A First-Of-Its-Kind Magazine On Environment Which Is For Nature, Of Nature, By Us (RNI No.: UPBIL/2016/66220)

Support Us
Magazine Subcription

‘Yes, failed ABC programme one reason of conflict’

TreeTake is a monthly bilingual colour magazine on environment that is fully committed to serving Mother Nature with well researched, interactive and engaging articles and lots of interesting info.

‘Yes, failed ABC programme one reason of conflict’

सभी नगर निकायों को यह निर्देश दिया गया कि वे अपने क्षेत्र के अधिकांश कुत्तों का बधियाकरण (एक चिकित्सकीय प्रकिया जिसके माध्यम से कुत्तों को बच्चा पैदा करने से रोकना है) करें ताकि अनियंत्रित रूप से कुत्तों की जनसंख्या न बढ़ें और फिर मनुष्य व उनके बीच संघर्ष भी रुकेगा...

‘Yes, failed ABC programme one reason of conflict’


We Asked: Do you think a poorly managed stray dog sterilization (spaying/neutering) programme is responsible for the rising incidents of man-dog conflict? Neither the private agency given the charge nor the municipality is doing an honest job because, despite claims, one can see lactating mothers and starving litters everywhere! Can we also blame the heavy concentration of dogs in areas where they are regularly fed by dedicated ‘feeders’ for the same?

In a country with 62 million street dogs (Canis familiaris), firstly we need to acknowledge the fact that the ABC Programme for street dogs, pan India, has not been a roaring success and that there are deaths attributed to rabies from street dogs. While the rise in the number of street dogs, which in turn leads to the rise in the number of man-animal conflicts, cannot be attributed to only the failure of the programme, it can be safely said that it is the main reason. Animal birth control contracts are awarded based on the lowest tenders, not primarily based on experience and skill. Wherever tender is awarded to the lowest quote, the quality of output is bound to be shoddy. Animal birth control is the only direct way to solve the problem of the rising dog proposition, there are no two ways about that. And therefore, it needs to be meticulously and scientifically implemented, which is never done. Contracting agencies work for money, not for the cause. They compromise on the quality of work as they are not paid on time. As a result, the programme, and the animals, suffer incurably. The contracting policy should be scrapped and organisations with a welfare objective and corresponding professional background should be engaged in this programme. As mentioned, no one reason is responsible for the failure of the programme. If the programme is to be successful, other parameters need to be strictly monitored. For one, the availability of ample garbage helps the dog population to sustain itself. If garbage clearance is tackled by local authorities, a large percentage of the problem of not only stray dogs but of other stray animals and the spread of diseases through rodents, will drastically and naturally come down. It is not only the man-animal conflict due to the presence of the large number of street dogs, that is alarming. In many smaller towns and villages, instead of taking measures to curb the street dog population, the civic bodies simply relocate the strays, who then venture out into areas of environmental and ecological importance turning whole populations into feral ones. Dogs have superior morphological adaptability and have turned into predators with a pronounced impact on local wildlife in many areas. In Ladakh, the breeding success of the black-necked crane has decreased considerably, the reason being attributed to the predation of FRDs on their eggs and chicks. High disease transmission rates ( of CPV and CDV ) from ferals to wildlife are also a source of major concern. Hybridization between wild and domestic canines as in golden jackals in West Bengal and Himalayan wolves in Spiti Valley, severely impacted the wild canine genetic pool. Wildlife concerns are no less important than the conflicts in urban areas. Feeders have a huge responsibility on themselves to ensure that the pack mentality of street dogs is not encouraged while feeding continues for befriending the animals to catch them for the local ABC Programme. The main work of any animal should be to forage for food, this leaves them with no time to pursue other damaging activities. I always endorse surprise feeding protocols, where the animal does not get into an expected routine of being fed. This keeps them busy foraging for food because they do not know if their next meal is coming or not. This also keeps an animal prepared to be self-sufficient in case the source of food dries up. It is also the responsibility of feeders to coordinate with local bodies to get their area dog population controlled. But it would be unfair to put the entire responsibility on them. Feeders act out of love for animals, they spend time and money to ensure the street dogs are kept satiated, healthy and easy to handle during catching sprees. The ABC Programme runs on a citizen's tax money. Ultimately immediate implementation of the ABC Rules 2023 in letter and spirit, is the duty and responsibility of the State, to ensure the safety and security of humans and animals alike.  This is not done anywhere.  Instead of villainising the ABC Programme, we should look at a vision where both humans and animals can live peacefully. For that, a well-implemented ABC, run by weeks-trained professional organisations is the key pathway. It is unrealistic to expect NGOs to handle the sheer volume of the problem. We will need all the resources, inter-departmental collaboration and research to support a better ABC Programme. Mostly, the scenario needs to be looked at scientifically even by common citizens if we are to make a breakthrough towards a peaceful co-existence of man with domestic and wildlife. - Shakuntala Majumdar, President, CPCA Thane

