Selfless Souls
पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता विश्वविजय सिंह से विशेष बातचीत
प्रश्नः सबसे पहले आप हमें बताइए कि आमी नदी का इतिहास और महत्व क्या है?
आमी नदी पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक अत्यंत महत्वपूर्ण नदी है। इसका उद्गम सिद्धार्थनगर जिले के सिकहरा ताल से होता है और यह बस्ती, संत कबीर नगर तथा गोरखपुर से होकर राप्ती नदी में मिल जाती है। यह केवल एक नदी नहीं, बल्कि सदियों से इस क्षेत्र की जीवनरेखा रही है। लगभग दो सौ से अधिक गांवों की कृषि, पेयजल, पशुपालन और स्थानीय अर्थव्यवस्था इसी नदी पर निर्भर रही है। कभी इसका जल इतना स्वच्छ और निर्मल था कि लोग सीधे नदी से पानी पी लेते थे। खेत इसकी सिंचाई से लहलहाते थे और मछलियों सहित अनेक जलीय जीवों का यह प्राकृतिक आवास था। आमी का महत्व केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक भी है। भगवान बुद्ध की तपस्या से जुड़ा यह क्षेत्र विश्वभर के बौद्ध श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण है। संत कबीर की निर्वाण स्थली मगहर भी इसी नदी के तट पर स्थित है। इसलिए आमी नदी हमारी सांस्कृतिक विरासत का भी अभिन्न हिस्सा है।
प्रश्नः एक जीवनदायिनी नदी प्रदूषित होकर संकट में कैसे पहुंच गई?
यह दुर्भाग्यपूर्ण लेकिन मानवीय लापरवाही का परिणाम है। औद्योगिक विकास आवश्यक था, लेकिन पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी की गई। अनेक औद्योगिक इकाइयों ने बिना समुचित शोधन के रासायनिक अपशिष्ट नदी में छोड़ना शुरू कर दिया। दूसरी ओर कृषि में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग हुआ, जिनका बहाव वर्षा के साथ नदी में पहुंचता रहा। धीरे-धीरे नदी का जल काला पड़ने लगा, दुर्गंध फैलने लगी और उसका प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो गया। मछलियां मरने लगीं, जैव विविधता समाप्त होने लगी और नदी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया। जिस नदी को लोग श्रद्धा से देखते थे, वही धीरे-धीरे एक प्रदूषित नाले का रूप लेने लगी।
प्रश्नः इस प्रदूषण का सबसे अधिक असर किन लोगों पर पड़ा?
सबसे अधिक प्रभावित वे ग्रामीण हुए जिनका जीवन इस नदी पर आधारित था। खेतों की उर्वरता कम होने लगी, सिंचाई प्रभावित हुई और हैंडपंपों का पानी भी दूषित हो गया। लोगों को त्वचा रोग, पेट संबंधी बीमारियों और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा। पशुधन पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ा। दुर्गंध इतनी बढ़ गई कि लोग नदी के किनारे जाने से भी कतराने लगे। हजारों परिवारों की आजीविका प्रभावित हुई और कई लोगों को रोजगार की तलाश में पलायन करना पड़ा। यह केवल पर्यावरण का संकट नहीं था, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संकट भी बन गया।
प्रश्नः आमी नदी को आध्यात्मिक दृष्टि से इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
