A First-Of-Its-Kind Magazine On Environment Which Is For Nature, Of Nature, By Us (RNI No.: UPBIL/2016/66220)

Support Us
   
Magazine Subcription

वास्तविकता व भ्रम के मध्य फंसा वनक्षेत्र

TreeTake is a monthly bilingual colour magazine on environment that is fully committed to serving Mother Nature with well researched, interactive and engaging articles and lots of interesting info.

वास्तविकता व भ्रम के मध्य फंसा वनक्षेत्र

हाल की रिपोर्ट ने नगरों, महानगरों की अर्बन हरियाली से लेकर चाय बागानों के पेड़ों को भी फारेस्ट कवर की संज्ञा दे दी है ...

वास्तविकता व भ्रम के मध्य फंसा वनक्षेत्र

Thinking Point

एके सिंह 
भारत सरकार ने हाल ही में अपनी नवीनतम राष्ट्रीय वन कवर रिपोर्ट जारी की है जिसमें देश के कुल वन और पेड़ कवर में मामूली वृद्धि का दावा किया गया है। हालांकि, यह भी बताया गया  है कि इसके पूर्वोत्तर क्षेत्र के जैव विविधता-समृद्ध वन २००९  के बाद से लगातार वन आवरण के नुकसान को दर्ज कर रहे हैं। हालांकि, सरकार के वन आवरण में वृद्धि के दावे को विशेषज्ञों द्वारा विवादित कहा जा रहा है। उनका स्पष्ट मानना है कि सरकार की ये रिपोर्ट त्रुटिपूर्ण है क्योंकि इसमें चाय व कॉफी के बागान, गन्ने  व रबर के प्लांटेशन्स और यहाँ तक कि सड़कों व छोटे छोटे पेड़ों के झुरमुठ को भी ट्री कवर के अंतर्गत शामिल कर लिया गया है। रिपोर्ट यह भी दावा करती है कि अगले १० वर्षों में ४५ से ६५ प्रतिशत भूमि को हरा भरा कर लिया जाएगा- यानी कि ग्रीन कवर में वृहद् वृद्धि कर ली जाएगी - ताकि जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों से निपटा जा सके। ये दूरगामी २०५० के लक्ष्य को पूर्ण करेगा। इसके अंतर्गत वो क्षेत्र जिनमे सबसे अधिक क्लाइमेट चेंज के दुष्परिणाम दिख रहे हैं, वहां पहले कार्य होगा। अब क्या और कितना जमीन पर होगा और कितने हवाई किले बनेंगे, यह तो समय ही बताएगा। अभी तो इस रिपोर्ट को ही गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है पर्यावरण विद द्वारा। स्टेट फारेस्ट रिपोर्ट (आयी इस ऍफ आर २०२१) द्विवर्षीय रिपोर्ट का दूसरा हिस्सा है पर इस बार पहले की तरह क्षेत्र के विशेषज्ञ इसे चुपचाप नहीं ले रहे बल्कि इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं। इसमें कहा गया है कि देश का 
     फारेस्ट कवर थोड़ा बढ़ा है -२२६१ वर्ग किलोमीटर हुआ है- पर ये बात जानकारों को हजम नहीं हो रही। वे रिपोर्ट कि कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं जहाँ शहरों व प्लांटेशन के पेड़ो को भी वन कवर के रूप में गिना जा रहा है। फारेस्ट कन्सेर्वटिव एक्ट १९८० के तहत ऐसे क्षेत्रों को वन कवर नहीं कहा जा सकता। ऋत्विक दत्त, पर्यावरण अधिवक्ता, के अनुसार यदि हम इस रिपोर्ट की माने तो शहरी लोग व प्लांटेशन्स पर रहने वाले लोग भी असल में वन वासी हैं। दत्त ने फारेस्ट विभाग व फारेस्ट मंत्रालय के दोगलेपन को उजागर करते हुए यह भी कहा कि जब कानून या वन संरक्षण अधिनियम १९८० कि बात आती है तो सड़कों