Specialist’s Corner
प्रशान्त कुमार वर्तमान में उत्तराखण्ड वन विभाग में वरिष्ठ परियोजना सहयोगी (वन्यजीव) के पद पर कार्यरत हैं तथा पिछले सात वर्षों से वन्यजीव अपराध नियंत्रण एवं संरक्षण में प्रभावी शोध एवं विश्लेषण कार्य कर रहे है। इन्होंने लगभग पन्द्रह हजार से अधिक वन कर्मियों को वन्यजीव फॉरेंसिक एवं वन्यजीव संरक्षण विषय में प्रशिक्षित किया है तथा पांच सौ से अधिक प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन भी किया है। प्रशान्त कुमार फॉरेंसिक विज्ञान में बीएससी तथा एमएससी है एवं वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक्स में फील्ड के अनुभवी हैं।
बरसात का मौसम आते ही नदियों का जलस्तर बढ़ जाता है और इसके साथ ही कई क्षेत्रों में मगरमच्छों की मौजूदगी अधिक दिखाई देने लगती है। हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश के तराई और नदी किनारे वाले इलाकों से मगरमच्छ के हमलों की कई घटनाएँ सामने आई हैं। इन घटनाओं ने लोगों में भय का माहौल पैदा किया है, लेकिन इस विषय को केवल डर के नजरिए से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है।
पिछले पाँच वर्षों में उत्तर प्रदेश में मगरमच्छ के हमलों की प्रमुख घटनाएँ
पिछले पाँच वर्षों में उत्तर प्रदेश के नदी और तराई क्षेत्रों में मानव मगरमच्छ संघर्ष की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। विशेष रूप से गोंडा, बहराइच, लखीमपुर खीरी, श्रावस्ती, बलरामपुर और पीलीभीत जैसे जिलों में मानसून के दौरान मगरमच्छों के दिखाई देने तथा हमलों की घटनाएँ लगातार सामने आई हैं। वन विभाग के अनुसार इनमें से अधिकांश घटनाएँ बाढ़, नदी के बढ़े हुए जलस्तर और नदी किनारे बढ़ती मानवीय गतिविधियों से जुड़ी रही हैं।
गोंडा (2026)ः सरयू नदी के किनारे अंतिम संस्कार के बाद स्नान करने गए एक युवक पर अचानक मगरमच्छ ने हमला कर उसे नदी में खींच लिया। घटना के बाद स्थानीय प्रशासन और वन विभाग ने क्षेत्र में लोगों को नदी में उतरने से बचने की सलाह दी तथा निगरानी बढ़ाई। इस घटना ने मानसून के दौरान नदी किनारे बरती जाने वाली सावधानियों की आवश्यकता को फिर से उजागर किया।
बहराइच (2026)ः घाघरा नदी के किनारे खेल रहे लगभग 12 वर्षीय बालक पर मगरमच्छ ने हमला कर दिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। यह घटना उन क्षेत्रों में हुई जहाँ बाढ़ के कारण नदी का फैलाव सामान्य से अधिक था। इसके बाद वन विभाग ने आसपास के गांवों में जागरूकता अभियान चलाया और लोगों से नदी किनारे अकेले न जाने की अपील की।
लखीमपुर खीरी (2022-2025)ः शारदा नदी, घाघरा नदी और उनसे जुड़ी नहरों के आसपास मगरमच्छों के आबादी वाले क्षेत्रों में आने की कई घटनाएँ सामने आईं। कई बार मगरमच्छ खेतों, सिंचाई नहरों और गांवों के तालाबों तक पहुँच गए। इन अधिकांश मामलों में वन विभाग ने सफल रेस्क्यू अभियान चलाकर मगरमच्छों को सुरक्षित पकड़कर उनके प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया। इससे स्पष्ट होता है कि हर घटना हमले की नहीं होती, बल्कि कई बार मगरमच्छ स्वयं भी भटककर मानव बस्तियों तक पहुँच जाते हैं।
श्रावस्ती, बलरामपुर और पीलीभीत (2021-2025)ः राप्ती, घाघरा और शारदा नदी के किनारे बसे क्षेत्रों में मगरमच्छों के दिखाई देने, पालतू पशुओं पर हमले तथा कुछ मामलों में लोगों के घायल होने की घटनाएँ समय≤ पर सामने आईं। अधिकांश घटनाएँ तब हुईं जब लोग नदी में स्नान कर रहे थे, मछली पकड़ रहे थे, पशुओं को पानी पिला रहे थे या नदी किनारे कपड़े धो रहे थे।