आमी नदी भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति का अद्भुत उदाहरण है। संत कबीर इस नदी को प्रेमपूर्वक ‘‘अमिया‘‘ कहकर संबोधित करते थे। मगहर में उनकी समाधि और मजार दोनों इसी नदी के किनारे स्थित हैं। श्रद्धालु आज भी कबीर दर्शन के साथ आमी का जल प्रसाद के रूप में अपने घर ले जाते हैं। नदी के किनारे स्थित प्राचीन शिव मंदिर में श्रद्धालु आमी का जल अर्पित करते हैं, वहीं समीप स्थित मस्जिद में इसी जल से वजू कर नमाज अदा की जाती है। यह दृश्य हमें बताता है कि आमी केवल जलधारा नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और सांप्रदायिक सद्भाव की प्रतीक है।
प्रश्नः संत कबीर और आमी नदी से जुड़ी प्रसिद्ध लोककथा के बारे में कुछ बताइए।
लोकमान्यता है कि एक समय मगहर और उसके आसपास का क्षेत्र भीषण सूखे से पीड़ित था। तत्कालीन नवाब बिजली खान ने संत कबीर से प्रार्थना की कि वे इस संकट से लोगों को मुक्ति दिलाने में मार्गदर्शन करें। कहा जाता है कि संत कबीर की प्रेरणा और जनसहभागिता से सूखी पड़ी आमी नदी पुनः प्रवाहित हुई। इसी घटना की स्मृति में लोक में आज भी कहा जाता हैः ‘‘सूखी नदी में नीर बहाए, बिजली खान से चेताए।‘‘ चाहे इसे आस्था मानें या लोककथा, लेकिन इसका संदेश अत्यंत स्पष्ट है , जब समाज और नेतृत्व मिलकर प्रकृति के संरक्षण का संकल्प लेते हैं, तब असंभव भी संभव हो जाता है।
प्रश्नः आपने आमी नदी को बचाने का अभियान कब और क्यों शुरू किया?
जब मैंने अपनी आंखों के सामने आमी नदी को मरते हुए देखा, तब मन बहुत व्यथित हुआ। मुझे लगा कि यदि आज हमने आवाज नहीं उठाई तो आने वाली पीढ़ियां केवल पुस्तकों में पढ़ेंगी कि कभी यहां आमी नाम की नदी बहती थी। इसी सोच के साथ वर्ष 2009 में मैंने ‘‘आमी बचाओ मंच‘‘ की स्थापना की। हमारा उद्देश्य केवल विरोध करना नहीं था, बल्कि समाज को यह समझाना था कि नदी केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की साझा धरोहर है।
प्रश्नः इस अभियान की शुरुआत कैसे हुई?
हमने सबसे पहले गांव-गांव जाकर लोगों से संवाद शुरू किया। ‘‘आमी संवाद यात्रा‘‘ के माध्यम से किसानों, युवाओं, शिक्षकों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों को जोड़ा। हमने लोगों को समझाया कि यदि नदी नहीं बचेगी तो खेती नहीं बचेगी, भूजल नहीं बचेगा और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित नहीं रहेगा। धीरे-धीरे यह अभियान जनआंदोलन में बदल गया। हजारों लोगों ने इसमें भाग लिया और नदी संरक्षण को अपना सामाजिक दायित्व माना।
प्रश्नः क्या आपका संघर्ष केवल जनजागरूकता तक सीमित रहा?
बिल्कुल नहीं। हमने कानूनी स्तर पर भी संघर्ष किया। राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष लगातार तथ्य रखे और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की। लगातार जनदबाव और कानूनी प्रयासों के परिणामस्वरूप सरकार को प्रदूषण नियंत्रण के लिए ठोस कदम उठाने पड़े। कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना की स्वीकृति इसी संघर्ष की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। हमारा उद्देश्य उद्योगों को बंद कराना नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि विकास और पर्यावरण साथ-साथ चलें।
प्रश्नः क्या इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली?
