A First-Of-Its-Kind Magazine On Environment Which Is For Nature, Of Nature, By Us (RNI No.: UPBIL/2016/66220)

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Importance of green spaces cannot be overstated

TreeTake is a monthly bilingual colour magazine on environment that is fully committed to serving Mother Nature with well researched, interactive and engaging articles and lots of interesting info.

Importance of green spaces cannot be overstated

10% भूखंड पर पेड़ पौधों के लिए स्थान दिया जाना चाहिए एवं कॉलोनी के निर्माण के समय पर्याप्त पार्क स्थान एवं प्रत्येक घर के सामने एक हरित स्थान इसमें पेड़ पौधे लगाने आवश्यक हो छोड़ा जाना चाहिए । प्रत्येक मकान के सामने 5 फीट स्थान खुला होना चाहिए जिसमें प्रत्येक 10 फीट पर एक वृक्ष अनिवार्य हो ..

Importance of green spaces cannot be overstated


We Asked: Do you think the government must penalize those who do not leave a green space outside their homes, especially in colonies that necessitate it? Also housing societies must be made to ensure a green cover on their premises via a GO? Even slums should be greenified by the authorities?

The selection of the topic of this month is indeed commendable.  In both urban and rural environments, the importance of green spaces cannot be overstated. Urban environments are traditionally known for their high population density and extensive infrastructure, designed to accommodate modern necessities like transportation and commercial structures. However, these urban areas now confront mounting challenges stemming from population growth, finite resources, and the escalating impacts of climate change. An important criterion for assessing progress towards Sustainable Development Goal 11 (SDG 11) pertains to the availability of public and green spaces within cities. Despite the recommended minimum benchmark of 45% (comprising 30% for streets and 15% for green spaces), most cities fall short of this target. On average, a mere 15% of urban land is allocated to streets, even in meticulously planned new urban developments. In areas lacking proper planning, this figure plummets to a mere 2%. This scarcity of natural spaces contributes to an unfavorable urban living environment. The government should take action regarding those who do not allocate green spaces outside their homes. However, it is essential to establish a minimum standard plot size that mandates a specific area for green spaces. In cities, individuals residing in homes as small as 30 or 50 sq.m. often lack the space for planting, and on narrow streets, planting trees becomes impractical. For new colonies, the government must make it mandatory to rigorously adhere to the "Model Building Bye-law 2016". This legislation aligns with the National Sustainable Habitat Mission and encourages the augmentation of green cover within the city or plot. It includes the following provisions:

1. Provision of a minimum of 1 tree for every 80 square meters of plot area, applicable to plots larger than 100 square meters, and these trees should be planted within the plot's setback.

2. Compensatory plantation for trees that have been felled or transplanted, following a 1:3 ratio within the premises under consideration.

3. The choice of species for plantation on-site and along the road should adhere to Section 8 of the Urban Green Guidelines, 2014.

4. Unpaved areas should occupy at least 20% of the recreational open spaces.

For slums, the government can collaborate with institutions such as banks, schools, colleges, and industries to facilitate the greening of these areas. This approach would involve more people in environmental awareness and shared responsibility. A recent example is the Uttar Pradesh government's initiative, where they have encouraged every government employee to plant a tree and nurture it. This represents a significant and positive step towards environmental conservation and increased engagement of individuals in such impactful activities. For plantings, the government should mandate the planting of more than 80% native species that offer food and shelter to birds and butterflies. These species have rapidly lost their habitats due to unplanned urbanization. Non-native and invasive plant species are unsuitable for birds, as they do not provide a safe environment for nesting. Even if nests are built on these plants, the survival rate of eggs and offspring is significantly lower. Therefore, we should prioritize planting species that are indigenous to a specific area. Additionally, the government can incorporate rainwater harvesting systems and mandate the installation of solar panels on rooftops as part of the regulations for new colonies. These measures align with green environmental practices and promote sustainability. Under the PM Avas Yojana, the government should make it compulsory for beneficiaries to plant a tree in front of their house. In cases where there is insufficient space or narrow surroundings, the government should encourage the beneficiary to plant a tree in a public park or designated space and ensure its protection. Moreover, in rural areas, farmers often cut down trees or prevent them from growing in their fields, citing concerns that plant shadows may hinder crop growth and lead to losses. The government should address this issue by making it compulsory for farmers with field sizes exceeding 5 beegha at one location to have a minimum of one native and non-invasive plant in their field. Alternatively, the government could incentivize this by offering rewards, a percentage reduction in electric bills, or discounts on fertilizer purchases. These measures would encourage other farmers to engage in plantation efforts in their fields. By implementing such regulations and standards, the government can ensure the presence of green spaces even in densely populated urban areas, fostering a healthier and more sustainable living environment while simultaneously addressing issues related to agriculture in rural areas.

