A First-Of-Its-Kind Magazine On Environment Which Is For Nature, Of Nature, By Us (RNI No.: UPBIL/2016/66220)

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Mixed feelings over start of night safari in Lucknow

TreeTake is a monthly bilingual colour magazine on environment that is fully committed to serving Mother Nature with well researched, interactive and engaging articles and lots of interesting info.

Mixed feelings over start of night safari in Lucknow

आजकल उत्तर प्रदेश के लखनऊ का राष्ट्रीय जंगल कुकरैल सैंकंचुअरी, जो चारभोग रेलवे स्टेशन से लगभग 10 कि.मी. दूरी पर है, विस्तृत चर्चा में है क्योंकि सरकार इसे पर्यटल स्थल (नाईट सफारी) के रूप में विकसित करने जा रही है...

Mixed feelings over start of night safari in Lucknow

Tell-All

We Asked: Do you think turning Lucknows peaceful Kukrail tortoise sanctuary into a night safari and relocating the Lucknow zoo to that area is a good idea? 

A part of Kukrail forest having an area of 2027-hactare is to be converted into Night Safari Park and Zoological Park. The proposal says that the zoo will be on 150 acres while the night safari will be created in 350 acres. This night safari would be the first in India and a pride of Lucknow. Creation of a night safari in Kukrail will be an addition to safe and secure habitat to wildlife. This will create ecotourism opportunities for wildlife lovers and additional attraction to the capital of UP.  Kukrail forest block has enough large area so it would not have any adverse effect on the existing ghariyal park and the TSA activities already running in Kukrail. As far as shifting of Lucknow Zoo is concerned, I feel the increasing noise pollution and crowd density around its present location is not good for the welfare of the zoo inmates, and thus it will be in favour of the animals to be shifted to bigger area in Kukrail. Shifting of the zoo will provide larger/bigger area for the new zoo and also a chance to extend its area in future as well. The new zoo will provide more area of enclosure per animal and also peaceful environment to them as we know animals have more power of listening to the lower pitch of sound than man. Hence the animals in zoo will feel much better in the new zoo as we feel better when we shift from old home in a mohalla to a new home in a colony. Kukrail forest area is also facing the pressure of ongoing urbanization and a possibility of encroachment cannot be denied in the near future. Creation of night safari and shifting of the zoo will cover large chunk of existing Kukrail forest block and this will surely provide safeguard from future chances of encroachment by surrounding population. Present campus of the zoo can be developed as dense forest by planting more trees which exhales more oxygen like pipal, bargad, neem etc. This new dense forest may act as lungs for the populated surrounding areas. - Anuj Kumar Saxena, DFO (Retd), UP Forest Department 

The proposal to develop a night safari at the Kukrail forest or to move the Lucknow zoo to a bigger area sounds good but the high cost involved and the negative impact on the environment has to be considered as well. History shows us that the government/forest department proposals sound impressive on paper but end up in a miserable state after execution. The breeding centre at Kukrail for endangered species, where Red Jungle Fowl, Black Partridge etc. were kept is completely bogged down. Even the nocturnal house project at the Lucknow zoo was not executed well. The bird collection at the Lucknow zoo still remains poor and the marine aquarium is an apology if compared with those maintained by hobbyists in their private collections. Apparently, the proposal to move the Lucknow zoo to Kukrail is aimed at utilising the vacant land for construction which will be a big project in terms of money. Construction of a new zoo at Kukrail means more money! The environmental impact of both of these activities will, beyond a doubt, be double. It will lead to (1) a loss of enormous number of mature trees, some of them rare, (2) massive construction in the heart of the city contributing to the pollution that's already choking its residents. This proposal is a hurried decision and for sure environmentalists have not been consulted. - Kaushlendra Singh, a wildlife expert, a hunter turned conservator and a former member of Uttarakhand State Wildlife Board

