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डक-बिल्ड प्लैटिपसः दुनिया का सबसे अनोखा और विचित्र स्तनधारी जीव

TreeTake is a monthly bilingual colour magazine on environment that is fully committed to serving Mother Nature with well researched, interactive and engaging articles and lots of interesting info.

डक-बिल्ड प्लैटिपसः दुनिया का सबसे अनोखा और विचित्र स्तनधारी जीव

जब अठारहवीं शताब्दी के अंत में यूरोपीय वैज्ञानिकों ने पहली बार इस जीव का मृत शरीर देखा, तो उन्हें लगा कि यह किसी ने उनके साथ क्रूर मजाक किया है। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि ऐसा कोई वास्तविक जीव अस्तित्व में हो सकता है...

डक-बिल्ड प्लैटिपसः दुनिया का सबसे अनोखा और विचित्र स्तनधारी जीव

TidBits

ट्रीटेक नेटवर्क 

इस विशाल पृथ्वी पर प्रकृति ने असंख्य जीवों की रचना की है, जिनमें से कुछ अपनी शारीरिक बनावट और आदतों से वैज्ञानिकों को भी आश्चर्य में डाल देते हैं। जब हम स्तनधारी जीवों के बारे में सोचते हैं, तो हमारे मन में ऐसे प्राणियों की छवि उभरती है जो सीधे बच्चों को जन्म देते हैं, उन्हें अपना दूध पिलाते हैं और जिनके शरीर पर बाल होते हैं। परंतु, ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप के पूर्वी भागों, तस्मानिया और घने जंगलों की नदियों में एक ऐसा जीव पाया जाता है जो स्तनधारी होने की सभी सामान्य परिभाषाओं को चुनौती देता है। इस जीव को ‘डक-बिल्ड प्लैटिपस‘ या सामान्य भाषा में ‘बत्तख-मुँहा प्लैटिपस‘ कहा जाता है। यह प्राणी अपनी विचित्र शारीरिक बनावट और अद्वितीय जीवन शैली के कारण निर्विवाद रूप से दुनिया का सबसे अजीब और अनोखा स्तनधारी जीव माना जाता है। जब अठारहवीं शताब्दी के अंत में यूरोपीय वैज्ञानिकों ने पहली बार इस जीव का मृत शरीर देखा, तो उन्हें लगा कि यह किसी ने उनके साथ क्रूर मजाक किया है। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि ऐसा कोई वास्तविक जीव अस्तित्व में हो सकता है। उन्हें लगा कि किसी ने बत्तख की चोंच को किसी जल-बिलाव के शरीर से सुई-धागे की मदद से सिल दिया है। इस जीव का पूरा शरीर विभिन्न प्राणियों का एक अद्भुत मिश्रण प्रतीत होता है। इसका सिर और चोंच पूरी तरह से एक बत्तख की तरह दिखाई देते हैं, जबकि इसका धड़ और घने बाल किसी जल-बिलाव या नेवले जैसे होते हैं। इसके साथ ही, इसकी पूंछ एक ऊदबिलाव जैसी चैड़ी और चपटी होती है, जो इसे पानी में तैरते समय दिशा बदलने में सहायता करती है। इसके पैरों की उंगलियों के बीच में बत्तख की तरह ही एक पतली त्वचा की झिल्ली होती है, जो पानी को पीछे धकेलने में पतवार का काम करती है। इस जीव की सबसे बड़ी और मुख्य विशेषता यह है कि यह स्तनधारी वर्ग का होने के बावजूद भी बच्चों को सीधा जन्म देने के बजाय अंडे देता है। संपूर्ण विश्व में केवल दो ही ऐसे स्तनधारी जीव ज्ञात हैं जो अंडे देते हैं, और प्लैटिपस उनमें से सबसे प्रमुख है। मादा प्लैटिपस नदी के किनारे एक गहरी सुरंग बनाकर उसमें दो या तीन अंडे देती है। लगभग दस दिनों के बाद जब उन अंडों से नन्हे बच्चे बाहर निकलते हैं, तो माता उन्हें अपना दूध पिलाती है। यहाँ भी प्रकृति का एक अनोखा चमत्कार देखने को मिलता है। इस जीव के शरीर में अन्य स्तनधारियों की तरह दूध पिलाने के लिए कोई स्तन ग्रंथियाँ या थन नहीं होते हैं। इसके स्थान पर, माता के पेट की त्वचा के छिद्रों से दूध पसीने की तरह बाहर निकलता है, और बच्चे उसकी त्वचा या बालों से उस दूध को चाटकर अपनी भूख मिटाते हैं। इस जीव की विचित्रता यहीं समाप्त नहीं होती। यह दुनिया के अत्यंत गिने-चुने विषैले स्तनधारियों में से भी एक है। नर प्लैटिपस के पीछे के पैरों के टखनों पर छोटी और तीखी सुई जैसी संरचनाएं होती हैं, जो एक विषैली ग्रंथि से जुड़ी होती हैं। हालांकि यह विष मनुष्यों के लिए जानलेवा नहीं होता, परंतु यह इतना तीव्र होता है कि असहनीय पीड़ा और सूजन पैदा कर सकता है, जिस पर कोई भी सामान्य दर्द निवारक औषधि काम नहीं करती। इस विष का उपयोग यह जीव मुख्य रूप से अन्य नरों से लड़ने और अपनी रक्षा के लिए करता है। इसके अतिरिक्त, इस प्राणी के पास शिकार करने की एक और जादुई शक्ति होती है जिसे ‘विद्युत-संवेदनशीलता‘ कहा जाता है। जब यह भोजन की खोज में पानी के भीतर जाता है, तो यह अपनी आँखें, कान और नाक पूरी तरह से बंद कर लेता है। ऐसी स्थिति में, इसकी बत्तख जैसी चोंच में मौजूद हजारों सूक्ष्म तंत्रिकाएं पानी में रहने वाले छोटे जीवों के शरीर से निकलने वाली अत्यंत धीमी विद्युत तरंगों को भांप लेती हैं। इस अदृश्य शक्ति के बल पर यह कीचड़ और अंधेरे पानी के भीतर भी अपने शिकार को अचूक सटीकता से पकड़ लेता है। अंततः, अपनी इन सभी परस्पर विरोधी और अविश्वसनीय विशेषताओं के कारण यह जीव जीवविज्ञानियों के लिए हमेशा से कौतूहल और गहन शोध का विषय रहा है, जो हमें यह याद दिलाता है कि प्रकृति के नियम हमारी सोच से कहीं अधिक व्यापक और विस्मयकारी हैं।

