Travelogue
हरेन्द्र नारायण सिंह
उत्तर प्रदेश की धरती पर कुछ स्थान ऐसे हैं, जहाँ पहुँचकर लगता है कि हम केवल किसी भौगोलिक स्थान की यात्रा नहीं कर रहे, बल्कि समय की परतों को पार करते हुए भारतीय सभ्यता की स्मृतियों में प्रवेश कर रहे हैं। नैमिषारण्य और अयोध्या ऐसे ही दो तीर्थ हैं। इनके बीच की दूरी भले ही मानचित्र पर मापी जा सकती हो, किंतु भारतीय सांस्कृतिक चेतना में इनके बीच का संबंध कहीं अधिक गहरा और व्यापक है।
मेरे मन में जब श्रृंगी ऋषि की कथा आती है, तो इन दोनों तीर्थों के बीच एक अदृश्य आध्यात्मिक सेतु दिखाई देने लगता है , एक ओर नैमिषारण्य की तपोभूमि, दूसरी ओर अयोध्या की रामभूमि और इनके बीच वैदिक ऋषि-परंपरा का वह संसार, जिसमें तपस्या, यज्ञ, प्रकृति, राजधर्म और लोककल्याण एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
नैमिषारण्य: जहाँ आज भी ऋषियों की वाणी सुनाई देती है। नैमिषारण्य की यात्रा अपने आप में एक अनुभव है। गोमती की सांस्कृतिक धारा से जुड़े इस प्राचीन तीर्थ की ओर बढ़ते हुए मन में बार-बार उन ऋषियों की कल्पना होती है, जिन्होंने कभी इस वनभूमि को अपनी तपस्या और ज्ञान-साधना से पवित्र किया होगा।
पुराणों और महाकाव्य परंपरा में नैमिषारण्य का उल्लेख ऋषियों की महान सभाओं, यज्ञों और कथावाचन के केंद्र के रूप में मिलता है। यहाँ केवल अग्निहोत्र और तपस्या ही नहीं हुई होगी, बल्कि ज्ञान पर गंभीर संवाद भी हुए होंगे। श्रुति, स्मृति, पुराण और महाकाव्य की परंपरा को आगे बढ़ाने में ऐसे आश्रमों और ऋषि-सभाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। नैमिषारण्य में खड़े होकर एक विचार मन में आता है , भारत की ज्ञान-परंपरा किसी राजमहल की चारदीवारी में जन्म लेकर वहीं सीमित नहीं रही। वह वन में गई, आश्रमों में विकसित हुई, ऋषियों के जीवन में पली और फिर समाज तक पहुँची।
यही नैमिषारण्य की सबसे बड़ी विशेषता है।
अयोध्या: जहाँ कथा ने इतिहास से आगे बढ़कर आस्था का रूप लिया
नैमिषारण्य से अयोध्या की ओर बढ़ते हुए यात्रा का स्वरूप बदल जाता है। वहाँ ऋषियों की तपोभूमि है, यहाँ इक्ष्वाकु वंश की राजधानी। वहाँ वन और आश्रम हैं, यहाँ राजमहल और राजधर्म। सरयू के तट पर बसी अयोध्या भारतीय मानस में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि के रूप में अंकित है। राजा दशरथ, रघुवंश, राम, भरत, लक्ष्मण और सीता , इन सबकी स्मृतियाँ इस नगर के कण-कण से जुड़ी हुई हैं। लेकिन रामकथा के इस विराट वृक्ष की जड़ें केवल अयोध्या तक सीमित नहीं हैं। इसके पीछे एक ऐसी ऋषि-परंपरा भी दिखाई देती है, जिसमें वन में रहने वाला तपस्वी राजमहल तक बुलाया जाता है और उसका ज्ञान राजपरिवार के भविष्य से जुड़ जाता है।
यहीं से श्रृंगी ऋषि की कथा सामने आती है।
श्रृंगी ऋषि: वन से राजमहल तक
वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में ऋष्यशृंग अर्थात श्रृंगी ऋषि का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसंग मिलता है। वे महर्षि विभाण्डक के पुत्र थे और उनका जीवन वन, तपस्या तथा वैदिक साधना से जुड़ा था। अंगदेश में वर्षा के अभाव और उत्पन्न संकट की कथा से उनका संबंध जुड़ता है। आगे चलकर उनका विवाह शांता से होता है। यही शांता राजा दशरथ की पुत्री के रूप में रामकथा की परंपरा में वर्णित हैं। जब अयोध्या के राजा दशरथ पुत्र प्राप्ति की इच्छा से चिंतित हुए, तब ऋष्यशृंग का महत्व सामने आया। रामायण के अनुसार दशरथ स्वयं अंगदेश गए और ऋष्यशृंग को अयोध्या आने का निमंत्रण दिया। कल्पना कीजिए उस दृश्य की: एक ओर अयोध्या का विराट राजदरबार, दूसरी ओर वन में तपस्या से तेजस्वी हुआ ऋषि। राजा को अपने सामर्थ्य पर भरोसा था, लेकिन पुत्रकामना की पूर्ति के लिए उन्हें ऋषि के ज्ञान और तप की आवश्यकता थी। ऋष्यशृंग शांता के साथ अयोध्या आए और वहाँ वैदिक अनुष्ठान में सहभागी हुए। आगे चलकर पुत्रकामेष्टि यज्ञ की कथा रामावतार की भूमिका से जुड़ती है। यहीं मुझे भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत सुंदर संदेश दिखाई देता है, राजसत्ता और ऋषिसत्ता परस्पर विरोधी नहीं थींय दोनों एक-दूसरे की पूरक थीं।
क्या श्रृंगी ऋषि नैमिषारण्य आए थे?
यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से मन में आता है। श्रृंगी ऋषि को नैमिषारण्य से जोड़ने वाली स्थानीय और व्यापक धार्मिक परंपराएँ भले ही विभिन्न रूपों में मिलती हों, लेकिन उपलब्ध वाल्मीकि रामायण के प्रमुख प्रसंगों में उनके नैमिषारण्य में निवास करने या वहाँ यज्ञ करने का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। इसलिए इतिहास और साहित्य की दृष्टि से यह कहना उचित नहीं होगा कि श्रृंगी ऋषि निश्चित रूप से नैमिषारण्य में रहे थे। लेकिन क्या इससे दोनों के बीच का सांस्कृतिक संबंध समाप्त हो जाता है? मेरे विचार से नहीं। श्रृंगी ऋषि जिस वनवासी, तपस्वी और वैदिक जीवन-परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं, नैमिषारण्य उसी व्यापक ऋषि-संस्कृति का एक महान प्रतीक है। इसलिए दोनों के बीच प्रत्यक्ष निवास का संबंध स्थापित करने के बजाय समान वैदिक और तपस्वी परंपरा के रूप में देखना अधिक उचित और सुंदर है।
नैमिषारण्य से अयोध्या: एक सांस्कृतिक यात्रा
यदि इस पूरी कथा को एक यात्रा के रूप में देखें, तो यह केवल स्थानों की यात्रा नहीं रह जाती।
यह यात्रा बन जाती है, तप से ज्ञान की, ज्ञान से यज्ञ की, यज्ञ से लोककल्याण की, और लोककल्याण से रामावतार की। नैमिषारण्य में ऋषियों की सभाएँ और ज्ञान-परंपरा दिखाई देती है। अंगदेश में श्रृंगी ऋषि का तपस्वी जीवन और शांता से उनका संबंध सामने आता है। अयोध्या में वही ऋषि राजपरिवार के आमंत्रण पर पहुँचते हैं। फिर वैदिक अनुष्ठान होता है। और भारतीय स्मृति में आगे चलकर रामावतार की कथा आकार लेती है। यह क्रम किसी प्रमाणित ऐतिहासिक यात्रा-पथ के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक स्मृति के प्रतीकात्मक क्रम के रूप में समझना चाहिए।
सरयू और गोमती: दो नदियाँ, एक सांस्कृतिक धारा
नैमिषारण्य और अयोध्या की यात्रा करते समय दो नदियाँ लगातार मन में उपस्थित रहती हैं, गोमती और सरयू।
सरयू अयोध्या की आत्मा है। उसके तट पर रामकथा की अनगिनत स्मृतियाँ जीवित हैं। गोमती की धारा नैमिषारण्य के सांस्कृतिक भूगोल को स्पर्श करती है और उसके आसपास विकसित तीर्थ-परंपरा हमें प्राचीन भारत के उस जीवन की याद दिलाती है जिसमें नदी केवल पानी का स्रोत नहीं थी। नदी जीवन थी। नदी संस्कृति थी। नदी यात्रा थी। और नदी ही अनेक सभ्यताओं की आधारशिला थी। सरयू के तट पर राम की स्मृति और गोमती के क्षेत्र में ऋषियों की स्मृतिकृदोनों मिलकर उत्तर प्रदेश के उस आध्यात्मिक भूगोल को रेखांकित करती हैं, जहाँ प्रकृति और संस्कृति एक-दूसरे से अलग नहीं थीं।
वन से लोक तक: श्रृंगी ऋषि का संदेश
श्रृंगी ऋषि की कथा को यदि आज के संदर्भ में देखें तो उसका एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश सामने आता है।
