फोटो: संवाद न्यूज एजेंसी
Specialist's Corner
प्रशान्त कुमार वर्तमान में उत्तराखण्ड वन विभाग में वरिष्ठ परियोजना सहयोगी (वन्यजीव) के पद पर कार्यरत हैं तथा पिछले सात वर्षों से वन्यजीव अपराध नियंत्रण एवं संरक्षण में प्रभावी शोध एवं विश्लेषण कार्य कर रहे है। इन्होंने लगभग पन्द्रह हजार से अधिक वन कर्मियों को वन्यजीव फॉरेंसिक एवं वन्यजीव संरक्षण विषय में प्रशिक्षित किया है तथा पांच सौ से अधिक प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन भी किया है। प्रशान्त कुमार, फॉरेंसिक विज्ञान में बीएससी तथा एमएससी है एवं वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक्स में फील्ड के अनुभवी हैं।
कछुए पृथ्वी के सबसे प्राचीन जीवों में से हैं, लेकिन आज उनका अस्तित्व इंसानी लालच के कारण गंभीर खतरे में है। मांस, औषधीय उपयोग, तांत्रिक विश्वास और अवैध पालतू व्यापार के लिए हर साल हजारों कछुओं की तस्करी की जाती है। यह तस्करी सिर्फ एक गैरकानूनी धंधा नहीं है, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर हमला है। कछुए नदियों और झीलों को साफ रखने में मदद करते हैं, मृत जीवों को खाकर जल को संतुलित रखते हैं। जब वे गायब होते हैं, तो पानी की गुणवत्ता और जैव विविधता दोनों प्रभावित होती हैं। एक तरफ है तस्करों का लालच, तेज पैसा, अंधविश्वास और बाजार की मांग। दूसरी तरफ है एक बेजुबान जीवन, जो न अपनी रक्षा कर सकता है, न अपनी कहानी सुना सकता है। कानून कछुओं की रक्षा करता है, लेकिन जागरूकता और संवेदनशीलता उससे भी ज्यादा जरूरी है। जब तक समाज यह नहीं समझेगा कि प्रकृति का हर जीव मूल्यवान है, तब तक यह संघर्ष चलता रहेगा। यहाँ कुछ बेहद ताजा और प्रमुख घटनाओं के बारे में बताया गया है, जो साफ दिखाती हैं कि कछुओं की तस्करी केवल एक सुनसान समस्या नहीं, बल्कि निरंतर जारी और व्यापक नेटवर्क है।
1. प्रयागराज जंक्शन पर 600 कछुए बरामद (जनवरी 2026)
जनवरी 2026 में प्रयागराज रेलवे स्टेशन पर रेल पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में एक ट्रेन के जनरल कोच से 600 कछुओं को जब्त किया गया। ये कछुए फतेहपुर से हावड़ा ले जाया जा रहे थे, और इनकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत लगभग ₹1.5 करोड़ बताई गई। इस मामले में पांच तस्करों को गिरफ्तार किया गया।
2. अमेठी में 1,200 से अधिक दुर्लभ कछुए जब्त और तस्कर गिरफ्तार
31 जनवरी 2026 को अमेठी पुलिस ने 1,203 दुर्लभ और संरक्षित प्रजाति के कछुओं को जब्त किया, और इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस के अनुसार कछुए ट्रक में छिपाकर ले जाया जा रहे थे जिसमें केले लदे थे, और पकड़े गए आरोपी इसे पश्चिम बंगाल तक ले जाने की तैयारी में थे।
3. फतेहपुर में 148 कछुए, दो आरोपी सहित एक नाबालिग गिरफ्तार (4 फरवरी 2026)
सबसे हालिया खबर में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में रेलवे चेकिंग के दौरान लगभग ₹40 लाख मूल्य के 148 कछुओं को बरामद किया, और एक नाबालिग समेत दो लोगों को गिरफ्तार किया गया। यह मामला विशेष रूप से चिंताजनक इसलिए है क्योंकि इसमें नाबालिग भी शामिल पाया गया, जो तस्करी के दुष्चक्र में शामिल लोगों की मानसिकता और पहुँच की गहराई को दिखाता है।