विचित्र टोपीधारी इल्लीः प्रकृति का एक अनूठा चमत्कार
विशाल और विविधता से भरी इस प्रकृति में असंख्य जीव-जंतु पाए जाते हैं, जिनमें से कुछ अपनी शारीरिक संरचना और व्यवहार से वैज्ञानिकों को आश्चर्यचकित कर देते हैं। ऐसा ही एक अनोखा और विस्मयकारी कीट-डिंभक (इल्ली) है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘उराबा लूजेंस‘ कहा जाता है। आम बोलचाल में इसे ‘विचित्र टोपीधारी इल्ली‘ के नाम से जाना जाता है। यह जीव अपने सिर पर पुरानी खोपड़ियों का ढांचा एक मीनार की तरह सजाकर रखने के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। प्रकृति की यह अनूठी कलाकृति मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप और न्यूजीलैंड के घने जंगलों में पाई जाती है। इस इल्ली का रंग मुख्य रूप से पीला, धूसर और काला होता है। इसके पूरे शरीर पर छोटे-छोटे और कड़े बाल होते हैं, जो अत्यंत विषैले और चुभने वाले होते हैं। जब कोई अन्य जीव इसके संपर्क में आता है, तो इन बालों के कारण उसे तीव्र जलन और पीड़ा का अनुभव होता है। इस कीट का जीवन चक्र अन्य पतंगों की तरह ही होता है, परंतु इसकी त्वचा बदलने की प्रक्रिया सबसे अलग है। वृद्धि के दौरान यह जीव कई बार अपनी पुरानी त्वचा और बाह्य-कंकाल का परित्याग करता है। सामान्यतः अन्य कीट अपनी पुरानी त्वचा को पूरी तरह से गिरा देते हैं या खा जाते हैं, लेकिन यह इल्ली अपने सिर के पुराने खोल को अपने शरीर से अलग नहीं करती। इस कीट की सबसे बड़ी विशेषता इसके सिर पर टिकी मीनार जैसी संरचना है। जब यह इल्ली बड़ी होती है, तो इसके सिर का आकार भी बढ़ता है। हर बार त्वचा बदलने के बाद, पुराने सिर का खोखला आवरण वर्तमान सिर के ठीक ऊपर चिपक जाता है। जैसे-जैसे यह प्रक्रिया बारबार दोहराई जाती है, वैसे-वैसे सिर के ऊपर एक के बाद एक खोपड़ियों का ढेर लग जाता है। यह संरचना देखने में किसी प्राचीन राजा के मुकुट या एक लंबी टोपी जैसी प्रतीत होती है। इस अनोखे मुकुट में सबसे ऊपर इसकी सबसे पहली और छोटी खोपड़ी होती है और नीचे की ओर नई तथा बड़ी खोपड़ियां जुड़ी होती हैं। वैज्ञानिकों ने इस जीव के इस विचित्र व्यवहार पर गहरा अध्ययन किया है। शोध से यह ज्ञात हुआ है कि यह खोपड़ियों का मुकुट केवल दिखावे के लिए नहीं है, बल्कि यह इसके जीवन की रक्षा करने का एक मुख्य अस्त्र है। जब कोई शिकारी जीव, जैसे कि मकरंद चूसने वाले कीड़े या मकड़ियां, इस इल्ली पर आक्रमण करते हैं, तो यह अपनी इस लंबी टोपी को एक ढाल या तलवार की तरह हिलाती है। यह इस टोपी से हमलावर को पीछे धकेलती है और उसका ध्यान भटकाती है। शिकारी जीव असली सिर समझकर उस खोखली टोपी पर वार कर देते हैं, जिससे इस नन्हे जीव को वहां से सुरक्षित भागने का पर्याप्त समय मिल जाता है। यह इल्ली मुख्य रूप से नीलगिरी (यूकेलिप्टस) के वृक्षों की पत्तियों को अपना आहार बनाती है। यह पत्तियों के कोमल और हरे भागों को इस प्रकार खाती है कि पत्ती की केवल नसें ही शेष रह जाती हैं। इस प्रक्रिया को ‘पत्ती-कंकालीकरण‘ कहा जाता है। अंत में, यह इल्ली एक छोटे से ककून में प्रवेश करती है और कुछ समय पश्चात एक साधारण मटमैले रंग के पतंगे के रूप में बाहर आती है। यह विचित्र टोपीधारी इल्ली हमें यह सिखाती है कि प्रकृति में कोई भी संरचना बिना कारण के नहीं होती। जीव रक्षा के लिए विकसित किया गया यह आत्म-रक्षा का तरीका जैव-विविधता का एक सर्वोत्तम उदाहरण है। लघु आकार का होने के बावजूद, यह कीट अपनी अद्भुत जीवन शैली के कारण जीव विज्ञान के क्षेत्र में शोध का एक अत्यंत रोचक विषय बना हुआ है।