मानसून में बढ़ता मानव-मगरमच्छ संघर्ष : विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले पाँच वर्षों में सामने आई अधिकांश घटनाओं का सीधा संबंध मानसून से रहा है। भारी वर्षा के कारण नदियों का जलस्तर बढ़ जाता है, बाढ़ का पानी दूर-दूर तक फैल जाता है और मगरमच्छ अपने सामान्य आवास से निकलकर नई जलधाराओं, नहरों, खेतों और जलभराव वाले क्षेत्रों तक पहुँच जाते हैं। दूसरी ओर, ग्रामीण आबादी भी इन्हीं जल स्रोतों का उपयोग स्नान, मछली पकड़ने, पशुओं को पानी पिलाने और अन्य दैनिक कार्यों के लिए करती है। ऐसे में इंसानों और मगरमच्छों का आमना-सामना होने की संभावना बढ़ जाती है। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि इन घटनाओं को मगरमच्छों की बढ़ती आक्रामकता के बजाय मानवदृवन्यजीव संघर्ष के रूप में देखा जाना चाहिए। मगरमच्छ सामान्यतः बिना कारण हमला नहीं करतेय वे तभी आक्रामक होते हैं जब उन्हें खतरा महसूस होता है, कोई व्यक्ति उनके अत्यधिक निकट पहुँच जाता है या उनके प्रजनन एवं विश्राम स्थलों में प्रवेश कर जाता है।
यह स्थिति बताती है कि समाधान मगरमच्छों को नुकसान पहुँचाने में नहीं, बल्कि लोगों में जागरूकता बढ़ाने, नदी किनारे सुरक्षा उपाय अपनाने, चेतावनी संकेत लगाने, संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी बढ़ाने तथा वन विभाग और स्थानीय समुदाय के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने में है। यही उपाय मानव और मगरमच्छ के बीच सुरक्षित सह-अस्तित्व सुनिश्चित कर सकते हैं।
यह समझना बेहद आवश्यक है कि मगरमच्छ स्वभाव से मनुष्यों का शिकार करने वाला जीव नहीं है। वह लाखों वर्षों से नदियों, झीलों और दलदली क्षेत्रों का निवासी रहा है। सामान्य परिस्थितियों में मगरमच्छ बिना कारण हमला नहीं करता। अधिकांश हमले तब होते हैं जब कोई व्यक्ति उसके बहुत निकट चला जाता है, उसके विश्राम स्थल या घोंसले के पास पहुँच जाता है, या नदी में ऐसे स्थान पर उतरता है जहाँ मगरमच्छ पहले से मौजूद होता है। अचानक हुई मुठभेड़ में मगरमच्छ स्वयं को सुरक्षित रखने या भोजन की स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण हमला कर सकता है। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि अधिकांश घटनाएँ मानव और मगरमच्छ के बीच अनजाने में हुए संपर्क का परिणाम होती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, मानसून में नदियों का फैलाव, नदी किनारे बढ़ती मानवीय गतिविधियाँ, अवैध बालू खनन, जलाशयों में अतिक्रमण तथा प्राकृतिक आवासों में हस्तक्षेप मानव-मगरमच्छ संघर्ष के प्रमुख कारण हैं। जब इंसान और वन्यजीव एक ही स्थान का अधिक उपयोग करने लगते हैं, तब ऐसी घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए केवल मगरमच्छ को दोषी ठहराना समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि प्राकृतिक आवासों की रक्षा और सुरक्षित सह-अस्तित्व की दिशा में प्रयास करना अधिक आवश्यक है।
उत्तराखंड में संरक्षण की मिसाल
उत्तराखंड में मगरमच्छों के संरक्षण और उनके वैज्ञानिक प्रबंधन पर लगातार कार्य किया जा रहा है। हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर, राजाजी टाइगर रिजर्व, कॉर्बेट लैंडस्केप और रामगंगा नदी क्षेत्र में समय≤ पर मगरमच्छ आबादी वाले क्षेत्रों से बाहर निकलकर नहरों, खेतों या गांवों तक पहुँच जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में वन विभाग की रेस्क्यू टीमें तुरंत सक्रिय होकर मगरमच्छों को सुरक्षित पकड़ती हैं और उन्हें उनके प्राकृतिक आवास में छोड़ देती हैं। हर वर्ष अनेक सफल रेस्क्यू अभियान संचालित किए जाते हैं, जिससे मानव और वन्यजीव दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