4. वन विभाग ने हापुड़-मेरठ क्षेत्र में भी कार्रवाई की
हाल ही में हापुड़ के असौड़ा गांव में वन विभाग की संयुक्त टीम ने एक तस्कर के घर से 13 कछुए बरामद किए, और तस्करी की तैयारी को नाकाम किया। कछुओं को बाद में सतत जल स्रोत (जैसे गंगा) में छोड़ दिया गया।
मेजर हॉटस्पॉट बन चुके उत्तर प्रदेश के ये स्थान
उत्तर प्रदेश में कछुओं की तस्करी जिन संदिग्ध इलाकों से बार‑बार सामने आ रही है, उनमें सिर्फ फतेहपुर या अमेठी ही नहीं, बल्कि सुल्तानपुर, लखनऊ, महाराजगंज, गोरखपुर, मिर्जापुर, जगदीशपुर, प्रयागराज, प्रतापगढ़, कौशाम्बी, शाहजहाँपुर, हापुड़‑मेरठ बेल्ट और वाराणसी से जुड़े रूट भी लगातार चर्चा में रहे हैं। सुल्तानपुर और जगदीशपुर जैसे इलाकों में नदियों, तालाबों और ग्रामीण नेटवर्क के जरिये बड़ी मात्रा में कछुए इकट्ठा किए जाते हैं, जबकि फतेहपुर और प्रयागराज रेलवे के जरिये इन्हें आगे भेजने के प्रमुख ट्रांजिट पॉइंट बन चुके हैं। अमेठी और जगदीशपुर में केले, सब्जी, मछली या अन्य सामान की आड़ में तस्करी के मामले बार‑बार सामने आए हैं, और हापुड़‑मेरठ क्षेत्र छोटे लेकिन लगातार रेस्क्यू मामलों के कारण शक के घेरे में है। इन सभी स्थानों की बात यह है कि यहाँ से बार‑बार, बड़ी संख्या में, और एक जैसे तरीकों से कछुए पकड़े जा रहे हैं, जो साफ संकेत देता है कि यह बिखरी हुई घटनाएँ नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और जमी हुई तस्करी श्रृंखला का हिस्सा हैं। कछुओं की तस्करी में मुख्य रूप से कंजड़/कंजर कम्युनिटी का शामिल होना सामने आया है।
कछुओं की तस्करी का कारण ?
कछुओं की तस्करी किसी एक वजह से नहीं हो रही, बल्कि कई अलग-अलग लालच एक ही जीव पर टूट पड़े हैं। सबसे बड़ा कारण है खाने के लिए, कई इलाकों से, खासकर उत्तर भारत और मध्य भारत के नदी-इलाकों से कछुए पकड़े जाते हैं। कुछ को जिंदा ही ले जाया जाता है, लेकिन बहुत बार मौके पर ही उनका वध कर दिया जाता है। उसके बाद उनका मांस पतले टुकड़ों में काटकर “चिप्स” जैसी शक्ल में सुखाया जाता है, ताकि बदबू न आए, वजन कम हो, रास्ते में खराब न हो और पहचान मुश्किल हो जाए। ये सूखा हुआ कछुए का चिप्स बोरे, थैलों या ट्रेवल बैग में सामान्य सूखे मांस/मछली बताकर रेल या सड़क मार्ग से पश्चिम बंगाल और आसपास के इलाकों तक पहुँचाया जाता है। वहाँ से यह या तो स्थानीय खपत में चला जाता है, या आगे दूसरे नेटवर्क को सौंप दिया जाता है। दूसरा बड़ा कारण है पालतू बनाने के लिए व्यापार। छोटे कछुए शौकीन लोगों के लिए बेचे जाते हैं। लोग नहीं जानते (या जानना नहीं चाहते) कि ये प्रजातियाँ भारत में प्रतिबंधित हैं और इस छोटे-छोटे शौक की वजह से हजारों कछुए नदियों और तालाबों से निकाले जाते हैं। तीसरा कारण है अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र। कुछ इलाकों में आज भी यह धारणा फैलाई जाती है कि कछुए के शरीर के अंग, या जिंदा कछुए की “विशेष पूजा”, धन और शक्ति दिला सकती है। यही वजह है कि तस्करी सिर्फ अंतरराष्ट्रीय नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर भी चलती रहती है।
ये सब हो कैसे रहा है?
