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डॉ. मोनिका रघुवंशी
लेखिका, पत्रकार एवम् सामाजिक कार्यकर्ता, राष्ट्रीय समन्वयक (एन.वाई.पी.बी.), डॉक्टरेट ऑफ फिलॉसफी (ग्रीन मार्केटिंग), एम.बी.ए.(ट्रिपल विशेषज्ञता- मार्केटिंग, फाइनेंस व बैंकिंग), प्रमाणित कंप्यूटर, फ्रेंच और उपभोक्ता संरक्षण कोर्स प्राप्त, 750 प्रमाणित अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कार्यक्रमों में भाग लिया, 75 अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पत्रिका लेख प्रकाशित, राष्ट्रीय समाचार पत्रों में सक्रिय लेखक (750 लेख प्रकाशित), 20 राष्ट्रीय पुरस्कार, 200 ऑनलाइन और ऑफलाइन एन.जी.ओ. कार्यक्रम आयोजक।
स्वास्थ्य पर जानलेवा प्रभाव
आधुनिक समाज में ध्वनि प्रदूषण अब केवल एक शहरी अव्यवस्था या असुविधा नहीं रहा, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य और जीवन सुरक्षा के लिए एक गंभीर, अदृश्य संकट बन चुका है। तेज़ी से होते शहरीकरण, औद्योगिक फैलाव, यातायात के दबाव और सार्वजनिक आयोजनों में उच्च-ध्वनि उपकरणों के अत्यधिक प्रयोग ने नागरिकों के शांतिपूर्ण जीवन जीने के अधिकार पर गहरा आघात किया है। हाल के वर्षों में भारत में अत्यधिक शोर के कारण न केवल लोगों की श्रवण शक्ति प्रभावित हुई है, बल्कि अचानक हृदयघात (कार्डियक अरेस्ट), अत्यधिक मानसिक तनाव और असमय मौतों जैसी भयावह घटनाएं भी सामने आई हैं।
"मौन और शांति ही आत्मा की सबसे मजबूत आवाज है। शोर में ईश्वर की आवाज नहीं सुनी जा सकती।"— महात्मा गांधी
हालिया घटनाएं और चिंताजनक आंकड़े
देशभर में विभिन्न मांगलिक आयोजनों, उत्सवों और सांस्कृतिक यात्राओं के दौरान इस्तेमाल होने वाले उच्च-क्षमता वाले साउंड सिस्टम्स और डीजे के घातक परिणाम सामने आ रहे हैं। वर्ष 2026 में मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में एक आयोजन के दौरान 105 से 115 डेसिबल dB से अधिक तीव्रता के संगीत और उसके तीव्र कंपनों के प्रभाव में आने से एक 7 वर्षीय छात्र की अचानक तबीयत बिगड़ी और अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसने दम तोड़ दिया। इस घटना पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य प्रशासन को निर्देश दिए कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मिले जीवन और स्वास्थ्य सुरक्षा के अधिकार को अक्षुण्य रखा जाए तथा डीजे के व्यावसायिक व अनियंत्रित संचालन पर कड़ी पाबंदी लगाई जाए।
इसी प्रकार महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में भी धार्मिक व सामाजिक जुलूसों में अत्यधिक तेज साउंड एम्पलीफायरों के कारण वृद्धों तथा हृदय रोगियों में अचानक 'सडन कार्डियक अरेस्ट' के मामले देखे गए हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट में प्रस्तुत चिकित्सा याचिकाओं के अनुसार, 100 dB से अधिक का शोर मानव शरीर में 'एड्रेनालिन' और 'कोर्टिसोल' जैसे तनाव पैदा करने वाले हार्मोन्स का स्तर तेजी से बढ़ा देता है, जिससे रक्तचाप अचानक अनियंत्रित हो जाता है और हृदय गति रुकने का खतरा बढ़ जाता है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के मानकों के अनुसार: आवासीय क्षेत्र में दिन में अधिकतम 55 dB तथा रात में 45 dB की सीमा तय है। व्यावसायिक क्षेत्र में दिन में 65 dB तथा रात में 55 dB सुरक्षित सीमा है।
इसके विपरीत, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड CPCB के राष्ट्रीय ध्वनि निगरानी नेटवर्क की रिपोर्ट दर्शाती है कि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे प्रमुख महानगरों में दिन-रात का औसतन ध्वनि स्तर 75 से 90 dB के बीच बना रहता है। दिल्ली के व्यस्त चौराहों जैसे आईटीओ और आनंद विहार में वाहनों की लगातार हॉर्निंग और भारी यातायात के कारण यह स्तर 85 से 95 dB तक दर्ज किया जाता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, 85 dB से अधिक के शोर में रोजाना 8 घंटे या उससे अधिक समय व्यतीत करने पर स्थायी बहरेपन का जोखिम रहता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) तथा भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के अध्ययनों के मुताबिक, भारत में करीब 6.3 करोड़ लोग, कुल जनसंख्या का लगभग 6.3% किसी न किसी स्तर के बहरेपन या सुनने की गंभीर समस्या से पीड़ित हैं। इसके अलावा, व्यस्त राजमार्गों, निर्माण स्थलों और कारखानों के आसपास रहने या काम करने वाले लगभग 49% से 53% लोग कानों में लगातार सीटी जैसी आवाज (टिनिटस), क्रोनिक अनिद्रा, अवसाद और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