‘आरग्वध‘ अमलतास के औषधीय लाभ
अमलतास को आयुर्वेद में ‘आरग्वध‘ कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘रोगों को नष्ट करने वाला‘। अमलतास की लंबी, बेलनाकार फलियों के भीतर मौजूद काले रंग का गूदा अत्यंत गुणकारी और कई बीमारियों की प्राकृतिक दवा माना जाता है। अमलतास की फली का गूदा प्राकृतिक और सुरक्षित मृदु विरेचक है। यह आंतों को नुकसान पहुंचाए बिना मल को ढीला कर बाहर निकालता है। पुरानी कब्ज, आंतों की सुस्ती और बवासीर में इसका नियमित सेवन पेट को पूरी तरह साफ करता है। इसके शीतल और डिटॉक्सिफाइंग गुण खून को साफ करते हैं। फोड़े-फुंसी, मुंहासे, एक्जिमा, दाद और खुजली जैसी रक्त विकार से जुड़ी समस्याओं में इसका  यह जठराग्नि को संतुलित कर अपच, गैस, एसिडिटी और पेट फूलने की समस्या को दूर करता है। यह आंतों में जमे विषैले तत्वों को बाहर निकालकर चयापचय को दुरुस्त रखता है। अमलतास में सूजन-रोधी गुण पाए जाते हैं। यह वात दोष को शांत करके जोड़ों के दर्द, सूजन, गाउट (यूरिक एसिड) और सायटिका के दर्द में राहत दिलाता है। इसमें एंटी-पायरेटिक और एंटी-माइक्रोबियल तत्व होते हैं। मौसमी बुखार, गले की खराश, सर्दी और बदन दर्द में इसका काढ़ा शरीर के तापमान को नियंत्रित करने में मदद करता है। यह लिवर के कामकाज को तेज करता है और शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकालता है। पीलिया और लिवर की कमजोरी में इसका नियंत्रित उपयोग फायदेमंद माना जाता है। छाती में जमे बलगम को पिघलाकर बाहर निकालने में इसका गूदा उपयोगी है, जिससे सूखी खांसी और श्वास नली की सूजन में आराम मिलता है। काढ़ा सूखी फली को तोड़कर 5 से 10 ग्राम गूदा निकालें। इसे एक गिलास पानी में तब तक उबालें जब तक पानी आधा न रह जाए। इसे छानकर रात को सोने से पहले गुनगुना पिएं। गंभीर कब्ज होने पर 5 ग्राम गूदे को गुनगुने दूध में घोलकर लिया जा सकता है। त्वचा संक्रमण या जोड़ों की सूजन पर अमलतास के गूदे को पानी में घिसकर लेप की तरह लगाएं। अमलतास का सेवन हमेशा सीमित मात्रा (5 से 10 ग्राम) में ही करना चाहिए।

 

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