Specialist's Corner
प्रशान्त कुमार वर्तमान में उत्तराखण्ड वन विभाग में वरिष्ठ परियोजना सहयोगी (वन्यजीव) के पद पर कार्यरत हैं तथा पिछले सात वर्षों से वन्यजीव अपराध नियंत्रण एवं संरक्षण में प्रभावी शोध एवं विश्लेषण कार्य कर रहे है। इन्होंने लगभग पन्द्रह हजार से अधिक वन कर्मियों को वन्यजीव फॉरेंसिक एवं वन्यजीव संरक्षण विषय में प्रशिक्षित किया है तथा पांच सौ से अधिक प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन भी किया है। प्रशान्त कुमार, फॉरेंसिक विज्ञान में बीएससी तथा एमएससी है एवं वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक्स में फील्ड के अनुभवी हैं।
हाथी भारत में सिर्फ एक बड़े और ताकतवर जानवर नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक, पारिस्थितिक और सामाजिक पहचान का हिस्सा भी है। भारत के जंगलों, राष्ट्रीय उद्यानों और रेंजों में हाथी अपने झुंड के साथ घूमते हैं, जहाँ बच्चे अपनी माँ और समूह के सदस्यों से सीखते हैं, खेलते हैं और जीवन की कठिनाइयों का सामना करना सीखते हैं। झुंड से बिछड़ना उनके लिए केवल शारीरिक खतरे की बात नहीं है, बल्कि यह उनकी मानसिक सुरक्षा और सामाजिक विकास को भी प्रभावित करता है। जंगलों के सिकुड़ने, मानव गतिविधियों, सड़कों, रेलवे लाइन और खेती की वजह से हाथियों के पारंपरिक मार्ग टूट गए हैं, जिससे झुंड बिखरते हैं और छोटे हाथी अकेले पड़ जाते हैं। अकेले पड़े बच्चे मानसिक तनाव, भूख, चोट और बीमारी का सामना करते हैं, और कई बार उनके जीवन का खतरा भी बढ़ जाता है। वर्तमान में हाथी के बच्चों के झुंड से बिछड़ने की घटनाएँ लगातार सामने आ रही है। साल 2025 में कई ऐसे मामले सामने आये जिसमे हाथी के बच्चे दोबारा अपनी माँ से नहीं मिल पाए इनमे से कुछ घटनाये निम्न है-
उत्तर प्रदेश-बिजनौर/नजीबाबाद में हाथी के बच्चे का मामला
2 दिसंबर 2025 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के नजीबाबाद जंगल में एक बहुत छोटे हाथी के बच्चे को उसके जन्म के तुरंत बाद गड्ढे में फँसा हुआ पाया गया, जहाँ वह अपनी माँ से अलग स्थिति में था। वन विभाग के अधिकारियों ने तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया और बच्चे को कीचड़ भरे गड्ढे से निकालकर सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया। प्रारंभिक प्रयासों के बावजूद बच्चे को उसकी माँ से वापस नहीं मिलाया जा सका, इसलिए उसे बाद में पीलीभीत टाइगर रिजर्व में लाया गया और वहाँ उसकी बेहतर देखभाल की जा रही है। इस नन्हे हाथी की देखभाल के लिए विशेष व्यवस्था तैयार की गई है ताकि वह स्वस्थ होकर आगे जीवन जी सके और संभवतः उसके पुनर्वास के अन्य विकल्पों पर भी काम हो सके। इस घटना से स्पष्ट होता है कि हाथी के बच्चे जन्म के बाद भी प्राकृतिक आपदाओं, बाधाओं और पारिस्थितिक दबावों के कारण झुंड से अलग हो सकते हैं और ऐसे समय में वन विभाग की सहायता बेहद महत्वपूर्ण बन जाती है।
असम-काजीरंगा नेशनल पार्क में हाथी के बच्चे का बिछड़ना और पुनर्मिलन
