Parenting A Pet
डॉ आराधना भास्कर (एनेस्थीसियोलॉजिस्ट)
साहित्य में रुचि, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित, एक काव्य संग्रह ‘आगाज‘ 2018 में प्रकाशित
चैरी सात महीने का हो गया है, वह तेजी से बड़ा हो रहा है। हर दिन पहले से अधिक शरारती,कुछ नया ऊधम, कुछ नई कारगुजारी, कुछ नया नुकसान और उसकी हर दिन बढ़ती बदमाशियों पर हम बस ऊपरी गुस्सा करते करते उस पर हर दिन और न्योछावर हुए जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे घर में नन्हे शिशु को धीरे धीरे बढ़ता देखते हैं और उसकी बालसुलभ लीलाओं पर मन बलिहारी हुआ जाता है।
दो महीने का नन्हा शिशु था जब हमारे घर आया, बड़े प्यार से हमने इसे सहेजा संभाला और बड़ी सहजता से इसकी उपस्थिति हमारे घर को हंसी, खुशी और सकारात्मकता से भरती गई,और हम सबके फोन की गैलरी ब्राउन होती गई। जिसका भी फोन उठाकर देख लो सबसे ज्यादा चैरी के फोटो वीडियो मिलेंगे, सो ये हैं हमारे घर के सेलिब्रिटी। आसपास के बच्चे इनके नाम से हमारे घर को जानते हैं, और इनसे ही मिलने आते हैं।
लेकिन एक बात है, चैरी खूब खुशमिजाज हमेशा उछलता, कूदता, फुदकता रहने वाला बच्चा है,शरारती भी बहुत ज्यादा है लेकिन ये सब अपनी सेफ जगह, अपने घर और हमारे आसपास।
घर से बाहर के माहौल में एकदम सहम जाता है, यहां तक कि छोटे बच्चों से भी डरता है,किसी के पास नहीं जाता। घर में कोई किसी से ऊंची आवाज में बात कर ले, ये सहम जाता है। इसके अंदर हमेशा से एक डर, एक असुरक्षा का भाव महसूस किया है मैंने। कभी सोचती हूं कि क्या पता जन्मों का चक्र एक सच्चाई हो और अपने पिछले जन्म में इसने कोई धोखा खाया हो जो ये किसी पर जल्दी यकीन नहीं करता। हमारे पास भी ये आया है तो मैं मानती हूं कि हम खुशकिस्मत हैं जो इसने हमें चुना। इसको खुश रखना हमेशा सुरक्षित महसूस कराना हमारी जिम्मेदारी है। और सच कहूं, तो बड़ा सुकून है इस जिम्मेदारी को निभाने में। इस नन्हे बच्चे की असुरक्षा की भावना को भांपकर ही मैंने अपने व्यक्तिगत साफ सफाई के आग्रह को जतन से पीछे धकेल दिया,और इसको ये अधिकार दिया कि ये जब चाहे मेरी गोद में आकर बैठ जाए, मेरे बिस्तर पर मेरे पास सो जाए।
इससे पहले सॉफ्टी थी, उससे बहुत प्यार था पर कभी बिस्तर या सोफे पर बैठने देना मैं मंजूर नहीं कर पाई, वजह वही कि स्वच्छता के मद्देनजर मैं इसको ठीक नहीं मानती थी। सॉफ्टी एक शानदार लेब्राडोर थी,जो हमारे जीवन से तेरह सालों के लम्बे साथ के बाद अप्रैल 2024 में गई। उन तेरह सालों की अनगिनत यादें हैं, अपनत्व,प्रेम और सान्निध्य की। सॉफ्टी के साथ ने समझाया कि एक गहरा आत्मीय लगाव निभाने के लिए, संवेदनाओं के आदान प्रदान के लिए भाषा की कितनी कम अहमियत है!
ऊपर बात निकली थी कि मैं सॉफ्टी को बिस्तर या सोफे पर नहीं बैठने देती थी, बच्चे मेरी गैरमौजूदगी में उसे अपने बिस्तर पर बिठा लेते थे पर मेरे आते ही वो तुरंत नीचे उतरती थी इससे पहले कि मैं डांटना शुरू करूं। एक सिंगल सोफा था जो सॉफ्टी के बैठने की फेवरिट जगह था, जो उसके नाखूनों की खरोंच से डैमेज हो गया था। जब सोफा रिपेयर कराया तो मैंने कसम खा ली कि अब सॉफ्टी को उस पर नहीं बैठने देना है,और मैंने नहीं बैठने दिया। ड्राइंग रूम और डाइनिंग एरिया के बीच एक ग्लास डोर लगवाकर मैंने ये सुनिश्चित कर लिया कि सॉफ्टी ड्रॉइंगरूम में न पहुंच पाए और इस तरह मैंने अपनी संतुष्टि कर ली, पर उसके बाद लगभग साल भर बाद ही सॉफ्टी इस दुनिया से चली गई, सोफा वहीं रखा रह गया! साफ,सुन्दर बिना नाखूनों के निशान के!! महीनों दिल में एक टीस उठती रही,वो ग्लास डोर जिसके पीछे से सॉफ्टी बस देख सकती थी,सोफे पर जाकर बैठ नहीं सकती थी, सब वहीं था मेरे दिल पर एक बोझ की तरह, बस सॉफ्टी नहीं थी।
एक सबक मिला मुझे, सांसारिक वस्तुएं नहीं हैं सहेजने के लिए, जीवित प्राणी हैं जिन्हें सहेजे रखना है, खुश रखना है। चैरी के लिए ये विशेषाधिकार कहीं न कहीं उसी अपराधबोध से उपजा है। सॉफ्टी मुझसे प्यार करती थी पर डरती सहमती भी थी, लेकिन चैरी कभी मुझसे नहीं सहमेगा! और ऐसा ही है घर के हर हिस्से पर इन छुटंकू की हुकूमत है,और हमारे दिलों पर भी !
अच्छा, इनके कई नाम बदले गए हैं अब तक। जब आए थे दो महीने की उम्र में,सौ ग्राम के छोटे से पिल्लू, तब इनका नाम रखा गया रामखिलावन फिर कई नामों पर विचार चलता रहा और जोजो,टोटो, जैरी से होते हुए आखिरकार ये चैरी हुए!
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