Specialist's Corner
प्रशान्त कुमार वर्तमान में उत्तराखण्ड वन विभाग में वरिष्ठ परियोजना सहयोगी (वन्यजीव) के पद पर कार्यरत हैं तथा पिछले सात वर्षों से वन्यजीव अपराध नियंत्रण एवं संरक्षण में प्रभावी शोध एवं विश्लेषण कार्य कर रहे है। इन्होंने लगभग पन्द्रह हजार से अधिक वन कर्मियों को वन्यजीव फॉरेंसिक एवं वन्यजीव संरक्षण विषय में प्रशिक्षित किया है तथा पांच सौ से अधिक प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन भी किया है। प्रशान्त कुमार, फॉरेंसिक विज्ञान में बीएससी तथा एमएससी है एवं वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक्स में फील्ड के अनुभवी हैं।
उत्तराखंड को देवभूमि के साथ-साथ नदियों और समृद्ध जैव विविधता की भूमि भी कहा जाता है। हिमालय की गोद से निकलने वाली गंगा, यमुना, कोसी, रामगंगा, काली, नंधौर तथा उनकी सहायक नदियाँ न केवल करोड़ों लोगों के जीवन का आधार हैं, बल्कि अनेक दुर्लभ जलीय जीवों का प्राकृतिक आवास भी हैं। इन्हीं जीवों में सबसे प्रमुख और आकर्षक है गोल्डन महशीर, जिसे उसकी शक्ति, सुंदरता और सुनहरे रंग के कारण नदियों का स्वर्णिम प्रहरी तथा नदियों का बाघ भी कहा जाता है। यह मछली उत्तराखंड की प्राकृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है और राज्य की स्वच्छ, अविरल एवं जीवनदायिनी नदियों का प्रतीक मानी जाती है।
गोल्डन महशीर कार्प परिवार की एक बड़ी मीठे पानी की मछली है। इसके शरीर पर सुनहरी आभा लिए बड़े-बड़े चमकीले शल्क (स्केल) होते हैं, जो इसे अन्य मछलियों से अलग पहचान देते हैं। सामान्यतः इसकी लंबाई 60 सेंटीमीटर से 1.5 मीटर तक हो सकती है, जबकि अनुकूल परिस्थितियों में इसका वजन 30 से 40 किलोग्राम या उससे अधिक भी पाया गया है। यह अत्यंत शक्तिशाली तैराक होती है और तेज जलधाराओं में लंबी दूरी तक तैरने की क्षमता रखती है। इसी विशेषता के कारण इसे विश्व की सर्वश्रेष्ठ स्पोर्ट फिश में गिना जाता है और अनेक देशों के मत्स्य प्रेमियों के लिए यह आकर्षण का केंद्र है।
उत्तराखंड की हिमालयी नदियाँ गोल्डन महशीर के लिए आदर्श आवास उपलब्ध कराती हैं। राज्य की गंगा, यमुना, कोसी, रामगंगा, काली, शारदा तथा विशेष रूप से नंधौर नदी में इसका प्राकृतिक वितरण पाया जाता है। स्वच्छ, ठंडे, ऑक्सीजन-युक्त और तेज प्रवाह वाले जल में यह सबसे अच्छी तरह विकसित होती है। प्रजनन काल के दौरान गोल्डन महाशीर नदी की धारा के विपरीत दिशा में कई किलोमीटर तक प्रवास करती है और ऊपरी क्षेत्रों में कंकरीले नदी तल पर अंडे देती है। इस कारण नदियों का प्राकृतिक प्रवाह और अविरलता इसके जीवन चक्र के लिए अत्यंत आवश्यक है।
कुमाऊँ क्षेत्र की नंधौर नदी गोल्डन महशीर के संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। नंधौर वन्यजीव अभयारण्य से होकर बहने वाली यह नदी अपनी स्वच्छ जलधारा, प्राकृतिक नदी तंत्र तथा समृद्ध जैव विविधता के कारण इस संकटग्रस्त प्रजाति के लिए सुरक्षित आवास प्रदान करती है। वन्यजीव वैज्ञानिकों के अनुसार नंधौर जैसी नदियाँ भविष्य में गोल्डन महशीर के प्राकृतिक संरक्षण की आधारशिला बन सकती हैं। यदि इन नदियों के प्रवाह, जल गुणवत्ता तथा प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखा जाए, तो महशीर की घटती आबादी को पुनः बढ़ाया जा सकता है।
गोल्डन महशीर केवल एक सुंदर मछली नहीं, बल्कि नदी पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण घटक भी है। यह छोटी मछलियों, जलीय कीटों, शैवाल, फल, बीज तथा अन्य प्राकृतिक खाद्य पदार्थों का सेवन करती है और जलीय खाद्य श्रृंखला के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किसी नदी में गोल्डन महशीर की स्वस्थ आबादी उस नदी के स्वच्छ, प्रदूषण-मुक्त तथा पारिस्थितिक रूप से संतुलित होने का संकेत मानी जाती है। इसलिए इसे हिमालयी नदियों के पर्यावरणीय स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण जैव संकेतक भी माना जाता है।