सभ्यता की शुरुआत से मनुष्य ने कई वन्यप्राणियों को पालतू बनाकर अपने साथ रखना शुरू किया जिसमें एक प्राणी कुत्ता भी है। मनुष्य और कुत्तों का बहुत ही निकट संबंध पिछले हजारों वर्षों से रहा है और यह संबंध इतना मधुर रहा है कि इसी कारण कुत्तों को मनुष्य का सबसे वफादार दोस्त भी कहा गया। लेकिन जैसे जैसे मनुष्य की जनसंख्या बढ़ती गई, वैसे वैसे मनुष्य की सघन बस्तियां बसती गईं जिन्होंने आज शहरों का भी रूप ले लिया है। परंतु इस शहरीकरण में मनुष्य का कुत्तों और अन्य साथी प्राणियों के साथ सहस्तित्व का रिश्ता टूटने लगा, दूरियां बढ़ने लगीं और मनुष्य के द्वारा कुत्तों के भोजन आदि का ध्यान रखने की परंपरा के टूटने और उनके साथ आपसी समझ खत्म होने लगी और इससे उनके साथ संघर्ष के मामले भी बढ़ने लगे। इसमें एक बड़ा कारण यह भी रहा कि लोगों ने विदेशी कुत्तों को पालना शुरू किया जिससे गलियों में रहने वाले देशी कुत्ते और अधिक उपेक्षित हुए और उन्हें एक घुसपैठिए के रूप में देखा जाने लगा। बढ़ती हुई संघर्ष की इन घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण लाने के लिए भारतीय पशु क्रूरता अधिनियम 1960 में कुत्तों की जनसंख्या को रोकना और उनके साथ अच्छा व्यवहार करना इस समस्या का समाधान निकाला गया और सभी नगर निकायों को यह निर्देश दिया गया कि वे अपने क्षेत्र के अधिकांश कुत्तों का बधियाकरण (एक चिकित्सकीय प्रकिया जिसके माध्यम से कुत्तों को बच्चा पैदा करने से रोकना है) करें ताकि अनियंत्रित रूप से कुत्तों की जनसंख्या न बढ़ें और फिर मनुष्य व उनके बीच संघर्ष भी रुकेगा और वे स्वयं भी दुर्घटनाओं का शिकार नहीं होंगे। परंतु देश के कुछ महानगरों को छोड़कर अन्य अधिकांश शहरों में कुत्तों का बधियाकरण करने की प्रक्रिया या तो शुरू नहीं हुई अथवा बहुत कम की गई जिससे कुत्तों की जनसंख्या पर रोक नहीं लग पा रहीं और भावनात्मक रूप से कुत्तों से दूर हो चुके मानव समाज के साथ उनका संघर्ष और स्वयं सड़क दुर्घटनाओं और कुपोषण आदि से उनकी मौत जारी है। बधियाकरण करके कुत्तों की अनियंत्रित रूप से बढ़ती जनसंख्या को रोकना इसलिए भी जरूरी है ताकि उनके वन्यजीवों के साथ टकराव को भी रोका जा सके और वन्यजीवों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो सके। मनुष्य और कुत्तों के बीच संघर्ष का एक और बड़ा कारण यह भी है अधिकांश मनुष्य भी आज कुत्तों और अन्य प्राणियों को देखते ही इनपर पत्थर-डंडे आदि का प्रयोग करते हैं जिससे कुत्ते स्वयं व्यथित होकर कई बार लोगों को काट लेते हैं। साथ ही कई बार एक इलाके के कुत्ते को दूसरे इलाके में पहुंचा देने से भी वहां के स्थानीय कुत्तों और बाहर से लाकर छोड़े गए कुत्ते के बीच भी संघर्ष होता है और इससे कई बार मनुष्य भी इसकी चपेट में आ जाते हैं अतः यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि बधियाकरण के लिए उन्हें उनके इलाके से उठाने के बाद उन्हें अन्यत्र कहीं न छोड़कर उनके मूल स्थान पर ही वापस छोड़ा जाए। आज लोगों को कुत्तों के साथ संघर्ष की घटनाओं को रोकने के लिए बधियाकरण का प्रभावशाली और मानवीय तरीका अपनाने की जरूरत है। इसके लिए लोगों को देश और राज्य की सरकारों व अपने जिला प्रशासन व नगर निकायों से कुत्तों के बधियाकरण को शुरू करने का अनुरोध करना चाहिए और समर्थ लोग स्वयं अपने आसपास के कुत्तों का अपने स्तर पर नजदीकी प्रशिक्षित वेटनरी सर्जन से बधियाकरण कराकर अपने गलीध्मोहल्ले में स्थितियां बेहतर बनाना चाहिए। इसके अतिरिक्त लोग अपने मोहल्ले के कुत्तों को एंटी-रेबीज वैक्सीन दिलाकर भी लोगों में उनके प्रति भय को कम करके संघर्ष को कम कर सकते हैं। साथ ही विदेशी नस्ल के कुत्तों के बजाय यदि लोग सड़क के देशी कुत्तों को ही पालें अथवा सड़क पर ही उनका ध्यान रखें तो भी संघर्ष काफी हद तक रोका जा सकता है। इस मसले में शासन स्तर पर भी एक वृहद मिशन चलाकर कुत्तों के बधियाकरण के लिए एक अलग कोष बनाने और उनमें धन का आवंटन करने की जरूरत है जो नगर निकायों, स्वयंसेवी संगठनों और पशु प्रेमियों के साथ मिलकर इसे प्रभावी ढंग से राज्य, जिला और मोहल्ला स्तर पर लागू कराने में मदद कर सकें। इस मसले पर हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट के एक आदेश के आधार पर केंद्रीय पशुपालन मंत्रालय के द्वारा सभी राज्यों के मुख्य सचिवों से कुछ विदेशी नस्ल के कुत्ते जैसे पिटबुल, तोसा इनू, अमेरिकन शेफर्ड, बुलडाग आदि विभिन्न ब्रीड और इनके क्रास ब्रीड की ब्रीडिंग, विक्रय और खरीदने को पूरी तरह प्रतिबंधित करने का आदेश किया है और यह भी आदेश दिया है कि जिन भी लोगों ने अपने घर में भी इन ब्रीड के कुत्तों को पाला है वे उनका भी बधियाकरण कराना सुनिश्चित करें ताकि उनकी जनसंख्या को पूर्ण रूप से रोका जाए। -अभिषेक दुबे, मानद पशु कल्याण प्रतिनिधि, भारतीय जीव-जंतु कल्याण बोर्ड, एवं अध्यक्ष, नेचर क्लब फाउंडेशन, गोण्डा, उप्र