के किनारे या पार्क में लगे पेड़ों को व प्लांटेशन्स को वन कवर नहीं माना जाता है पर जब ऐसी रिपोर्ट बनानी होती है तब इन सब तो गिन लिया जाता है। क्या ये बेईमानी नहीं ? यहाँ बता दें कि इनकी संस्था लीगल इनिशिएटिव फॉर फारेस्ट एंड एनवायरनमेंट - लाइफ - को हाल में ही २०२१ राइट लाइवलीहुड अवार्ड मिला है जो कि नोबेल प्राइज के समकक्ष है। वे कहते हैं कि आप ऐसे समझ लें कि ऐसी हरित पट्टियाँ न तो इस एक्ट के तहत आती हैं और न ही फारेस्ट डिपार्टमेंट के अधिकार क्षेत्र में। २० साल हो गए हैं पर अभी भी सरकार फारेस्ट के डिक्शनरी मीनिंग को लागू नहीं कर पायी है। इस रिपोर्ट को पढ़कर व समीक्षा कर पता चलता है कि वास्तव में हमारे वन क्षेत्र कितनी बुरी दशा में हैं। यदि सरकार ऐसे ही झोल करती रही तो कोई भी बाग जहाँ कुछ पौधे लगे हों हमारे वन क्षेत्र व ग्रीन कवर का हिस्सा बता दिया जाएगा। आप किसे बेवकूफ बना रहे हैं ?
अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नागालैंड, मिजोरम, मेघालय में सबसे अधिक क्षति हुयी है जबकि ये सबसे बड़े बायोडायवर्सिटी क्षेत्र थेः फारेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (ऍफ इस आयी) द्वारा तैयार की गयी इस रिपोर्ट को केंद्र के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने १३ जनवरी को उजागर किया। इसमें साफ कहा गया है कि प्राइवेट और कम्युनिटी की  जमीन परय रोड, रेल व कैनाल के किनारे लगाए गए व रबर, टी और कॉफी के बागान भी इस रिपोर्ट में शामिल किये गए हैं। ये रिपोर्ट रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट डाटा कि मदद से तैयार की गयी है। अब यदि हम इस रिपोर्ट को सही भी मान लें तो भी यह बात नहीं बदलेगी कि जैवविविधता से सम्पूर्ण नार्थईस्ट क्षेत्र व ट्राइबल बाहुल्य क्षेत्र बहुत तेजी से वन क्षेत्रों को खोते जा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार यहाँ का पूर्ण वन क्षेत्र १६९५२१ वर्ग किलोमीटर है जोकि २०१९ में आयी रिपोर्ट की तुलना में १०२१ वर्ग किलोमीटर कम हो गया है। हमने यहाँ पिछली रिपोर्ट आने के समय ही कहा था कि नार्थईस्ट रीजन लगातार अपना वनक्षेत्र खोता जा रहा है और २००९ और २०१९ के बीच में इसने लगभग ३१९९ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र खो ही दिया है। यह एक चिंताजनक बात है। भारत का नार्थ ईस्ट क्षेत्र- अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम- दुनिया के  १७ बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट्स में आता है। इस पूरे रीजन का क्षेत्रफल देश के ७.९८ प्रतिशत हिस्से मात्र है पर यह देश के २५ प्रतिशत वनक्षेत्र को समाये हुए है।
