A First-Of-Its-Kind Magazine On Environment Which Is For Nature, Of Nature, By Us (RNI No.: UPBIL/2016/66220)

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TreeTake is a monthly bilingual colour magazine on environment that is fully committed to serving Mother Nature with well researched, interactive and engaging articles and lots of interesting info.

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घर में हर रोज जलाएं तेज-पत्ता
तेज पत्ता हर भारतीय रसोई में आपको आसानी से मिल जाएगा। तेज पत्ता जितना सब्जी का स्वाद बढ़ाता है उतना ही लाभकारी होती है इसकी सुंगध। कैसे? इसे जलाने से थकान तो दूर होती ही है साथ ही दिमाग भी शांत हो जाता है। तेज पत्ते को एक बर्तन में रखें फिर घर के किसी कोने में या किसी कमरे में जलाकर छोड़ दें। इसके बाद आपको खुद महसूस होगा कि तेज पत्ता जलाने से आपका घर तो महक ही रहा है साथ ही ये आपके तनाव को भी कम करने का काम करेगा। वैसे तेज पत्ते के धुएं को इम्यूेन सिस्टहम मजबूत करने वाला भी माना जाता है। तेज पत्ता घर के कॉकरोच भी भगाने का काम करता है। इसे जलाकर कमरे या रसोई के कोनों में रख दें। ऐसा करने से आपको खुद ही फर्क नजर आने लगेगा। ध्यान रखने योग्य बातः जब भी तेज पत्ता का कोई प्रयोग करें तो सिर्फ एक पत्ता जलाएं यानि एक बार में सिर्फ एक और घर के छोटे बच्चों से दूर हटकर जलाएं। तेज पत्ते का वैज्ञानिक नाम लॉरस नोबिलिस है। यह एक सुगंधित पत्ता है, जो लॉरस परिवार से संबंधित है। खाने और औषधि में इसका उपयोग 1 हजार वर्षों से किया जा रहा है। तेज पत्ते की 2400 से 2500 प्रजातियां हैं, जिसमें से अधिकतर पूर्वी एशिया, दक्षिण व उत्तरी अमेरिका और एशिया में पाई जाती हैं। इस पत्ते में टैनिन, फ्लेवोन, फ्लेवोनोइड्स, एल्कलॉइड्स, यूजेनॉल, लिनालूल और एंथोसायनिन शामिल हैं। प्रजाति के अनुसार सभी के रासायनिक घटक अलग-अलग हो सकते हैं। आमतौर पर मसाले, एसेंशियल ऑयल व पारंपरिक चिकित्सा में प्रयोग होने वाले इस पत्ते की दो प्रजातियां प्रयोग की जाती हैंः लॉरस एजोरिका और एल नोबिलिस। तेज पत्ता का उपयोग इसके सूखने के बाद ही होता है। इसके कई औषधीय गुण भी हैंः मधुमेह की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए तेज पत्ते का सेवन लाभकारी हो सकता है। एनसीबीआई (नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी) की वेबसाइट पर प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार तेज पत्ता युक्त कैप्सूल का सेवन इंसुलिन के स्तर में सुधार कर सकता है। इससे व्यक्ति के रक्त में ग्लूकोज की मात्रा घट सकती है। तेज पत्ता खाने के फायदे में खांसी, फ्लू, ब्रोंकाइटिस, अस्थमा व इन्फ्लूएंजा जैसी सांस से जुड़ी समस्याओं से राहत मिलना भी शामिल है। तेज पत्ते के अर्क में एंटीइंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं, इसलिए इसे सूजन कम करने में मददगार माना जा सकता है। इसमें एथनॉलिक एक्सट्रैक्ट और कुछ अन्य कंपाउंड पाए जाते हैं, जिसमें एंटीइंफ्लेमेटरी और दर्दनिवारक प्रभाव होता है। इनके कारण तेज पत्ता श्वसन तंत्र में आई सूजन और उससे पैदा होने वाली बीमारियों