विकास! विकास! विकास के नारे को कार्यान्वित करते हुए सरकारें निरन्तर विनाश के बीज बो रही हैं जिसका प्रभाव प्राकृतिक आपदाओं के रूप में दिन प्रति दिन देखने को मिल रहा है। यूरोप ने सर्वप्रथम आधुनिक विकास किया यानि प्रकृति के साथ अत्याचार के रूप में विनाश का बीजारोपण वहीं से आरम्भ हुआ और परिणाम विकसित देशों में प्रतिदिन आने वाली प्राकृतिक आपदाएं यानि चक्रपात, तु्फान, बर्फबारी, बाढ़ आदि आदि। भारत में भी दूरदर्शिता विहीन विकास की होड़ लगी है। नई कलोनियां बसाने व सड़क मार्ग चैड़ा करने के लिए एक एक प्रान्त में लाखों वृक्ष काटे जा रहे हैं।  मैट्रो पार्किंग के लिए हजारों वृक्षों का कत्ल साधारण बात हो गई है।  महाराष्ट्र में मूम्बई का ‘आरे‘ जंगल इसी विकास की भेंट चढ़ रहा है वहीं नागपुर में मैट्रो पार्किंग के लिए नैशनल एनवायरमैंटल इंजिनियरिंग रिसर्च इन्स्टीच्यूट (नीरी) की भूमि से 200 से अधिक वृक्ष काटने की स्वीकृति सरकार दे चुकी है जबकि यह पर्यावरण विषयों का अनुसधान केन्द्र है। गत वर्ष मध्य प्रदेश के बक्सवा जंगल काटने की स्वीकृति का लेखक सहित देशभर के पर्यावरणविदों द्वारा विरोध किया गया जहां 3 लाख से अधिक वृक्ष इसलिए काटे जा रहे हैं क्योंकि वहां नीचे हीरे हैं। हीरा जान नहीं बचा सकता जबकि वृक्ष के बिना जान बचेगी नहीं। आजकल उत्तर प्रदेश के लखनऊ का राष्ट्रीय जंगल कुकरैल सैंकंचुअरी, जो चारभोग रेलवे स्टेशन से लगभग 10 कि.मी. दूरी पर है, विस्तृत चर्चा में है क्योंकि सरकार इसे पर्यटल स्थल (नाईट सफारी) के रूप में विकसित करने जा रही है। कुकरेल जंगल 1950 के दशक में लखनऊ को सदैव स्वस्थ रखने के उद्देश्य से 5000 एकड़ में बनाया गया था जिसमें हर्बल नर्सरी, औषधीय नर्सरी, पौधों की नर्सरी सहित अनेक नर्सरिया हैं तथा पर्यावरण को प्रोत्साहित करने के लिए न्यूनतम मूल्य पर पौधे उपलब्ध कराए जाते हैं। यह प्रतिष्ठित व आकर्षक पिकनिक स्थल है जिसे 1954 में ‘‘दी रिजर्व फॉरेस्ट‘‘ नामक सर्वोच्च कानूनी सुरक्षा मान्यता प्राप्त हुई थी। इस जंगल में सैकड़ों प्रकार के फलदार, छायादार व औषधीय प्रजातियों के वृक्ष हैं। हर प्रकार की जलवायु का वन जीव समूह यहां देखा जा सकता है। 200 से अधिक स्थानीय के अलावा विदेशी पक्षी भी वसंत ऋतु में विहार करते हैं। जंगल में कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र है जहां घड़ियाल का प्रजनन व अनुसंधान केंद्र विश्व स्तरीय है। पूरे देश में ऐसे केवल 3 केंद्र हैं। इसी प्रकार मगरमच्छ व कछुआ पर भी यहां विशेष कार्य योजना चलती है। जंगल का नाम इसके बीच से बहने वाली 27 किलोमीटर लंबी कुकरेल नदी के नाम पर रखा गया था। 1970 के दशक तक कुकरेल नदी का जल औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता था। भारत में इस समय 13 सफारी हैं परंतु सभी दिन की सफारी हैं और यह प्रथम नाइट सफारी यानी रात्रि में जंगल की सैर कुकरेल जंगल में बनाई जा रही है जिसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार स्वीकृति दे चुकी है। 