5 जुलाई 2025 को असम के गोलाघाट जिले में एक भावनात्मक और सफलता-भरी घटना सामने आई, जब लगभग आठ सप्ताह (लगभग दो महीने) के एक हाथी के बच्चे को उसकी माँ से अलग पाया गया और वन विभाग तथा सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ रिहैबिलिटेशन एंड कंजर्वेशन की टीम ने उसकी तुरंत मदद की। स्थानीय लोगों ने सुबह जंगल के पास बच्चे को अकेले भटकते देख वन अधिकारियों को सूचित किया, क्योंकि मुख्य राजमार्ग के नजदीक बच्चा भयभीत और भ्रमित दिखाई दे रहा था। टीम ने बच्चे को सुरक्षित स्थान पर ले जाकर उसकी स्वास्थ्य जांच की और फिर वन अधिकारियों ने उस बच्चे को वापस उसी स्थान पर ले जाकर जहाँ झुंड देखा गया था, प्रयास शुरू किया। पुनर्मिलन को सफल बनाने के लिए टीम ने बच्चे पर माँ के गोबर का लेप लगाया ताकि उस पर इंसानी गंध कम रहे और माँ उसे आसानी से पहचान सके। थोड़ी देर बाद जंगल से उसकी माँ प्रकट हुई और दोनों का दिल छू लेने वाला मिलन हुआ, जब माँ ने बच्चे को गले लगा लिया और उसे अपने साथ जंगल में वापस ले चली। इस घटना ने दिखाया कि संवेदनशील, त्वरित और वैज्ञानिक तरीके से किया गया रख-रखाव और वन विभाग का समन्वित प्रयास बिछड़े हाथी के बच्चों को सुरक्षित रूप से अपनी माँ और झुंड के पास लौटने में मदद कर सकता है।
साल 2025 में भा.व.से. अधिकारी परवीन कसवान ने एक बहुत ही भावनात्मक और वायरल वीडियो साझा किया था, जिसे सोशल मीडिया पर खासा देखा गया और पसंद किया गया। इस वीडियो में एक 15 दिन के हाथी के बच्चे को बाढ़ के दौरान नदी से बचाया गया दिखाया गया, लेकिन जब वन अधिकारियों ने उसे उसकी माँ के पास वापस मिलाने की कोशिश की, तो माँ ने बच्चे को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद बच्चे को वन विभाग के विशेषज्ञ देखभाल केंद्र में रखा गया, जहाँ उसकी सही देखभाल की जा रही है और वह स्वस्थ तथा सक्रिय है, यह वीडियो लोगों के बीच बड़ा असर छोड़ गया।
झुंड से अलग हुआ हाथी का बच्चा मालन नदी में फँसा, समय रहते किया गया रेस्क्यू
साल 2025 के सितंबर माह में उत्तराखंड के कॉर्बेट टाइगर रिजर्व क्षेत्र में एक बेहद छोटी उम्र का हाथी का बच्चा अपने झुंड से बिछड़कर मालन नदी के उफनते पानी में बह गया था। वन विभाग को सूचना मिलने पर रेस्क्यू टीम ने तुरंत कार्रवाई की और बच्चे को बहते पानी से निकालकर सुरक्षित स्थान पर ले आया। प्रारंभिक प्रयासों में उसे उसके झुंड से मिलाने की कोशिश भी की गई, लेकिन आसपास कोई हाथी नहीं मिला, इसलिए वन विभाग ने उसे कॉर्बेट के कालागढ़ एलिफेंट सेंटर में रखा और उसकी स्वास्थ्य देखभाल शुरू की।
उत्तराखंड-रुद्रपुर/संजय वन का ‘राजा‑रुस्तम’ (बिछड़ने के बाद की स्थिति)
2025 में उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जिले के संजय वन चेतना केंद्र में दो हाथी के बच्चे ‘राजा’ और ‘रुस्तम’ को अलग‑अलग समय पर झुंड से बिछड़े मिलने के बाद सुरक्षित रखा गया था। राजा को जनवरी में हरीपुरा जलाशय के पास और रुस्तम को अप्रैल में बन्नाखेड़ा क्षेत्र से जख्मी अवस्था में बचाया गया और वन विभाग ने दोनों का इलाज किया। शुरुआती समय में दोनों अच्छी दोस्ती कर रहे थे, लेकिन बाद में आपसी झगड़े बढ़ने लगे, इसलिए वन विभाग ने उनके बाड़े को मजबूत कर उन्हें अलग‑अलग रखा ताकि वे एक‑दूसरे को चोट न पहुंचाएँ और सुरक्षित रूप से बड़े हो सकें। अलग होने के कुछ समय बाद 3 दिसंबर 2025 को राजा की मृत्यु हो गयी।
