी छाया और स्वस्थ जीवन की उम्मीद रख सकेंगे। पेड़ बचेंगे, तो जीवन बचेगाय पेड़ मिटेंगे, तो भविष्य भी संकट में पड़ जाएगा।
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Tree TakeSep 14, 2026 09:55 PM
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