नवीनतम रिपोर्ट में कहा गया है कि देश का कुल वन और पेड़ कवर ८०९,५३७ वर्ग किमी (भौगोलिक क्षेत्र का २४.६२ प्रतिशत) है, जो २०१९ संस्करण की तुलना में २ २६१ वर्ग किमी (0.२८  प्रतिशत) की वृद्धि दर्शाता है। नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, वन क्षेत्र में वृद्धि १,५४० वर्ग किमी है और पेड़ों के आवरण में यह ७२१  वर्ग किमी है।इसमें कहा गया है कि वन क्षेत्र में वृद्धि के मामले में शीर्ष पांच राज्य आंध्र प्रदेश (६४७ वर्ग किमी), तेलंगाना (६३२ वर्ग किमी), ओडिशा (५३७ वर्ग किमी), कर्नाटक (१५५ वर्ग किमी) और झारखंड (११० वर्ग किमी) हैं, जबकि वन क्षेत्र में एक बड़ा नुकसान दिखाने वाले शीर्ष पांच राज्य पांच पूर्वोत्तर राज्य हैं - अरुणाचल प्रदेश (२५७ वर्ग किमी)। मणिपुर (२४९ वर्ग किमी), नागालैंड (२३५ वर्ग किमी), मिजोरम (१८६ वर्ग किमी) और मेघालय (७३ वर्ग किमी)।इसने देश के १४० पहाड़ी जिलों में ९०२ वर्ग किमी की कमी पर भी प्रकाश डाला है।
सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के एक पर्यावरण शोधकर्ता कांची कोहली के अनुसार ये रिपोर्टें जितना खुलासा करती हैं उससे कहीं अधिक छिपाती हैं। वन कि असली स्थिति समझने के लिए यह जरूरी है कि हम न केवल वास्तविक वन क्षेत्र कि गड़ना करें बल्कि यह भी स्वीकारें कि हमारे वन क्षेत्र कि स्थिति दयनीय है। इस ताजा गरणा से न तो हमें वास्तविक वन क्षेत्र का अनुमान लगता है, और न ही उसके गुणवत्ता का। जंगल की सोशल लाइफ इस रिपोर्ट का हिस्सा कभी होनी ही नहीं चाहिए बल्कि हमें तो यह जानना होगा कि कैसे जो वास्तविक वन क्षेत्र हैं, उनके पेड़ भयानक रूप से कम हो रहे हैं जबकि जिन पेड़ों को ये गिन कर बैठे हैं वो तो फलों से लदे ऑर्चर्ड या बागानों के पेड़ हैं जो कि हार्वेस्ट कर दिए जायेंगे। अब ऐसे में इनको गिनने का क्या लाभ? यहाँ तक कि इनवेसिव प्रजाति के पेड़ भी गिन लिए गए है जो कि हास्यास्पद है, वे कहते हैं।
फारेस्ट कवर रिपोर्ट पर इतना बवाल आखिर क्यों हैः राज भगत, रिमोट सेंसिंग एक्सपर्ट, के अनुसार जिस तरह से इसमें फारेस्ट कवर की गरणा की गयी है, वे क्षेत्र वास्तव में दूर दूर तक फारेस्ट कवर होंगे ही नहीं। रिमोट सेंसिंग टेकनोलोजी के द्वारा शहरी इलाकों में लगे पेड़ भी काउंट हो जाते हैं जोकि सही नहीं है। सड़क किनारे लगे पेड़ या फिर पेड़ों का झुरमुठ ही क्यों न हो, उन्हें वन क्षेत्र या फारेस्ट कवर की संज्ञा नहीं दे सकते। मेरे लिए फारेस्ट कवर उसके ईको सिस्टम पर आधारित होना चाहिए ना की पेड़ों कि संख्या पर। इसलिए आवश्यक है कि रिमोट सेंसिंग और जमीनी छानबीन में संतुलन बना रहे, वे कहते हैं। इसीलिए भगत ने रिपोर्ट आते ही कई इमेजेज ट्वीट कीं जिनमें दिल्ली के शहरी इलाके का गूगल मैप भी था जिसमें वहां के सभी पेड़ गिन लिए गए थे। उन्होंने ट्वीट कर कहा था कि देखो कैसे नई दिल्ली के कुछ इलाकों व बड़े सरकारी भूखंडों में लगे अधिकांश पेड़ों को मध्यम घने और खुले जंगल घोषित कर दिया गया है। ये इलाके वो हैं जहाँ अधिकांश वीआईपीज व मिनिस्टर रहते हैं, जैसे ल्यूटेन रोड। भगत कहते हैं कि रिमोट सेंसिंग का इस्तेमाल होना चाहिए पर ऐसा नहीं कि केवल इसी पर निर्भर हो जाएँ। ग्राउंड वर्क का बहुत अधिक महत्व होता है और उसे अनदेखा नहीं करना चाहिए। होना यह चाहिए कि एक बार रिमोट सेंसिंग से इमेजेज उठा लीं उसके बाद सरकार द्वारा गठित दलों को उन सभी क्षेत्रों में जाना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि क्या वास्तव में वे वन क्षेत्र हैं न कि स्कूल, पार्क में लगे पेड़ या टी, कॉफी प्लांटेशन्स। गलती तब होती है जब अपनी सुविधा और अचीवमेंट्स दिखाने के लिए बस रिमोट सेंसिंग को आधार बना कर रिपोर्ट तैयार कर दी जाए, जैसा कि इस रिपोर्ट में हुआ है।
