Specialist’s Corner
प्रशान्त कुमार वर्तमान में उत्तराखण्ड वन विभाग में वरिष्ठ परियोजना सहयोगी (वन्यजीव) के पद पर कार्यरत हैं तथा पिछले सात वर्षों से वन्यजीव अपराध नियंत्रण एवं संरक्षण में प्रभावी शोध एवं विश्लेषण कार्य कर रहे है। इन्होंने लगभग पन्द्रह हजार से अधिक वन कर्मियों को वन्यजीव फॉरेंसिक एवं वन्यजीव संरक्षण विषय में प्रशिक्षित किया है तथा पांच सौ से अधिक प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन भी किया है। प्रशान्त कुमार, फॉरेंसिक विज्ञान में बीएससी तथा एमएससी है एवं वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक्स में फील्ड के अनुभवी हैं।
टैक्सिडर्मी एक ऐसी वैज्ञानिक और कलात्मक प्रक्रिया है, जिसमें किसी मृत पशु की त्वचा, बाल, सींग, दाँत तथा शरीर के अन्य बाहरी भागों को वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित करके उसके प्राकृतिक आकार और स्वरूप में प्रदर्शित करने योग्य नमूना तैयार किया जाता है। टैक्सिडर्मी का उपयोग मुख्य रूप से संग्रहालयों, शैक्षणिक संस्थानों, अनुसंधान केंद्रों और वन्यजीव अध्ययन में किया जाता है। भारत में बाघ और तेंदुए जैसे संरक्षित वन्यजीवों की टैक्सिडर्मी सामान्य पशुओं की टैक्सिडर्मी से बिल्कुल अलग और अत्यंत संवेदनशील विषय है, क्योंकि इनके शरीर के अंगों और खाल का अवैध व्यापार वन्यजीव अपराध से जुड़ा हो सकता है। इसलिए बाघ और तेंदुए की टैक्सिडर्मी केवल तकनीकी विषय नहीं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण, कानून, फॉरेंसिक विज्ञान और जैव-विविधता से भी जुड़ी हुई है।
टैक्सिडर्मी क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?
टैक्सिडर्मी का मुख्य उद्देश्य किसी पशु के प्राकृतिक रूप, आकार और बाहरी विशेषताओं को लंबे समय तक सुरक्षित रखना है, ताकि उसका उपयोग शिक्षा, अनुसंधान, संग्रहालय प्रदर्शन और वैज्ञानिक अध्ययन में किया जा सके। किसी पशु की टैक्सिडर्मी करते समय केवल उसकी त्वचा को सुरक्षित रखना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि शरीर की संरचना, सिर की बनावट, चेहरे की आकृति, कान, आँखों की स्थिति, पंजे, पूँछ और शरीर के अनुपात को भी ध्यान में रखा जाता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से तैयार किया गया नमूना उस पशु के वास्तविक शरीर का वैज्ञानिक रूप से तैयार किया गया प्रतिनिधित्व होता है। टैक्सिडर्मी का महत्व विशेष रूप से उन पशुओं के अध्ययन में अधिक है जिन्हें सामान्य परिस्थितियों में नजदीक से देखना कठिन होता है। उदाहरण के लिए, किसी संग्रहालय में रखा हुआ बाघ का संरक्षित नमूना विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को उसके शरीर की बनावट, आकार और बाहरी विशेषताओं को समझने में सहायता कर सकता है।
बाघ की टैक्सिडर्मी कैसे तैयार की जाती है?