हाथी के बच्चे क्यों बिछड़ रहे हैं? एक गंभीर पर्यावरणीय और मानवीय समस्या
आज के समय में हाथी के बच्चों का अपने झुंड से बिछड़ना एक आम लेकिन बेहद चिंताजनक समस्या बनती जा रही है। जंगलों से लेकर खेतों और सड़कों तक, अक्सर छोटे हाथी अकेले घूमते या घायल अवस्था में पाए जाते हैं। यह स्थिति केवल एक जानवर की नहीं, बल्कि पूरे पर्यावरण संतुलन और मानव वन्यजीव संबंधों की गंभीर कहानी कहती है। सबसे बड़ा कारण जंगलों का कटाव और सिकुड़ना है। सड़कों, रेलवे लाइनों, खनन परियोजनाओं, कॉलोनियों और उद्योगों के निर्माण से हाथियों के प्राकृतिक मार्ग (कॉरिडोर) टूट गए हैं। जब झुंड एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर जाता है, तो रास्ते में बाधाएँ आने से हाथी बिछड़ जाते हैं। छोटे बच्चे अक्सर पीछे रह जाते हैं और अपने परिवार से अलग हो जाते हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण मानव हाथी संघर्ष है। खेतों में फसल की तलाश में जब हाथी आते हैं, तो कई बार डर या गुस्से में लोग उन्हें भगाने की कोशिश करते हैं। पटाखे, तेज आवाज या बिजली की बाड़ से झुंड में अफरा-तफरी मच जाती है, जिससे हाथी के बच्चे अपनी माँ से बिछड़ जाते हैं।
तीसरा कारण दुर्घटनाएँ हैं। सड़क और रेलवे लाइन पार करते समय कई बार हाथी घायल हो जाते हैं या डर के कारण इधर-उधर भाग जाते हैं। तेज रफ्तार वाहनों और ट्रेनों की वजह से झुंड टूट जाता है और बच्चे अकेले रह जाते हैं।
इसके अलावा अवैध गतिविधियाँ और शिकार का डर भी एक कारण है। यद्यपि हाथियों का शिकार कानूनन अपराध है, फिर भी कुछ क्षेत्रों में इसका खतरा बना रहता है। डर की स्थिति में झुंड तेजी से भागता है, और कमजोर या छोटे हाथी पीछे छूट जाते हैं। हाथी के बच्चे का अपनी माँ से बिछड़ना उसके लिए बेहद खतरनाक होता है। हाथी सामाजिक और भावनात्मक प्राणी होते हैं। माँ न केवल बच्चे को भोजन और सुरक्षा देती है, बल्कि उसे जीवन जीने के तरीके भी सिखाती है। अकेला हाथी का बच्चा मानसिक तनाव, बीमारी और भूख का शिकार हो सकता है। वन विभाग और वन्यजीव संगठनों द्वारा ऐसे बिछड़े हाथी के बच्चों को बचाने का प्रयास किया जाता है, लेकिन यह कार्य बहुत चुनौतीपूर्ण होता है। हर बच्चे को फिर से झुंड में मिलाना संभव नहीं हो पाता, और कई बार उन्हें मानव देखरेख में रखना पड़ता है। समाधान के रूप में जरूरी है कि हाथी कॉरिडोरों की रक्षा की जाए, जंगलों की कटाई रोकी जाए, सड़कों और रेलवे लाइनों पर चेतावनी व सुरक्षा उपाय बढ़ाए जाएँ, और लोगों में वन्यजीवों के प्रति जागरूकता फैलाई जाए। जब तक विकास और प्रकृति के बीच संतुलन नहीं बनेगा, तब तक हाथी के बच्चों का बिछड़ना जारी रहेगा। हाथी के बच्चे का अपनी माँ से बिछड़ना केवल एक जानवर की पीड़ा नहीं है, बल्कि यह मनुष्य द्वारा प्रकृति के साथ किए जा रहे हस्तक्षेप का परिणाम है। यदि समय रहते हमने प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी नहीं निभाई, तो भविष्य में ऐसी दुखद घटनाएँ और बढ़ सकती हैं।
Leave a comment