रिपोर्ट में तो सात महानगरों के वन क्षेत्र की गरणा का भी दावा किया गया है। इनमें आते हैं दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, अहमदाबाद, चेन्नई, कोलकता, जिनमें कहा जा रहा है कि फारेस्ट कवर ५०६.७२ स्क्वायर किलोमीटर है जोकि इनके १०.२१ प्रतिशत क्षेत्रफल के बराबर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जहाँ हैदराबाद (४८.६६ वर्ग किमी) और दिल्ली (१९.९१ वर्ग किमी) में वन क्षेत्र में वृद्धि हुई है, वहीं अहमदाबाद और बेंगलुरु ने क्रमशः ८.५५ वर्ग किमी और  ४.९८  वर्ग किमी के वन क्षेत्र को खो दिया है। इस रिपोर्ट ने दशक की ग्रोथ रिकॉर्ड कर दावा किया है कि पिछले १० वर्षों में वन क्षेत्र ६८ स्क्वायर किलोमीटर बढ़ गया है। यह दावा बहुत विचित्र है क्योंकि इन सभी महानगरों कि जनसँख्या लगातार बढ़ती रही है और जमीन व जनसंसाधनों की भी। शहरी क्षेत्रों का विस्तार हो रहा है, ऐसेमें वन क्षेत्र इतना बढ़ गया?
इकोलोजिस्ट (पारिस्थितिकीविद) एमडी मधुसूदन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर पर आईएसएफआर २०२१ की  विसंगतियों पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी की है  उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला है कि कैसे भारत के शहरों में घनी आबादी वाले क्षेत्रों और नारियल के पेड़ों के तहत आने वाले क्षेत्रों को वन क्षेत्र के तहत क्षेत्रों के रूप में वर्गीकृत किया गया है। वे कहते हैं कि रिपोर्ट के दावों के विपरीत ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जो यह दर्शाये कि भारत के नेचुरल  फॉरेस्ट्स बढ़े हैं और रिपोर्ट के आंकलन को सही दर्शाये। सही तो यह है कि वन क्षेत्र घटा ही है। यह सब बस ऍफएसआयी की आंतरिक गड़बड़ियों और कार्यप्रणाली को ही दिखाता है। इन्होनें तो वनक्षेत्र की परिभाषा ही बदल डाली है। मधुसूदन ने तो यहां तक कहा है कि इसप्रकार भ्रमित कर के सरकार वास्तविक वनक्षेत्र को एनर्जी, इंफ्रास्ट्रक्चर और इंडस्ट्री के प्रोजेक्ट्स में इस्तेमाल करना चाहती है। यदि ऐसा लगे कि फारेस्ट कवर बढ़ रहा है तो कोई जंगलों के बढ़ते डायवर्सन के खिलाफ क्यों होगा? उन्होंने ट्वीट किया कि बढ़ते वन क्षेत्र वैश्विक कार्बन व्यापार में उज्ज्वल संभावनाएं भी प्रदान करते हैं, जहां वन आवरण बढ़ाने वाले देश पैसे के लिए अन्य देशों के उत्सर्जन को ऑफसेट करके अपने कार्बन लाभ का व्यापार कर सकते हैं।
कांची कोहली के अनुसार आईएसएफआर २०२१ में संख्याओं का ढेर केवल घरेलू नीति और अंतरराष्ट्रीय जलवायु ऑफसेट लक्ष्यों को पूरा करने का एक प्रयास है। उपग्रह रडार पर वन कवर के रूप में बीप करने वाली कोई भी चीज रिपोर्ट के उद्देश्यों को संतुष्ट करती है। केंद्र और राज्य सरकारें निवेश समझौतों के बदले में जंगलों को लावारिस छोड़ने के लिए तैयार हैं। वहीं वन अधिकारों के रिकॉर्ड वन संरक्षण और वन अधिकारों की अत्यधिक दुर्बल स्थिति को झिपाने का एक प्रयास प्रतीत होते हैं।