Gourav Sharma, District Coordinator, Budaun, Bird Count India

हर घर के बाहर हो हरित स्थान

आवास और पर्यावरण का गहरा नाता है। वर्तमान की समस्त समस्याओं के मूल में पर्यावरण असंतुलन व प्रदूषण है। हमारी प्राथमिक मूल आवश्यकता है शुद्ध हवा पानी पोषण तो द्वितीय है रोटी कपड़ा और मकान यही हमें पहला सुख निरोगी काया प्रदान करते हैं। हम हमारे स्वास्थ्य व सुख के लिए भवन निर्माण करवाते हैं। शहरों में बढ़ती आबादी के कारण कॉलोनी का विकास हुआ किंतु वह भूखण्डों की बढ़ती कीमतों के कारण पार्क स्थल की कमी व घरों के बाहर  हरित स्थान की कमी हो गई। कालोनाइजर द्वारा प्रस्तावित नशे में छोड़ें खुले स्थान पर भी निर्माण कार्य करवा लिया गया जिसके कारण खुला स्थान पर नहीं बचा वायु संचार धूप की कमी के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हुई । आजकल मकान भी वास्तु अनुसार निर्माण होने लगे हैं जो मनोवैज्ञानिक रूप से स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत करते हैं। कतिपय कारणों से गाय  रखना शहर में संभव नहीं है किंतु पेड़ों का आवास में पर्याप्त स्थान दिया जा सकता है 10% भूखंड पर पेड़ पौधों के लिए स्थान दिया जाना चाहिए एवं कॉलोनी के निर्माण के समय पर्याप्त पार्क स्थान एवं प्रत्येक घर के सामने एक हरित स्थान इसमें पेड़ पौधे लगाने आवश्यक हो छोड़ा जाना चाहिए । प्रत्येक मकान के सामने 5 फीट स्थान खुला होना चाहिए जिसमें प्रत्येक 10 फीट पर एक वृक्ष अनिवार्य रूप से हो जिससे कालोनी में एक हरित कारीडोर विकसित हो सकेगा । जिसका भविष्य में छांयादार फुटपाथ के रूप में उपयोग किया जा सकता है। हरित स्थान में छांयादार, शोभाकारी,फल, फूलदार पौधे लगाए जाने चाहिए। जिसमें अशोक, गुलमोहर, आम, अमरुद, नींबू, मीठानीम, सहजन,कनेर, चांदनी,रातरानी जैसे वृक्षों को स्थान दिया जा सकता है।  साथ ही सभी मकानों में वर्षा जल संग्रहण इकाई भी अनिवार्य होना चाहिए जिससे कालोनी में भू-जल स्तर बना रहेगा। इस प्रकार प्रत्येक परिवार शुद्ध वायु के साथ प्राकृतिक वातानुकूलित परिसर में स्वस्थ रह सकेगा। किन्तु मानवीय लालच प्रवृत्ति के कारण यह स्वैच्छिक होना मुश्किल है। हरित स्थान पर अतिक्रमण न हो इसके लिए स्थानीय प्रशासन को सख्त नियम के साथ पेड़ काटने के समान दण्डनीय अपराध घोषित करना चाहिए व सख्ती से लागू करवाना चाहिए। -दशरथ नन्दन पाण्डेय, दशरथ नन्दन पाण्डेय, सेवानिवृत्त ग्रा.कृषि वि.अधिकारी, सुवासरा जिला मन्दसौर मप्र, व राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारत मिशन किसौ करोड़ वृक्ष, पर्यावरण दूत फाउण्डेशन, ग्वालियर

