बथुआ नदी का अस्तित्व बचाने की चुनौती: जंगल भूसौल के पास गोर्रा नदी से प्राकृतिक संबंध, सेमरवना रिवर फ्रंट और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी
एच एन सिंह, लायंस इंटरनेशनल फैकल्टी, स्फीहा सदस्य, प्रकृतिविद्, हैम रेडियो लाइसेंस, ट्रैकर और पर्वतारोही
नदियाँ केवल बहता हुआ पानी नहीं हैं, बल्कि किसी क्षेत्र की जीवनरेखा होती हैं। उनका सीधा संबंध कृषि, भूजल, जैव-विविधता, आर्द्रभूमि, पशु-पक्षियों और मानव जीवन से होता है। बड़ी नदियों के साथ-साथ छोटी नदियाँ और सहायक जलधाराएँ भी प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
पूर्वांचल की महत्वपूर्ण स्थानीय जलधाराओं में बथुआ नदी का विशेष स्थान है। यह नदी रुद्रपुर क्षेत्र में कोटिया और जंगल भूसौल के पास गोर्रा नदी से निकलती थी और विभिन्न क्षेत्रों से होकर बहते हुए सोनबह (मदनपुर) में राप्ती नदी में मिलती है।
ऐसे में जंगल भूसौल के पास बथुआ के प्राकृतिक उद्गम अथवा गोर्रा नदी से उसके जल-संपर्क को बाधित कर दिया गया जो गंभीर पर्यावरणीय चिंता का विषय है। तटबंध और मिट्टी भराई के कारण यह प्राकृतिक संपर्क काट दिया गया है, जिसका प्रभाव केवल वर्तमान जलप्रवाह पर नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की पूरी नदी-व्यवस्था पर पड़ सकता है।
बथुआ को केवल नाला समझना भूल होगी
किसी छोटी नदी को केवल “नाला” या “बरसाती जलधारा” मानना उसके पर्यावरणीय महत्व को कम करके आंकना है। नदी का अस्तित्व उसके उद्गम से लेकर संगम तक एक पूरी जल-प्रणाली से जुड़ा होता है। वर्षाजल, भूजल और सहायक धाराएँ उसके प्रवाह को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यदि गोर्रा से बथुआ का प्राकृतिक जल-संपर्क वास्तव में रहा है और अब बाधित हो गया है, तो यह जानना आवश्यक है कि पहले इस संपर्क से बथुआ को कितना पानी मिलता था और वर्तमान में उसके प्रवाह पर कितना प्रभाव पड़ा है। इसका उत्तर अनुमान से नहीं, वैज्ञानिक अध्ययन से मिलना चाहिए।
उद्गम से अलगाव के गंभीर परिणाम:
नदी को उसके प्राकृतिक जलस्रोत से अलग करने का सबसे बड़ा खतरा उसके नियमित प्रवाह का समाप्त होना है। यदि बथुआ को पर्याप्त प्राकृतिक जल नहीं मिलेगा, तो वर्षा ऋतु के बाद उसका बड़ा हिस्सा सूख सकता है और धीरे-धीरे एक जीवित नदी से बरसाती नाले में बदल सकता है।
इसके साथ नदी तल में गाद जमा होगी, जलधारा सिकुड़ेगी, जलजीव कम होंगे और अतिक्रमण की संभावना बढ़ेगी। नदी का विनाश अचानक नहीं होता , पहले जलप्रवाह घटता है, फिर गाद और प्रदूषण बढ़ते हैं और अंततः नदी केवल पुराने नक्शों और लोगों की स्मृतियों में रह जाती है।
भूजल और जैव-विविधता पर प्रभाव:
नदियाँ भूजल पुनर्भरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। नदी में लंबे समय तक पानी रहने पर उसका कुछ हिस्सा जमीन में रिसकर आसपास के भूजल को पुनर्भरण करता है। इसलिए बथुआ के प्रवाह में कमी केवल नदी का संकट नहीं, बल्कि भविष्य की जल-सुरक्षा का भी प्रश्न है।
नदी के साथ मछलियाँ, जलीय जीव, पक्षी, कीट और नदी किनारे की वनस्पतियाँ भी जुड़ी होते हैं। जलप्रवाह समाप्त होने पर इन सभी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अतः बथुआ को बचाना स्थानीय जैव-विविधता और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बचाना है।
सेमरवना रिवर फ्रंट की भूमिका:
रुद्रपुर में सेमरवना के पास बथुआ नदी के तट पर रिवर फ्रंट बनाया गया है, जहाँ विशेषकर छठ पूजा के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैं। इसलिए बथुआ का संरक्षण केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जिम्मेदारी भी है।