२०५० तक भारत का पूरा फारेस्ट कवर क्लाइमेट चेंज हॉटस्पॉट बन सकता हैः इस रिपोर्ट ने २०३०, २०५० और २०८५ के लिए तापमान और वर्षा डेटा के कंप्यूटर मॉडल-आधारित प्रक्षेपण का उपयोग करके भारतीय जंगलों में जलवायु परिवर्तन हॉटस्पॉट का मानचित्रण भी किया है। यहां जलवायु हॉटस्पॉट मुख्य रूप से उन जंगलों को संदर्भित करते हैं जो जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होंगे और तापमान और वर्षा में परिवर्तन का अनुभव करेंगे।इसमें कहा गया है कि २०३० तक भारत के लगभग ४५-६४ प्रतिशत वन क्षेत्र जलवायु हॉटस्पॉट के तहत आएंगे, जबकि २०५० तक देश के पूरे वन क्षेत्र को अलग-अलग गंभीरता के साथ जलवायु परिवर्तन हॉटस्पॉट के तहत कवर हो जाने का अनुमान है। २०८५ तक भारत के २० प्रतिशत वन क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभाव के कारण विनाशकारी परिवर्तनों का अनुभव कर सकते हैं। जिन क्षेत्रों में विनाशकारी प्रभाव पड़ने की संभावना हैं, उनमें जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पूर्वोत्तर राज्यों जैसे असम, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा और मध्य भारत और गुजरात के कुछ हिस्से शामिल हैं। रिपोर्ट में भारत के बाघ रिजर्वों और गलियारों और शेर संरक्षण क्षेत्र में वन क्षेत्र का भी आकलन किया गया है। 
इसमें कहा गया है कि बाघ रिजर्व लगभग ७४,७१० वर्ग किमी (भारत के क्षेत्र का लगभग २.२७ प्रतिशत) पर हैं और आकलन से पता चलता है कि बाघ रिजर्व में वन क्षेत्र ५५,६६६ वर्ग किमी है, जो बाघ रिजर्व के कुल क्षेत्र का लगभग ७४.५१ प्रतिशत और भारत के कुल वन क्षेत्र का ७.८ प्रतिशत है। इन बाघ रिजर्वों में वन क्षेत्र का दशकीय मूल्यांकन किया गया है जिसके अनुसार पिछले एक दशक के दौरान २० बाघ रिजर्वों के वन क्षेत्र में लाभ व ३२ बाघ रिजर्वों के वन क्षेत्र में नुकसान दर्ज किया है। शेर रिजर्व्स में पिछले एक दशक में ३३.४३ वर्ग किमी वन क्षेत्र की कमी देखी गई है ऋत्विक दत्ता ने सवाल किया कि जब भारत सरकार यह दावा कर सकती है कि उन्होंने भारत में मौजूद अधिकांश बाघों की तस्वीर खींची है, तो वन रिपोर्ट के लिए संपूर्ण जमीनी सच्चाई क्यों नहीं ली जा सकती है? कुछ बाघ रिजर्वों और शेरों के आवास में वन और पेड़ों के आवरण में वृद्धि पूरी तरह से अच्छी खबर नहीं कही जा सकती है। यह गलत प्राथमिकताओं का मामला है। यदि हम इस तरह का अभ्यास करना चाहते हैं, तो हमें हाथी निवास और गलियारों में वन क्षेत्र के नुकसान का आकलन करना चाहिए क्योंकि हम नियमित रूप से उनके निवास स्थान को दूर करने वाली परियोजनाओं के कारण मानव-हाथी संघर्ष को बढ़ते हुए देखते आ रहे हैं, दत्ता कहते हैं। बात इतनी सी है कि यह रिपोर्ट किसी के भी गले नहीं उतर रही। सरकार को अगली बार सही और सही तरीके से आंकलन करवाना चाहिए नहीं तो कब हम अपनी प्राकृतिक धरोहर खो बैठेंगे हमें पता ही नहीं चलेगा।


 

Leave a comment