उत्तराखंड में गोल्डन महशीर का आर्थिक और सामाजिक महत्व भी विशेष है। यह केवल स्थानीय मत्स्य संसाधन का हिस्सा नहीं है, बल्कि इको-टूरिज्म और स्पोर्ट फिशिंग की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण प्रजाति है। देश-विदेश से अनेक पर्यटक उत्तराखंड की नदियों में नियंत्रित एवं वैज्ञानिक पद्धति से होने वाली कैच एंड रिलीज-एंगलिंग का अनुभव लेने आते हैं। यदि संरक्षण के सिद्धांतों का पालन करते हुए इस गतिविधि को बढ़ावा दिया जाए, तो यह स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी उत्पन्न कर सकती है।
हालाँकि वर्तमान समय में गोल्डन महशीर अनेक गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। नदियों पर बनने वाले बाँध और बैराज इसके प्राकृतिक प्रवास को बाधित करते हैं, जिससे यह अपने प्रजनन स्थलों तक नहीं पहुँच पाती। इसके अतिरिक्त अवैध एवं अत्यधिक मत्स्यन, नदी प्रदूषण, रेत खनन, जलवायु परिवर्तन तथा जल प्रवाह में लगातार हो रहे बदलावों ने इसकी संख्या को काफी कम कर दिया है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने गोल्डन महशीर को संकटग्रस्त श्रेणी में रखा है।
इन चुनौतियों को देखते हुए उत्तराखंड में गोल्डन महशीर के संरक्षण के लिए अनेक वैज्ञानिक प्रयास किए जा रहे हैं। भीमताल स्थित आईसीएआर सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ कोल्डवॉटर फिशरीज रिसर्च इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। संस्थान ने गोल्डन महशीर के कृत्रिम प्रजनन, कैप्टिव ब्रीडिंग, बीज उत्पादन तथा आधुनिक हैचरी तकनीक का सफल विकास किया है। यहाँ विकसित वैज्ञानिक तकनीकों की सहायता से बड़ी संख्या में महशीर के बीज तैयार कर उन्हें विभिन्न नदियों और जलाशयों में छोड़ा जाता है, जिससे प्राकृतिक आबादी को पुनर्स्थापित करने में सहायता मिल रही है। वर्षभर नियंत्रित परिस्थितियों में महशीर का सफल प्रजनन संभव बनाना इस संस्थान की एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि है। कोसी तथा नंधौर नदियों में महशीर को अठखेलियाँ करते हुए कई बार देखा गया है एवं वन विभाग द्वारा इसके शिकार एवं नुकसान पहुँचाने पर पूर्णतया प्रतिबन्ध लगाया गया है।
इसी प्रकार देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान भी गोल्डन महशीर के संरक्षण एवं शोध में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। संस्थान के वैज्ञानिक कोसी, गंगा तथा पश्चिमी हिमालय की अन्य नदियों में गोल्डन महशीर के प्रवास, आवास उपयोग, प्रजनन व्यवहार तथा रेडियो-टेलीमेट्री आधारित निगरानी पर विस्तृत अध्ययन कर रहे हैं। इन अध्ययनों से यह समझने में सहायता मिल रही है कि बाँध, जल प्रवाह में परिवर्तन तथा मानवीय गतिविधियाँ इस प्रजाति के जीवन चक्र को किस प्रकार प्रभावित करती हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा प्राप्त शोध निष्कर्ष भविष्य की संरक्षण योजनाओं तथा नदी प्रबंधन नीतियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं।
उत्तराखंड सरकार, मत्स्य विभाग, वन विभाग, वैज्ञानिक संस्थानों तथा स्थानीय समुदायों के संयुक्त प्रयासों से गोल्डन महशीर के संरक्षण की दिशा में सकारात्मक पहल हो रही है। नदी संरक्षण, अवैध मत्स्यन पर नियंत्रण, कृत्रिम बीज उत्पादन, जन-जागरूकता अभियान तथा वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे प्रयास इस दुर्लभ प्रजाति को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नदियों का प्राकृतिक प्रवाह बनाए रखा जाए और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए, तो गोल्डन महशीर की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
गोल्डन महशीर केवल एक मछली नहीं, बल्कि उत्तराखंड की नदियों की जीवंत पहचान, हिमालयी जैव विविधता की अमूल्य धरोहर और स्वच्छ जल पारिस्थितिकी का प्रतीक है। इसका संरक्षण केवल एक प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि हमारी नदियों, प्राकृतिक संसाधनों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित रखने का संकल्प भी है। यदि हम अपनी नदियों को स्वच्छ, अविरल और प्रदूषण-मुक्त बनाए रखने में सफल होते हैं, तो गोल्डन महशीर आने वाले वर्षों तक उत्तराखंड की नदियों में अपनी स्वर्णिम उपस्थिति के साथ हमारी प्राकृतिक विरासत को समृद्ध करती रहेगी। वास्तव में, गोल्डन महशीर का संरक्षण उत्तराखंड की नदियों के संरक्षण का ही दूसरा नाम है।
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