से बचाव कर सकता है। दांतों के लिए भी तेज पत्ता फायदेमंद हो सकता है। वैज्ञानिक अध्ययन कहते हैं कि इसकी टहनियों में कुछ वाष्पशील (सामान्य तापमान पर आसानी से भाप बनने वाले) तेल होते हैं, जो खून के बहाव को बेहतर कर सकते हैं। साथ ही इसमें विटामिन-सी जैसे टैनिन पाए जाते हैं, जो मसूड़ों के टिश्यू में कसाव लाकर उन्हें स्वस्थ बनाए रख सकते हैं। साथ ही तेज पत्ते से बनने वाली राख से मंजन करने से मसूड़े मजबूत हो सकते हैं। तेज पत्ता मुंह में बैक्टीरिया को पनपने से भी रोक सकता है। एनसीबीआई की वेबसाईट पर प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार तेज पत्ते का एसेंशियल ऑयल मुंह में पाए जाने वाले स्टैफिलोकॉकस ऑरियस नामक बैक्टीरिया के खिलाफ लड़ सकता है। यह कैंसर कोशिकाओं के विकास में बाधा उत्पन्न करता है। एनसीबीआई की ओर से उपलब्ध एक अध्ययन में इस बात की पुष्टि की गई है। इस अध्ययन में यह भी कहा गया है कि तेज पत्ता के गुण पेट के कैंसर से बचाव कर सकते हैं। एक अन्य अध्ययन के अनुसार, तेज पत्ते के अर्क में कैंसर रोधी प्रभाव पाया जाता है, जो स्तन कैंसर के विकास को बाधित कर सकता है। तेज पत्ते में मौजूद एंटीप्रोलिफेरेटिव (कोशिका प्रसार को रोकने वाले) और साइटोटॉक्सिक (कोशिकानाशक) गुण स्तन कैंसर को पनपने से रोक सकते हैं। इसलिए, कहा जा सकता है कि तेज पत्ता खाने के फायदे में कैंसर से बचाव शामिल है। दर्द व सूजन के लिए भी तेज पत्ते के फायदे बहुत हैं। एक ऑस्ट्रेलियाई अध्ययन में पाया गया है कि ये पत्तियां ब्व्ग्-2 नामक एंजाइम की गतिविधि को रोकने का काम कर सकती हैं। इस एंजाइम के कारण शरीर में सूजन बढ़ सकती है। इसके अलावा, इस पत्ते में मौजूद सिनेओल भी सूजन से लड़ने का काम कर सकता है। तेज पत्ता एंटीफंगल गुणों से भी समृद्ध होता है। यह विशेष रूप से कैंडिडा एल्बीकैंस नाम के यीस्ट संक्रमण के खिलाफ प्रभावी रूप से काम कर सकता है। इसलिए, त्वचा संबंधी फंगल संक्रमण के लिए तेज पत्ते का एसेंशियल ऑयल इस्तेमाल में लाया जा सकता है। इस बात की पुष्टि एनसीबीआई की साइट पर होती है। तेज पत्ता घाव को बेहतर रूप से भरने में मदद कर सकता है। यह किडनी की मांसपेशियों को सीधे आराम देने में कारगर हो सकता है। इसमें लॉरिक एसिड पाया जाता है, जो किडनी की समस्याओं से राहत दिला सकता है। एक शोध से इस बात की पुष्टि होती है कि तेज पत्ते से प्राप्त इथेनॉल अर्क कोलेस्ट्रॉल सीरम स्तर को कम करने में सहायक हो सकता है। कोलेस्ट्रॉल के नियंत्रित रहने से हृदय का स्वास्थ्य भी ठीक रहता है। बालों के लिए आप एक कप पानी में कुछ तेज पत्ते उबालें और 15 मिनट के बाद पानी से पत्तों को निकाल लें। ठंडा होने पर पानी को शैंपू के बाद बालों और स्कैल्प पर लगाएं। बेहतर परिणाम के लिए एक दिन छोड़कर आप यह उपाय कर सकते हैं। दर्द और सूजन से राहत पाने के लिए तेज पत्ते के तेल का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए आप इसके तेल की कुछ बूंदें प्रभावित जगह पर लगाएं और हल्के हाथों से मालिश करें। सर्दी-जुकाम और पाचन जैसी समस्या के लिए तेज पत्ते को उबालकर इसका पानी पिया जा सकता है। ताजे तेज पत्तों को एक सीलबंद जिप प्लास्टिक बैग