हाँ, धीरे-धीरे आमी नदी का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना। अनेक पर्यावरणविदों, सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने इस विषय को गंभीरता से उठाया। सरकार ने भी नदी संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण की योजनाओं पर कार्य प्रारंभ किया। आज कुछ स्थानों पर नदी के जल की गुणवत्ता में सुधार दिखाई दे रहा है। हालांकि अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है, लेकिन यह विश्वास अवश्य बना है कि सामूहिक प्रयासों से नदी को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
प्रश्नः वर्तमान समय में नदी संरक्षण को लेकर सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
सबसे बड़ी चुनौती लोगों की सोच है। हम अक्सर मान लेते हैं कि नदी की जिम्मेदारी केवल सरकार की है। जबकि वास्तविकता यह है कि प्रत्येक नागरिक की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि हम प्लास्टिक, कचरा और रसायन जलस्रोतों में डालना बंद कर दें, वर्षा जल संरक्षण करें, वृक्षारोपण करें और जल का विवेकपूर्ण उपयोग करें, तो नदियों की स्थिति में बहुत बड़ा परिवर्तन आ सकता है। पर्यावरण संरक्षण कानूनों से अधिक जनचेतना पर निर्भर करता है।
प्रश्नः जलवायु परिवर्तन और जल संकट के दौर में आमी नदी का संघर्ष हमें क्या संदेश देता है?
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, जल संकट और जैव विविधता के विनाश जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। आमी नदी हमें चेतावनी देती है कि यदि हमने समय रहते अपनी नदियों की रक्षा नहीं की, तो भविष्य की पीढ़ियां स्वच्छ जल के लिए संघर्ष करेंगी। नदियां केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र का आधार हैं। इनके बिना कृषि, पशुपालन, जैव विविधता और मानव सभ्यता का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। इसलिए विकास की हर योजना में पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
प्रश्नः आमी नदी के पूर्ण पुनर्जीवन के लिए किन कदमों की आवश्यकता है?
सबसे पहले उद्योगों को शत-प्रतिशत शोधन के बाद ही अपशिष्ट छोड़ना चाहिए। वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन को अनिवार्य बनाया जाए। नदी के किनारों पर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण हो, वर्षा जल संचयन को बढ़ावा दिया जाए और रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक खेती को प्रोत्साहित किया जाए। इसके साथ ही स्थानीय समुदायों, विद्यालयों, स्वयंसेवी संस्थाओं और युवाओं को नदी संरक्षण अभियान से जोड़ना होगा। जब समाज स्वयं नदी का संरक्षक बनेगा, तभी स्थायी परिवर्तन संभव होगा।
प्रश्नः युवाओं और देशवासियों के लिए आपका क्या संदेश है?
मैं युवाओं से कहना चाहता हूँ कि पर्यावरण संरक्षण केवल एक विषय नहीं, बल्कि जीवन का दायित्व है। नदियां हमारी साझा धरोहर हैं। यदि हम आज उन्हें बचाने का संकल्प नहीं लेंगे तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी। संत कबीर ने जल को जीवन का आधार माना है। यदि जल सुरक्षित रहेगा, तभी जीवन सुरक्षित रहेगा। यदि नदियां जीवित रहेंगी, तभी हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता और हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा। मैं सभी नागरिकों से आग्रह करता हूँ कि अपने आसपास की नदी, तालाब, पोखर और जलस्रोतों को बचाने के लिए आगे आएं। छोटी-छोटी पहल मिलकर बड़े परिवर्तन का आधार बनती हैं। मुझे विश्वास है कि जिस दिन समाज यह समझ जाएगा कि नदी हमारी अपनी है, उसी दिन भारत की नदियों का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा। आमी नदी की कहानी केवल एक नदी की कहानी नहीं है। यह जनजागरण, जनसहभागिता, पर्यावरण संरक्षण और दृढ़ संकल्प की कहानी है। यदि एक जागरूक नागरिक समाज को साथ लेकर आगे बढ़े, तो वह असंभव लगने वाले परिवर्तन भी संभव कर सकता है। आइए हम संकल्प लें कि केवल आमी ही नहीं, बल्कि अपने आसपास की प्रत्येक नदी, तालाब और जलस्रोत की रक्षा करेंगे। क्योंकि जब नदियां मुस्कुराएंगी, तभी धरती हरी-भरी रहेगी, खेत लहलहाएंगे, संस्कृति जीवित रहेगी और आने वाली पीढ़ियां हमें धन्यवाद देंगी कि हमने उनके लिए जल और जीवन दोनों बचाकर रखा।
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