Before getting the opportunity to write on a topic of such utmost importance, I believed my knowledge about the sterilisation of dogs was quite nebulous. However, after doing in-depth research on this topic, it dawned on me that sterilisation is indeed not as inhuman as we might make it out to be. According to the Indian Express, over the last five years, more than 300 people — mostly children from poor and rural families — have been killed by dogs. Worse still, dogs are responsible for over 20,000 rabies deaths. A 2017 study showed that homeless dogs in rural areas can also be devastating for wildlife. Over 80 species, of which more than 30 are on the endangered list, were targeted by dogs in wilderness areas. This mounting evidence points to a failure on the part of the government to implement policies that are both practical and humane to dogs, people, and wildlife. So, a section of society that finds themselves enamoured by animals even at the cost of human life might disagree. It is quintessential to pay heed to this rising cause of concern. Sterilized dogs and cats live longer than intact dogs and cats. Sterilized dogs have a lower incidence of common diseases such as mammary cancer. Intact dogs are more likely to die of infections and trauma. So, ethical concerns do not come into play. But a pertinent question still pounds our heads. If the sterilisation programs are in full progress, why are the results not visible? We’ve all borne witness to it. Watching stray dogs loiter around every nook and cranny of the streets. The Ministry of Health and Family Welfare reported that incidents of dog bites in India have seen a 26.5 percent year-on-year increase, from 2.18 million incidents in 2022 to 2.75 million incidents in 2023. According to the recently released Bihar Economic Survey (2023-24), dog bite cases in the state have increased by more than 20 times compared with the previous year. These statistics stand as a testament to the fact that while metropolitan cities like Delhi and Mumbai might have been relieved of this issue, it still stands as a tangible concern in rural and sub-urban areas.  When focusing on whether dogs should be fed by dedicated ‘dog feeders’ or not, my personal belief stands firmly against it. The sole reason is that the citizens who feed stray dogs rarely assist public bodies in sterilization or vaccination efforts. Most people who feed dogs violate the conditions set forth by both the AWBI (2015) and the Delhi High Court (2010). These stated that dogs should not be fed at places frequented by people, on public streets, common areas at the entrance to houses or where dogs are herded to be fed. Hence, while sterilisation might be viewed as a method of clemency by some. It is indeed our lack of knowledge which leads us to turn a blind eye to such a situation. The problem regarding the presence of stray dogs on the streets is only the tip of the iceberg. The underlying issue lies in the diseases that swarm in the areas that they turn into their breeding grounds and the incessant need to prevent lethal infections like rabies. -Anisha Singh, Class XI student, St Agnes Loreto


Topic of the month: Are you in favour of the move to install water tanks in every alley, nook and corner wherein the underground water is used? People take illegal piped connections to their homes from those tanks as well. Moreover, strong pumps are used to pull out water that uses electricity at the cost of the taxpayers (money). You may send your views (either in Hindi or English) in 300 words or more to treetakemagazine@

Leave a comment