बाघ की टैक्सिडर्मी एक विशेषज्ञतापूर्ण प्रक्रिया है। सबसे पहले यह सुनिश्चित करना आवश्यक होता है कि मृत बाघ का स्रोत और उसकी कानूनी स्थिति स्पष्ट हो। यदि किसी बाघ की मृत्यु प्राकृतिक कारणों, बीमारी, दुर्घटना या किसी अन्य कारण से हुई है, तो संबंधित वन विभाग द्वारा उसकी जांच की जाती है। मृत्यु के कारण की पुष्टि और आवश्यक कानूनी कार्रवाई के बाद ही आगे की प्रक्रिया की जा सकती है। टैक्सिडर्मी की वैज्ञानिक प्रक्रिया में शरीर से त्वचा को सावधानीपूर्वक अलग करना, उसे संरक्षित करना और उसके लिए उपयुक्त आंतरिक ढाँचा तैयार करना शामिल होता है। इसके बाद संरक्षित त्वचा को इस प्रकार लगाया जाता है कि बाघ का शरीर प्राकृतिक दिखाई दे। बाघ के चेहरे और सिर को विशेष महत्व दिया जाता है, क्योंकि चेहरे की बनावट, कान, आँखों की स्थिति तथा धारियों का पैटर्न उसकी पहचान में महत्वपूर्ण हो सकता है। हालाँकि, भारत में किसी जंगली बाघ की खाल या उसके शरीर के हिस्सों से निजी स्तर पर टैक्सिडर्मी करना सामान्य व्यवसाय नहीं है। बाघ संरक्षित वन्यजीव है और उससे प्राप्त खाल, ट्रॉफी या अन्य भागों के संबंध में वन्यजीव संरक्षण कानून के प्रावधान लागू होते हैं।
तेंदुए की टैक्सिडर्मी कैसे की जाती है?
तेंदुए की टैक्सिडर्मी का वैज्ञानिक आधार बाघ की टैक्सिडर्मी के समान है, लेकिन दोनों पशुओं की शारीरिक बनावट अलग होने के कारण उनके नमूने का आकार और रूप भी अलग होता है। तेंदुए की सबसे प्रमुख पहचान उसके शरीर पर दिखाई देने वाले रोसेट, अर्थात फूल जैसी आकृति वाले धब्बे हैं। तेंदुए की खाल को संरक्षित करते समय उसके प्राकृतिक धब्बों और शरीर के अनुपात को सही रूप में बनाए रखना आवश्यक होता है। यही धब्बे और पैटर्न कई बार फॉरेंसिक जांच में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। किसी संदिग्ध तेंदुए की खाल या टैक्सिडर्मी नमूने को केवल देखने से असली नहीं माना जा सकता। आवश्यकता पड़ने पर उसकी वैज्ञानिक जांच की जाती है।
बाघ और तेंदुए की टैक्सिडर्मी कहाँ बनाई जाती है?
भारत में बाघ और तेंदुए जैसे संरक्षित वन्यजीवों की टैक्सिडर्मी केवल वैध और अधिकृत परिस्थितियों में ही की जा सकती है। इसके लिए वन्यजीव संरक्षण कानून तथा संबंधित नियम लागू होते हैं। वर्ष 2024 में वन्यजीवों के लेन-देन और टैक्सिडर्मी से संबंधित नए नियम लागू किए गए हैं। इसलिए यदि जंगल में किसी व्यक्ति को मृत बाघ या तेंदुआ मिलता है, तो उसे स्वयं उठाकर घर ले जाना या किसी कारीगर से उसकी टैक्सिडर्मी करवाना उचित नहीं है। ऐसी स्थिति में संबंधित वन विभाग को सूचना देना आवश्यक होता है। वन विभाग यह जांच करता है कि पशु की मृत्यु किस कारण हुई और क्या वह मामला प्राकृतिक मृत्यु का है या वन्यजीव अपराध से संबंधित है।
टैक्सिडर्मी का वन्यजीव संरक्षण में महत्व
टैक्सिडर्मी का सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपयोग शिक्षा और संरक्षण के क्षेत्र में है। संग्रहालयों में रखे गए संरक्षित पशु नमूने विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और आम लोगों को वन्यजीवों की शारीरिक संरचना और जैव-विविधता समझने में सहायता करते हैं। कई पुराने संग्रहालय नमूनों का महत्व समय के साथ और बढ़ सकता है, क्योंकि भविष्य में वैज्ञानिक नई तकनीकों की सहायता से उन नमूनों से आनुवंशिक या अन्य वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार टैक्सिडर्मी केवल किसी मृत पशु को प्रदर्शित करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह भविष्य के वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए भी उपयोगी हो सकती है।