में बंद करके फ्रिज में एक-दो हफ्ते तक स्टोर करके रखा जा सकता है। वहीं, सूखे हुए तेज पत्ते को सूखे व एयर टाइट डिब्बे में स्टोर करें। तेज पत्ते को कभी खुले में नहीं रखना चाहिए, क्योंकि खुले में इनकी खुशबू जल्दी कम हो जाती है। तेज पत्ते के लाभ आप जान चुके हैं, लेकिन अधिक मात्रा में इसका सेवन दुष्प्रभाव का कारण भी बन सकता है, जैसेः गर्भावस्था के दौरान इसका सेवन करने से पहले अपने डॉक्टर से जरूर पूछ लें। यह मसाला खून में शुगर की उपस्थिति को प्रभावित कर सकता है। इसलिए, मधुमेह के रोगी इसका सेवन डॉक्टर की सलाह पर ही करें। ये पत्तियां एनेस्थीसिया की दवाओं के साथ रिएक्शन करके केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को धीमा कर सकती है। इसलिए सर्जरी से कम से कम 2 सप्ताह पहले इनका सेवन रोक देना सही निर्णय साबित हो सकता है। तेज पत्ता के नुकसान में एलर्जी भी शामिल है। तेज पत्ते से बनाया गया एसेंशियल ऑयल संवेदनशील त्वचा पर एलर्जी का कारण बन सकता है।
अद्भुत जीव चींटी की जीवनचर्या
साहस, एकता, दृढ़ता, निरंतरता, धैर्य, मेहनत जैसे शब्दों की जब बात की जाती है, तो हमारे जहन में चींटी का नाम आना स्वभाविक है। चींटियां समूह में रहकर जीवन-यापन करती हैं, जो समाज के लिए सामुहिकता का एक प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। भले ही हम केवल लाल और काली चींटी के बारे में ही जानते हों लेकिन दुनियाभर में चींटियों की करीब 12,000 प्रजातियां मौजूद हैं जिनमें से कुछ ही मानव के लिए हानिकारक होती हैं। क्या आपको पता है की चीटियां जिंदगी भर कभी सोती नहीं है। चींटियों के कान नही होते है लेकिन वो जमीन के कम्पन से महसूस करती है। सामान्यतः चीटियों को तीन समूह में बांटा गया है, जिनमें प्रमुखतः मादाएं ही होती हैंः रानी चींटी का एकमात्र कार्य अण्डे देना है। ये नये समूह का निर्माण करती हैं। वे अपने साथी को अपने पंखों के माध्यम से ढूंढती हैं। ये सन्तानोत्पत्ति तथा उनकी देखरेख के अतिरिक्त अन्य कोई कार्य नहीं करती। इनके लार्वा होने के समय पर अधिक खिलाया जाता है, जिस कारण यह कार्य करने वाली चींटियों से अधिक बड़ी होती हैं। तथा यह समूह के मुखिया की भूमिका निभाती हैं। पंख रहित श्रमिक चींटी मादा चींटियां सन्तानोत्पत्ति के अतिरिक्त अन्य सभी कार्य करती हैं जैसे सम्पूर्ण समूह के लिए भोजन एकत्रित करना, घर बनाना तथा बच्चों की देखरेख करना आदि। इन चींटियों के लार्वा होने के समय पर रानी चींटी की अपेक्षा इन्हें कम भोजन दिया जाता है। ये चींटियां कठोर परिश्रम का प्रत्यक्ष उदाहरण होती हैं। रानी चींटी को ढूंढने के लिए नर चींटी के पास पंख होते हैं। इनका एकमात्र कार्य रानी चींटी से मिलना होता है। इनसे मिलने के पश्चात इनकी मृत्यु हो जाती है। इन्हें ड्रोन कहा जाता है। चींटिंयो का समूह तीस वर्ष तक बना रह सकता है, यह उनकी रानी चींटी की उम्र पर निर्भर करता है। रानी चींटी के मरने के बाद चींटियों की कॉलोनी के लिए जीवित रहना बहुत मुश्किल हो जाता है और वो केवल कुछ महीने तक ही जीवित रह पाती हैं। चींटिंयों की आबादी इनकी प्रजातियों पर निर्भर करती है। फायर एन्ट चींटिंयों की आबादी बढ़ई चींटियों की अपेक्षा