Thinking Point
अभिषेक दुबे
पर्यावरण कार्यकर्ता, नेचर क्लब फाउंडेशन, गोण्डा (उप्र)
भारत में अतिचराई (ओवरग्रेजिंग) एक प्रमुख पर्यावरणीय समस्या है, जो हरियाली के विनाश, मिट्टी के क्षरण, मरुस्थलीकरण, जैव विविधता हानि और जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देती है। देश की लगभग 30-33ः भूमि (लगभग 12 करोड़ हेक्टेयर) क्षतिग्रस्त हो चुकी है, जिसमें अतिचराई एक मुख्य कारण है। भारत में लगभग 50 करोड़ गाय, भैंस, भेड़, बकरियां हैं जिनमें से अधिकांश प्रतिदिन गांवों, नदी के किनारे, जंगलों में, पहाड़ों में हर जगह पौधे और घासें चरते हैं और चराई वाले पशुओं की इतनी बड़ी संख्या से उत्पन्न होती है अतिचारण की समस्या।
अतिचराई तब होती है जब पशु (गाय, भैंस, भेड़, बकरी आदि) हर जगह पर चरते हैं, जिससे वनस्पति ढकाव नष्ट हो जाता है। इससे मिट्टी का ऊपरी स्तर नंगा हो जाता है, जो वर्षा या हवा से आसानी से बह जाता है। वनों में भी बड़े पैमाने पर मिट्टी का क्षरण बाहरी पशुओं के द्वारा की जाने वाली चराई से होता है। भारत में फार्म के इन पशुओं की विशाल जनसंख्या (दुनिया में सबसे अधिक) के कारण 1.2 करोड़ हेक्टेयर चरागाहों पर औसतन 42 पशु प्रति हेक्टेयर चरते हैं, जबकि चरागाहों में भी पर्यावरण की दृष्टि से अधिकतम सुरक्षित संख्या मात्र 5 मानी गई है। चरागाहों के अतरिक्त ये पशु हर जगह चराई करते हैं चाहे हमारे गांव में कृषि व अन्य मानवीय गतिविधियों से बची हुई बंजर जमीनें, झाड़ियां, नदी तालाब के कछार आदि हों और इन स्थानों पर ये हर उग रहे नन्हे पौधों को खाते रहते हैं जिससे पौधे बड़े होकर पेड़ नहीं बन पाते हैं और हरियाली बढ़ नहीं पाती है। ऐसी ही समस्या अन्य संरक्षित वन भूमियों, पहाड़ों आदि में भी है जो हरियाली न बढ़ने देने के साथ, मिट्टी के कटाव, जैवविविधता विनाश आदि को भी बड़े स्तर पर बढ़ाती है।
अतिचराई भारत के हर कोने में स्वाभाविक रूप से उगने वाले पौधों के विनाश के लिए जिम्मेदार है, क्योंकि पशु लगातार कोमल घास, झाड़ियां और नन्हे पौधों को चर लेते हैं, जिससे बीज बैंक नष्ट हो जाता है और पुनरुत्पादन रुक जाता है। इससे हरियाली स्थायी रूप से खो जाती है, मिट्टी नंगी हो जाती है और पारिस्थितिकी तंत्र बंजर बन जाता है। वनों की कटाई से तुलना करें तो अतिचराई ‘‘साइलेंट डिफॉरेस्टेशन‘‘ हैकृकटाई एकबारगी बड़े पैमाने पर पेड़ काटती है, जबकि अतिचराई धीरे-धीरे, अदृश्य रूप से हर बची हुई जमीनें चाहे घासभूमि हों या वनों के बाहरी हिस्से या गांव की जैवविविधता से समृद्ध जमीनों को नष्ट करती है, वह भी बिना कुल्हाड़ी के। दोनों ही जैवविविधता घटाते हैं, लेकिन अतिचराई चरागाहों (जो 31ः कम हो चुके हैं) को मुख्य रूप से लंबे समय तक क्षति पहुंचाती है।
दूध-मांस की मांग के लिए पशु संख्यावृद्धि कराना और समस्या बढ़ना
दूध, मांस और अन्य पशु उत्पादों की बढ़ती मांग ने गाय, भैंस, बकरी और भेड़ों की संख्या को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है, जो अतिचराई को और अधिक बढ़ावा दे रही है। भारत में 50 करोड़ से अधिक की संख्या में ये पशु भारत के हर कोने में चराई करके इन समस्याओं को और अधिक गंभीर बनाते हैं और इस तरह यह भारत की सबसे गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं में से एक है। भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आजीविका के लिए या उनकी आय को बढ़ाने के लिए भी बड़े पैमाने पर गाय, भैंस, बकरी आदि के पालन को प्रोत्साहन दिया जा रहा है लेकिन इसके हरियाली, जैवविविधता और मिट्टी पर पड़ने वाले भीषण नुकसान के बारे में गौर नहीं किया जाता। तो पशुपालन के इन पर्यावरणीय प्रभावों को नजरअंदाज करना हमारी एक बड़ी भूल साबित हो रही है जिसके दुष्प्रभाव हमें कहीं गुना अधिक नुकसान पहुंचाते हैं।
बन्नी घासभूमि और अन्य प्राकृतिक आवासों का विनाश
गुजरात के कच्छ का बन्नी घासभूमि, जो कभी हरा-भरा घास का मैदान था, अतिचराई से मरुस्थल बन गया। बन्नी ग्रासलैंड एशिया और भारत का सबसे बड़ा प्राकृतिक ग्रासलैंड है लेकिन बड़ी तादात में गाय, भैंस की चराई ने इसमें घासें नष्ट कर दी हैं, जिससे पूरे ग्रासलैंड में विलायती बबूल (प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा) जैसे आक्रामक पौधे खूब फैले हैं। कच्छ का यह इलाका आज भारत के सबसे बड़े डेयरी उत्पादक क्षेत्रों में से है जिसका दंश बन्नी ग्रासलैंड को झेलना पड़ रहा है। राजस्थान के अरावली, महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की घासभूमियां भी 31ः सिकुड़ चुकी हैं। कश्मीर में अनियमित मौसम के साथ अतिचराई ने चारे की कमी पैदा की, जबकि हिमालयी क्षेत्रों में चराई ने उप-उष्णकटिबंधीय वनों को प्रभावित किया। ये प्राकृतिक आवास अब बंजर हैं।
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