राज्य सरकार ने ऊधम सिंह नगर जिले के खटीमा स्थित ककरा क्षेत्र में ककरा क्रोकोडाइल सेंटर विकसित किया है। यह स्थान स्वाभाविक रूप से मगरमच्छों का प्राकृतिक आवास है, जहाँ वे वर्षों से निवास करते आए हैं। इस केंद्र का उद्देश्य मगरमच्छों के प्राकृतिक आवास का संरक्षण, लोगों में जागरूकता बढ़ाना, शोध कार्यों को प्रोत्साहन देना तथा नियंत्रित इको-टूरिज्म को बढ़ावा देना है। यहाँ लोग सुरक्षित वातावरण में मगरमच्छों के प्राकृतिक व्यवहार को समझ सकते हैं और यह जान सकते हैं कि यह जीव पारिस्थितिकी तंत्र के लिए कितना महत्वपूर्ण है।
वर्ष 2025 में तराई पूर्वी वन प्रभाग हल्द्वानी द्वारा मगरमच्छ गणना भी कराई गई। इस वैज्ञानिक सर्वेक्षण में ड्रोन, जीपीएस मैपिंग और प्रत्यक्ष गणना जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया गया। इसका उद्देश्य प्रभाग में मगरमच्छों की वास्तविक संख्या, उनके वितरण, प्रजनन स्थलों और संवेदनशील आवासों का आकलन करना था। इस प्रकार की गणना से वन विभाग को संरक्षण की रणनीति तैयार करने, संभावित मानव-मगरमच्छ संघर्ष वाले क्षेत्रों की पहचान करने तथा भविष्य की प्रबंधन योजनाओं को और प्रभावी बनाने में सहायता मिलती है। यह पहल दर्शाती है कि उत्तराखंड में मगरमच्छों के संरक्षण और मानव-सुरक्षा दोनों को समान महत्व दिया जा रहा है।
मगरमच्छों से बचाव के लिए कुछ सामान्य सावधानियाँ अपनाना अत्यंत आवश्यक है-
1.नदी या झील के किनारे लगे चेतावनी बोर्डों का पालन करें,
2.मगरमच्छ वाले क्षेत्र में बकरी और अन्य मवेशी चराने न जाएं,
3.सुबह-शाम अथवा अंधेरे में पानी में उतरने से बचें,
4.अकेले नदी में स्नान या कपड़े धोने न जाएँ,
5.बच्चों को नदी किनारे बिना निगरानी के न छोड़ें तथा जहाँ मगरमच्छ दिखाई देने की सूचना हो, वहाँ से सुरक्षित दूरी बनाए रखें,
6.यदि किसी क्षेत्र में मगरमच्छ दिखाई दे तो तुरंत वन विभाग को सूचना देना सबसे उचित कदम है।
दीर्घकालिक समाधान के लिए वन विभाग, स्थानीय प्रशासन और ग्रामीण समुदाय के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। संवेदनशील नदी तटों पर चेतावनी संकेत, नियमित निगरानी, जनजागरूकता अभियान, सुरक्षित स्नान घाटों का निर्माण तथा मगरमच्छों के प्राकृतिक आवासों का संरक्षण मानव-मगरमच्छ संघर्ष को काफी हद तक कम कर सकता है। साथ ही लोगों को यह समझाना भी जरूरी है कि मगरमच्छ कोई आक्रामक या इंसानों का पीछा करने वाला जीव नहीं है। वह सदियों से हमारी नदियों में रहता आया है और तभी हमला करता है जब उसे खतरा महसूस हो या कोई व्यक्ति उसके अत्यधिक निकट पहुँच जाए।
निष्कर्ष
मगरमच्छ प्रकृति की जैव विविधता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और सदियों से हमारी नदियों, झीलों और आर्द्रभूमियों के अभिन्न निवासी रहे हैं। उनका संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है जितनी मानव जीवन की सुरक्षा। हाल की घटनाएँ हमें डरने के बजाय सतर्क रहने और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की सीख देती हैं। यदि हम उनके प्राकृतिक आवास का सम्मान करें, नदियों के किनारे सावधानी बरतें और वन विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करें, तो इंसान और मगरमच्छ दोनों सुरक्षित रह सकते हैं। सह-अस्तित्व ही इस समस्या का सबसे प्रभावी और टिकाऊ समाधान है।
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