1.सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला माध्यम है रेलवे। ट्रेनें सस्ती हैं, लंबी दूरी तय करती हैं, और भीड़ में पहचान छिपाना आसान होता है। बोरे, बक्से, ट्रॉली बैग सब कुछ चलता है। कई मामलों में कछुओं को इतनी क्रूर हालत में बाँधा जाता है कि वे रास्ते में मर भी जाते हैं। पकड़े जाने पर सिर्फ “कैरियर” पकड़ा जाता है, नेटवर्क नहीं।
2.दूसरा माध्यम है सड़क मार्ग। ट्रक, पिकअप, यहाँ तक कि बाइक पर बोरे बाँधकर भी कछुए ले जाए जाते हैं। ग्रामीण इलाकों से बड़े शहरों या बॉर्डर स्टेट्स तक यही रास्ता इस्तेमाल होता है। चेक-पोस्ट पार करना तभी संभव है जब निगरानी ढीली हो, जानकारी का अभाव हो, या मिलीभगत हो और यही शक सबसे ज्यादा परेशान करता है।
3.तीसरा और बढ़ता हुआ माध्यम है एयरपोर्ट और कूरियर। अंतरराष्ट्रीय तस्करी में कछुओं को लगेज, कार्टन या “एक्वेरियम फिश” बताकर भेजा जाता है। यह तरीका हाई-रिस्क है, लेकिन मुनाफा इतना ज्यादा कि तस्कर जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस पूरी श्रृंखला में सबसे कमजोर कड़ी गरीब स्थानीय लोग होते हैं-मछुआरे, ग्रामीण, बेरोजगार युवा। उन्हें थोड़े पैसों का लालच देकर कछुए पकड़वाए जाते हैं। असली मुनाफा ऊपर बैठे लोगों को जाता है, जिनके नाम कभी सामने नहीं आते। असल सच्चाई यही है कि कछुओं की तस्करी एक अकेले अपराधी का काम नहीं, बल्कि एक पूरा तंत्र है जिसमें मांग, माध्यम, चुप्पी और दिखावटी कार्रवाई सब शामिल हैं। कछुओं की तस्करी आज सिर्फ एक अवैध गतिविधि नहीं रह गई है, बल्कि यह हमारे संरक्षण तंत्र की साख पर भी सवाल खड़े करती है। हर कुछ महीनों में किसी न किसी रेलवे स्टेशन, बस अड्डे या हाईवे पर सैकड़ों कछुए पकड़े जाने की खबर आती है। तस्वीरें छपती हैं, बयान दिए जाते हैं, और फिर मामला धीरे-धीरे खामोशी में डूब जाता है। लेकिन एक सवाल हर बार जिंदा रह जाता है-अगर तस्करी रोकी जा रही है, तो वह बार-बार हो कैसे रही है?
सबसे दुखद पहलू यह है कि इस पूरे खेल में कछुआ कहीं भी केंद्र में नहीं है। न वह फैसला कर सकता है, न विरोध। उसके जीवन और मृत्यु के बीच इंसानी लालच, दिखावा और स्वार्थ खड़ा है। संरक्षण का शोर जितना बढ़ता जा रहा है, उतनी ही तेजी से तस्करी के रास्ते भी बदल रहे हैं। असल संरक्षण वह होता है जो खामोशी से होता है। जिसमें न पोस्टर होते हैं, न कैमरे, न “सबसे बड़ा रेस्क्यू” जैसे शब्द। असल संरक्षण वह है जहाँ तस्करी की नौबत ही न आए। लेकिन दुर्भाग्य से आज हम उस दौर में हैं जहाँ बचाव को बेचने की होड़ लग गई है। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कछुओं की तस्करी कौन कर रहा है। सवाल यह भी है कि कौन-कौन, जानबूझकर या अनजाने में, इस तस्करी को संभव बना रहा है। जब तक इस सवाल का ईमानदार जवाब नहीं मिलेगा, तब तक हर रेस्क्यू के पीछे एक और संदेह खड़ा होता रहेगा। कछुओं को बचाने के लिए सबसे पहले हमें यह तय करना होगा कि हम संरक्षण चाहते हैं या प्रदर्शन। क्योंकि अगर संरक्षण भी एक धंधा बन गया, तो फिर कछुए नहीं बचेंगे, सिर्फ खबरें बचेंगी।
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