"किसी व्यक्ति की बुद्धिमत्ता और विचारशीलता को मापने का सबसे सटीक पैमाना यह है कि वह शोर को कितना नापसंद करता है।"— आर्थर शोपेनहावर
समस्या के मुख्य सामाजिक, तकनीकी व प्रशासनिक कारण
ध्वनि प्रदूषण के इस चरम स्तर तक पहुंचने के पीछे कई जटिल कारण मौजूद हैं: अत्यधिक हॉर्निंग और अनियंत्रित यातायात, सड़कों पर वाहनों की संख्या में प्रतिवर्ष लगभग 8% से 10% की वृद्धि हो रही है। वाहन चालकों में अनावश्यक हॉर्न बजाने की प्रवृत्ति और दोपहिया वाहनों में अवैध मॉडिफाइड साइलेंसर या प्रेशर हॉर्न का प्रयोग ध्वनि स्तर को 100 dB के पार ले जाता है।
समारोहों में साउंड एम्पलीफायरों का अत्यधिक उपयोग, विवाह, धार्मिक आयोजनों और राजनीतिक रैलियों में 5,000 से 10,000 वाट तक के भारी साउंड सिस्टम का बेधड़क प्रयोग किया जाता है। अक्सर आयोजक रात्रि 10 बजे के बाद लाउडस्पीकर न बजाने संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अनदेखी करते हैं।
अव्यवस्थित शहरी नियोजन व निर्माण कार्य: घनी आबादी वाले आवासीय क्षेत्रों के समीप बिना ध्वनि-रोधी सुरक्षा दीवारों के मेट्रो, ओवरब्रिज और बहुमंजिला इमारतों का निर्माण चौबीसों घंटे जारी रहता है, जो निवासियों के लिए निरंतर मानसिक तनाव का कारण बनता है।
रिहायशी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियां: कई शहरों में आबादी वाले क्षेत्रों के अंदर छोटी औद्योगिक इकाइयां, जनरेटर सेट और मेटल कटिंग वर्कशॉप का संचालन बिना किसी ध्वनि-नियंत्रण उपाय के किया जाता है।
कानूनी क्रियान्वयन में शिथिलता: यद्यपि 'ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण और नियमन नियम, 2000' अस्तित्व में हैं, किंतु पर्याप्त निगरानी उपकरणों जैसे साउंड लेवल मीटर की कमी और प्रशासनिक कड़ाई न होने के कारण इन नियमों का प्रभावी अनुपालन नहीं हो पाता।
"शांति की अपनी एक सुंदरता और संगीत होता है; जो मनुष्य शोर से दूर रहता है, वही जीवन के वास्तविक अर्थ को समझ पाता है।"— हेनरी डेविड थोरो
रोकथाम के व्यावहारिक उपाय एवं भावी दिशा
इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए कड़े प्रशासनिक फैसलों, तकनीकी नवाचारों और सामाजिक सहभागिता की आवश्यकता है:
सख्त कानूनी प्रवर्तन:पुलिस और पर्यावरण तंत्र को अत्याधुनिक डिजिटल साउंड मीटर प्रदान किए जाएं। नियमों के उल्लंघन पर केवल नाममात्र का जुर्माना लगाने के बजाय उपकरण ज़ब्त किए जाएं और ₹50,000 से ₹1,000,000 तक का भारी दंड लगाया जाए। बार-बार उल्लंघन करने वालों पर गंभीर कानूनी धाराओं के तहत कार्रवाई हो।
तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर: अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और न्यायालयों के 100 मीटर के दायरे में 'नो हॉर्निंग ज़ोन' के नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए। सड़कों पर स्वचालित नॉइज़ डिटेक्शन कैमरे स्थापित किए जाएं ताकि सीमा से अधिक शोर करने वाले वाहनों का स्वतः चालान हो सके।
पर्यावरणीय और शहरी नियोजन: नए हाईवे और रिहायशी कॉलोनियों के बीच नीम, अशोक, बरगद और पीपल जैसे घने पेड़ों की 'ग्रीन बेल्ट' विकसित की जानी चाहिए, जो प्राकृतिक ध्वनि अवशोषक के रूप में ध्वनि स्तर को 10 से 15 dB तक कम करने में सहायक होते हैं।
"हमें शांति खोजने की जरूरत है। शांति और मौन में ही हम भगवान को सुन सकते हैं, शोर में नहीं।"— मदर टेरेसा
जन-जागरूकता और इको-फ्रेंडली जीवनशैली
तकनीक और कानून के साथ-साथ सामाजिक सोच में बदलाव सबसे महत्वपूर्ण कदम है। शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से यह संदेश व्यापक स्तर पर पहुंचाना होगा कि तेज आवाज में संगीत बजाना या गाड़ियों के हॉर्न बजाना किसी उत्सव या शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अन्य नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। हमें 'साइलेंट' और 'ईको-फ्रेंडली' उत्सवों की संस्कृति को अपनाना होगा।
ध्वनि प्रदूषण केवल सुनने में होने वाली असुविधा का मामला नहीं है, यह हर नागरिक के जीवन और स्वास्थ्य सुरक्षा से सीधा जुड़ा विषय है। जब तक समाज और शासन मिलकर इस दिशा में जिम्मेदार कदम नहीं उठाएंगे, तब तक निर्दोष जिंदगियों का यह अदृश्य नुकसान जारी रहेगा।
"जब आपका मन शांत होता है, तब जीवन सहज हो जाता है। बाहर का शोर आपके अंदर तब तक नहीं घुस सकता जब तक आप खुद उसे अनुमति न दें।"— सद्गुरु
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