350 एकड़ में नाइट सफारी पार्क व डेढ़ सौ एकड़ में जूलॉजिकल (प्राणी शास्त्र संबंधी) पार्क बनेगा जिसका उद्देश्य है पर्यावरणीय पर्यटन (ईकोटूरिज्म) परंतु अब तक का अनुभव है कि पर्यटन के कारण पर्वत से लेकर समुद्र तक पर्यावरण को हानि ही हुई है और पर्यटकों ने प्रदूषण फैलाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। नाइट सफारी के कारण जंगल के जीव समूह को बहुत परेशानी होगी। वृक्ष कटेंगे जीव मरेंगे, पक्षियों का बसेरा छिनेगा और सर्वाधिक हानि होगी पर्यावारण को जो न केवल मानव के लिए बल्कि हर जीव के लिए जीवन प्रदाता है। स्थानीय लोग ही नहीं पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ता राष्ट्र भर में ऐसे कुकृत्यों का विरोध करते हैं और अनेक स्थानों पर न्यायालय तथा राष्ट्रीय हरित न्यास का द्वार खटखटाते हैं परन्तु परिणाम शुन्य। सरकार व अधिकारियों की ओर से आश्वासन दिया जाता है कि कटने वाले वृक्षों से 5-10 गुणा अधिक वृक्ष लगायेंगे। अक्ल के अन्धे वे लोग यह नहीं सोचते कि दशकों व सैंकड़ों वर्ष पूराने वृक्ष काटकर आज नया पौधा लगाकर उसकी पूर्ति कैसे हो जायेगी। दूसरे हमारा यह कटु अनुभव है कि पौधारोपण कागजों में लाखों में होता है जबकि धरातल पर हजारों में और पेड़ बनते हैं सैंकड़ों में। सम्बन्धित अधिकारियों के दोनो हाथों में लड्डु हैं।  विकास व भ्रष्ट्राचार की भेंट चढ़ रहा है जीवनदायी वृक्ष और स्पष्ट नजर आ रहा है अन्धकारमय भविष्य। यही स्थिति रही तो भावी पीढ़ी तथाकथित विकास का आनन्द लेने की बजाय आक्सीजन से भरे सिलेन्डर पीठ पर लादकर चलेंगे और जो साधन विहीन होंगे वे तड़फ तड़फ कर मर जायेंगे।  कुछ बाढ़ में बह जायेंगे, कुछ तुफान में। कुछ चक्रपात का शिकार होंगे तो कुछ बर्फबारी व भुकम्प के। देशवासियों जागो और सुरक्षित भविष्य के लिए केवल पैसे के लिए नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिए भी ध्यान दो। -रमेष गोयल, पर्यावरणविद्, जल स्टार, एडवोकेट व संस्थापक व राश्ट्रीय अध्यक्ष, पर्यावरण प्रेरणा

My message

While the world is still celebrating the beginning of a New Year, let us take a moment to contemplate on issues that are impacting our planet. While there are a multitude of concerns worthy of serious discussions, none surpasses the topic of climate change, an issue taking us towards the brink of extinction. While individual and small group efforts may seem trivial to take on this complex global phenomenon, I strongly believe it is worthwhile to tackle it, one person at a time, and one community at a time. Green habits are not just eco-friendly but also economically beneficial. Being green means being mindful of the consequences of our actions, being frugal, and making the most of our natural resources available by recycling, reusing, and rebuilding. Those who understand and effectively manage their climate and biodiversity will drive real change and help build a successful and sustainable future for all humans. After all, the expression “Little drops of water and little grains of sand, make the mighty ocean and the mighty land” still holds true and is very real. - Asma Zaidi, M.S., M.Phil., Ph.D., Professor of Biochemistry,Kansas City University of Medicine and Biosciences

(TreeTake thanks Asma for her contribution & support)

Topic of the month: Do you think cattle farms should be situated only on the outskirts and keeping cows in city areas, thus letting them roam the urban streets, should be banned? You may send your views (either in Hindi or English) in 300 words at [email protected] Please also attach a colour photo of yourself.

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