पिछले कुछ दशकों में जैसे जैसे मानव जनसंख्या बढ़ी है, वैसे वैसे हरियाली घटी है। आज देश की एक तिहाई से अधिक आबादी शहरों में रह रही है जहां जगह कम हैं और लोग ज्यादा। शहरों में हरियाली भी कम होती जा रही है अतः प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार लोगों के स्वास्थ्य के लिए यह आवश्यक है कि प्रतिव्यक्ति के हिसाब से कम से कम 9 वर्गमीटर का खुला स्थान होना चाहिए जिसमें हरियाली हो। जर्मनी, जापान व अन्य देशों के विशेषज्ञों के अनुसार कार्बन डाइऑक्साइड और ऑक्सीजन के बीच बेहतर संतुलन के लिए प्रति व्यक्ति 40 वर्गमीटर घनी हरियाली व 140 वर्गमीटर झाड़ियों वाला जंगली इलाका होना चाहिए। साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार लोगों के स्वास्थ्य के लिए यह भी जरूरी है कि लोग इस प्रकार के हरियाली वाले जगह पर रहें जहां उन्हें घर में दाखिल होने से पूर्व कम से कम 15 मिनट पैदल चलना पड़े। शहरों में एक न्यूनतम हरित स्थान प्रदूषण को घटाने, वर्षा जल से भूजल को रीचार्ज करने, शहरी जैवविविधता को बचाने, तापमान को कम करने, स्वच्छ हवा प्रदान करने, लोगों के उचित मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है। इसलिए शासन को शहरी नक्शों में एक नियत हरित स्थान रखने को अनिवार्य करने की आवश्यकता है। साथ ही भारत सरकार के नगर विकास मंत्रालय के अंतर्गत "अर्बन ग्रीनिंग गाइडलाइन्स, 2014" को भी लागू करवाने की जरूरत है। इस गाइडलाइन में नगर निकायों व विकास प्राधिकरणों के लिए भी आवश्यक नियम तय किए गए हैं ताकि अनावश्यक कंक्रीट को रोका जा सके व हरियाली को अधिकाधिक बढ़ाया जा सके। लेकिन ऐसा देखा जाता है कि अधिकांश जगह इन गाइडलाइन्स का पालन ही नहीं होता। आज विकास के नाम पर हर जगह इंटरलॉकिंग टाइल्स लगाई जा रही हैं जिससे न सिर्फ हरियाली खत्म होती है बल्कि वर्षा जल जमीन के भीतर नहीं जा पाता व शहरों का तापमान बढ़ता जा रहा है जिसको रोकने के लिए उक्त गाइडलाइन्स व NGT के एक मामले साहिल गर्ग बनाम पंजाब राज्य में सड़कों के किनारे व अन्य स्थानों पर अतरिक्त टाइल न लगाने, जरूरत होने पर छिद्र वाली टाइल लगाने, सड़कों के किनारे ग्रीन बेल्ट विकसित करने, पेड़ों की वृद्धि के लिए उनकी जड़ों के किनारे पर्याप्त कच्चा स्थान छोड़ने का आदेश दिया गया था। आईआईटी खड़गपुर की एक स्टडी में यह पता लगा है कि भारत में अर्बन हीट आइलैंड तेजी से बढ़ रहा है जिससे शहर अब रहने लायक नहीं बच रहे। इससे बचने के लिए न सिर्फ नगर निकायों के लिए बल्कि सभी घरों व हाउसिंग सोसायटी के लिए भी एक नियत न्यूनतम हरित स्थान रखने का अनिवार्य नियम बनाया जाना चाहिए और इन नियमों को सही ढंग से लागू करवाने व उसके उल्लंघन पर जुर्माना लगाने के लिए भी पर्याप्त इंतज़ाम सरकार को करना चाहिए। -अभिषेक दुबे, पर्यावरण एवं पशु सशक्तिकरण कार्यकर्ता, नेचर क्लब फाउंडेशन,उत्तर प्रदेश

Topic of the month: Do you think it is about time municipalities start taking responsibility of stray monkeys in urban areas like they do for stray cattle and street dogs? If so, what action should they take when given a distress call for the same? What do you think should be done to these monkeys that are neither wild nor accepted in the cities? You may send your views (either in Hindi or English) in 300 words at [email protected]. Please also attach a colour photo of yourself.

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