सेमरवना रिवर फ्रंट को केवल सौंदर्यीकरण या धार्मिक आयोजन का स्थल न बनाकर जनभागीदारी, स्वच्छता, पर्यावरण शिक्षा और नदी संरक्षण का आदर्श केंद्र बनाया जा सकता है।
विकास जरूरी है, लेकिन नदी की कीमत पर नहीं
सड़क, पुल, तटबंध और अन्य आधारभूत संरचनाएँ विकास के लिए आवश्यक हो सकती हैं, लेकिन इनके निर्माण में प्राकृतिक जलधाराओं की निरंतरता सुरक्षित रहनी चाहिए। यदि किसी निर्माण से नदी का प्राकृतिक संपर्क टूटता है, तो उपयुक्त कलवर्ट, जलमार्ग या अन्य जल-निकासी व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। विकास का अर्थ नदी को समाप्त करना नहीं, बल्कि नदी के साथ सामंजस्य स्थापित करना है।
बथुआ को बचाने के लिए आवश्यक कदम:
वैज्ञानिक हाइड्रोलॉजिकल सर्वेक्षण कराया जाए और पुराने नक्शों, राजस्व अभिलेखों, उपग्रह चित्रों तथा स्थानीय जानकारी का अध्ययन किया जाए।
गोर्रा-बथुआ जल-संपर्क की वास्तविक स्थिति और उसमें आए परिवर्तन की वैज्ञानिक जांच हो।
यदि प्रमाणित हो कि प्राकृतिक जल-संपर्क आवश्यक है, तो जलप्रवाह को पर्यावरणीय मानकों के अनुसार बहाल किया जाए।
बथुआ के नदी क्षेत्र और बाढ़ क्षेत्र का सीमांकन कर अतिक्रमण रोका जाए।
गाद और कचरे की वैज्ञानिक सफाई की जाए, लेकिन केवल गहरी खुदाई को नदी का पुनर्जीवन न माना जाए।
घरेलू नालों और सीवेज को बिना उपचार के नदी में जाने से रोका जाए।
नदी किनारे स्थानीय प्रजातियों की हरित पट्टी विकसित की जाए।
स्थानीय समुदाय की भागीदारी:
नदी संरक्षण केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं है। ग्राम पंचायत, किसान, युवा, शिक्षक, सामाजिक संगठन और प्रत्येक नागरिक को इसमें सहभागी बनना होगा। नदी में प्लास्टिक, कूड़ा और पूजा सामग्री न डालना तथा नियमित स्वच्छता अभियान चलाना सामुदायिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
प्रत्येक गांव में “बथुआ नदी निगरानी समिति” बनाई जा सकती है। यह समिति अतिक्रमण, प्रदूषण, अवैध भराई और जलधारा में बाधा की निगरानी करे। शिकायतों के लिए रजिस्टर, हेल्पलाइन या व्हाट्सऐप व्यवस्था हो तथा प्रत्येक शिकायत को संख्या देकर उसके निस्तारण की स्थिति सार्वजनिक की जाए। मासिक रिपोर्ट के माध्यम से लंबित और निस्तारित मामलों की जानकारी ग्राम सभा में साझा की जाए। इससे प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिक विश्वास दोनों मजबूत होंगे।
नदी बचाना, भविष्य बचाना है
बथुआ नदी का प्रश्न केवल एक छोटी नदी के अस्तित्व का प्रश्न नहीं है। यह हमारे विकास मॉडल और पर्यावरण के प्रति हमारी सोच की परीक्षा है। नदी का प्राकृतिक उद्गम और प्रवाह आज सुरक्षित रहेगा, तभी आने वाली पीढ़ियों को जल, हरित क्षेत्र और जैव-विविधता मिल सकेगी।
इसलिए जंगल भूसौल के पास बथुआ और गोर्रा के प्राकृतिक संबंध का तथ्य-आधारित वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाना चाहिए। किसी भी निर्माण या हस्तक्षेप के पर्यावरणीय प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन हो और आवश्यक सुधार वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर किए जाएँ।
बथुआ केवल आज की पीढ़ी की संपत्ति नहीं, आने वाली पीढ़ियों की विरासत है।
आइए संकल्प लें:
बथुआ के प्राकृतिक उद्गम की रक्षा करेंगे।
उसके जलप्रवाह को सुरक्षित रखेंगे।
नदी को प्रदूषण और अतिक्रमण से बचाएँगे।
स्थानीय समुदाय को संरक्षण में सहभागी बनाएँगे।
और सेमरवना रिवर फ्रंट को नदी संरक्षण का आदर्श केंद्र बनाएँगे।
क्योंकि बथुआ बचेगी, तभी उसकी धरती और जल बचेगा; बथुआ बचेगी, तभी आने वाली पीढ़ियों का जल-भविष्य सुरक्षित रहेगा।
आइए, बथुआ को बचाएँ, उसके प्राकृतिक प्रवाह को बचाएँ और अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करें।
Leave a comment