टैक्सिडर्मी और वन्यजीव फॉरेंसिक का संबंध
वन्यजीव फॉरेंसिक विज्ञान वह क्षेत्र है जिसमें वन्यजीव अपराधों से संबंधित वैज्ञानिक साक्ष्यों की जांच की जाती है। यदि किसी मामले में बाघ या तेंदुए की खाल, बाल, हड्डियाँ, पंजे, दाँत या अन्य शरीर के अंग बरामद होते हैं, तो वैज्ञानिक जांच के माध्यम से यह पता लगाया जा सकता है कि वह सामग्री किस प्रजाति से संबंधित है। इस जांच में बाहरी बनावट, बालों की संरचना, त्वचा की विशेषताएँ, धब्बों या धारियों का पैटर्न तथा आवश्यकता पड़ने पर आनुवंशिक परीक्षण किया जा सकता है। भारत में भारतीय वन्यजीव संस्थान के वन्यजीव फॉरेंसिक और संरक्षण आनुवंशिकी केंद्र द्वारा वन्यजीव अपराधों से संबंधित नमूनों की वैज्ञानिक जांच की जाती है।
टैक्सिडर्मी और वन्यजीव फॉरेंसिक में करियर
इस क्षेत्र में रुचि रखने वाले विद्यार्थी प्राणी विज्ञान, वन्यजीव विज्ञान, जैव-प्रौद्योगिकी, आणविक जीव विज्ञान, फॉरेंसिक विज्ञान और संरक्षण जीव विज्ञान जैसे विषयों का अध्ययन कर सकते हैं। आगे चलकर संग्रहालयों, अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों, वन्यजीव संरक्षण संस्थानों, फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं और सरकारी वन्यजीव विभागों में काम करने के अवसर मिल सकते हैं। हालाँकि टैक्सिडर्मी विशेषज्ञ और वन्यजीव फॉरेंसिक वैज्ञानिक की भूमिकाएँ अलग-अलग होती हैं। टैक्सिडर्मी में नमूने का वैज्ञानिक संरक्षण और प्रस्तुतीकरण महत्वपूर्ण है, जबकि फॉरेंसिक विज्ञान में नमूने की पहचान, अपराध से संबंध और वैज्ञानिक साक्ष्य का परीक्षण अधिक महत्वपूर्ण होता है।
बाघ या तेंदुए की टैक्सिडर्मी कौन रख सकता है?
भारत में कोई व्यक्ति केवल अपनी इच्छा से बाघ या तेंदुए की खाल या टैक्सिडर्मी नमूना नहीं रख सकता। इन प्रजातियों से संबंधित ट्रॉफी और शरीर के अंगों पर वन्यजीव संरक्षण कानून लागू होता है। कुछ विशेष कानूनी परिस्थितियों में पुराने या वैध रूप से प्राप्त नमूनों के संबंध में स्वामित्व प्रमाण-पत्र तथा अन्य दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति के पास पुरानी बाघ या तेंदुए की ट्रॉफी होने मात्र से यह नहीं माना जा सकता कि उसका कब्जा स्वतः वैध है। यदि किसी परिवार के पास कई वर्षों पुरानी ऐसी ट्रॉफी मौजूद है, तो उसके स्रोत, पुराने दस्तावेज, स्वामित्व की स्थिति और संबंधित वन विभाग के अभिलेखों की जांच आवश्यक हो सकती है। वन्यजीव से संबंधित टैक्सिडर्मी और ट्रॉफी के मामलों में राज्य के वन विभाग तथा वन्यजीव शाखा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कई मामलों में मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक या उनके द्वारा अधिकृत अधिकारी से अनुमति की आवश्यकता हो सकती है।
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