ऋषि वन में रहते थे, लेकिन उनका ज्ञान समाज से अलग नहीं था। उनकी तपस्या व्यक्तिगत मुक्ति तक सीमित नहीं थी। उनका यज्ञ लोककल्याण से जुड़ता था। उनका ज्ञान राजधर्म को दिशा दे सकता था। और उनका जीवन प्रकृति के साथ सामंजस्य का प्रतीक था। इस दृष्टि से श्रृंगी ऋषि वन और राजमहल के बीच एक सेतु दिखाई देते हैं। वन → आश्रम → तपस्या → यज्ञ → राजधर्म → लोककल्याण। यह केवल प्राचीन कथा का क्रम नहीं है। यह भारतीय चिंतन का एक मूल सूत्र भी है। मेरी दृष्टि में नैमिषारण्य और अयोध्या जब मैं इन दोनों तीर्थों को एक साथ देखता हूँ तो मुझे दो अलग-अलग स्थान नहीं दिखाई देते। नैमिषारण्य मुझे भारतीय ज्ञान-परंपरा की स्मृति लगता है। अयोध्या मुझे उस ज्ञान के जीवन में उतरने की कथा लगती है। नैमिषारण्य में ऋषि हैं। अयोध्या में राजा और प्रजा हैं। नैमिषारण्य में तप और शास्त्र हैं। अयोध्या में राजधर्म और मर्यादा है। और श्रृंगी ऋषि इन दोनों संसारों को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी बन जाते हैं। उनकी कथा यह भी बताती है कि प्राचीन भारतीय व्यवस्था में प्रकृति से दूर रहकर ज्ञान प्राप्त करने वाला ऋषि अंततः समाज के बीच लौटता था। उसका ज्ञान समाज की आवश्यकता बनता था।
एक आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीकात्मक मानचित्र
यदि कभी श्रृंगी ऋषि को केंद्र में रखकर उत्तर प्रदेश की इस सांस्कृतिक यात्रा पर निकलने का अवसर मिले, तो मेरे मन में इसका एक प्रतीकात्मक मानचित्र बनता हैः
नैमिषारण्य
ऋषियों की तपोभूमि और ज्ञान-परंपरा
↓
अंगदेश
श्रृंगी ऋषि का जीवन और शांता से संबंध
↓
अयोध्या
राजा दशरथ द्वारा ऋष्यशृंग का स्वागत
↓
पुत्रकामेष्टि यज्ञ
रामावतार की भूमिका
↓
अयोध्या
भगवान श्रीराम के जन्म की पावन स्मृति
यह यात्रा वास्तव में दूरी तय करने की यात्रा नहीं है। यह स्मृतियों के बीच चलने की यात्रा है।
अंत में...
नैमिषारण्य और अयोध्या को जोड़ने वाली सबसे मजबूत कड़ी कोई सड़क या भौगोलिक मार्ग नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की वह अदृश्य धारा है जो हजारों वर्षों से ऋषियों, यज्ञों, कथाओं, नदियों और लोकस्मृतियों के माध्यम से प्रवाहित होती रही है। नैमिषारण्य ने ऋषि-परंपरा को अपनी तपोभूमि दी। श्रृंगी ऋषि ने तप और ज्ञान को लोककल्याण से जोड़ा। अयोध्या ने उसी वैदिक-सांस्कृतिक वातावरण में रामकथा को जन्म लेते देखा। इसलिए जब अगली बार मैं नैमिषारण्य की ओर जाऊँगा, तो शायद वहाँ केवल एक तीर्थ नहीं देखूँगा। मुझे वहाँ उन ऋषियों की पदचाप सुनाई देगी, जिन्होंने वन में बैठकर ज्ञान की साधना की थी। और जब सरयू के तट पर अयोध्या पहुँचूँगा, तो शायद उस प्राचीन यात्रा को फिर महसूस करूँगा , एक ऐसी यात्रा जिसमें वन का ऋषि राजमहल तक आया, यज्ञ हुआ और भारतीय संस्कृति को उसका सबसे उज्ज्वल आदर्श , मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम मिला। नैमिषारण्य से अयोध्या तक की यह यात्रा वास्तव में भारत की उस सनातन यात्रा का प्रतीक है, जहाँ ज्ञान तपस्या से जन्म लेता है, यज्ञ में रूपांतरित होता है और अंततः लोककल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।
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