अधिक होती है। फायर एंट बढ़ई चींटियों की तुलना में अधिक नुकसानदेह भी होती हैं। चीटियों के शरीर से फेरोमोन नामक हार्मोन स्त्रावित होता है, जो इनको एक दूसरे से जोड़ने तथा भोजन एकत्रित करने में सहायता करता है। इसी हार्मोन की सुगंध इनके लिए संकेत का कार्य करती है, जिसकी सहायता से ये भोजन की तलाश में कई दूर निकलने के बाद भी वापस अपने घर तक पहुंच जाती हैं। चींटियों के शरीर में फेफड़े नहीं होते हैं। ये अपने शरीर में स्थित छिद्रों के माध्यम से सांस लेती हैं, जो इन्हें पानी में भी सांस लेने में सहायता करते हैं। सबसे रोचक बात यह है कि चींटियां अपने शरीर के वजन से 10-50 गुना अधिक वजन उठा सकती हैं। साथ ही कुछ चींटियां क्षतिग्रस्त होने पर भी जीवित रह सकती हैं तथा कुछ भोजन पानी के बिना सप्ताह तक जीवित रह सकती हैं। चीटियाँ लाइन में क्यों चलती हैं? प्रत्येक कीट अपने ढंग से विचारों और समाचारों का आदान-प्रदान करते हैं. इसी तरह चींटियाँ भी अपने सहयोगियों तथा समूह से संपर्क बनाये रखने तथा भोजन आदि की सही सूचना देने के लिए रसायनों का उपयोग करती हैं। जब चीटीयॉ खाने की खोज में निकलती हैं तो सबसे आगे चलने वाली चीटी चलते समय फेरोमोंस नामक रसायन छोडती हैं जिससे उनके पीछे चलने वाली चीटियॉ उसी रसायन को सूंघ कर आगे बढती है और इस स्त्राव कि महक अधिक समय तक नहीं रहती हे इस लिए पीछे आने वाली चींटियाँ उस महक को ताजा बनाने के लिए स्त्राव लगाती हुई एक लाइन में चलती रहती हैं यही कारण है कि हमें चीटियॉ हमेशा लाइन में ही चलती हुई दिखाई देती हैं।
गाय के मूत्र के पीछे का विज्ञान
गाय का मूत्र स्वाद में गरम, कसैला और कड़क लगता है, जो कि विष नाशक, जीवाणु नाशक, शक्ती से भरा और जल्द ही पचने वाला होता है। इस बात का दावा किया गया है कि गर्भवती गाय का मूत्र सबसे अच्छा होता है क्योंकि उसमें विशेष हार्मोन और खनिज पाया जाता है। जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधान में सामने आया है कि गोमूत्र में 5600 तरह के तत्व होते हैं। एक अन्य अनुसंधान से पता चला है कि गाय के दूध में 5100 तत्व होते हैं। ये एक जैविक टोनिक के सामान है। यह शरीर-प्रणाली में औषधि के सामान काम करता है और अन्य औषधि की क्षमताओं को भी बढ़ाता है। आयुर्वेद के अलावा मॉडर्न मेडिकल साइंस में भी गौमूत्र पर की गई रिसर्च ने भी इसके हेल्थ बेनिफिट्स को साबित किया है। हालिया रिसर्च में गौमूत्र को कई सीरियस और जनरल बीमारियों के लिए फायदेमंद बताया गया है। आयुर्वेद में गौमूत्र का प्रयोग कई बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है। वैसे तो गौमूत्र अपने आप में एक दवा की तरह है। मगर इसमें कुछ और जड़ी बूटियां मिलाकर दी जाएं तो इसका असर कई गुना बढ़ जाता है। गोमूत्र में कार्बोलिक एसिड, यूरिया, फास्फेट, यूरिक एसिड, पोटैशियम और सोडियम होता है । जब गाय का दूध देने वाला महिना होता है, तब उसके मूत्र में लेक्टोजन रहता है, जो ह्दय और मस्तिष्क के विकारों के लिए फायदेमंद होता है। एक खास बात गोमूत्र हमेशा स्वस्थ देशी गाय का ही लिया जाना चाहिए और गोमूत्र को हमेशा निश्चित तापमान पर रखा जाना चाहिए न अधिक गर्म और न अधिक ठंडा। गोमूत्र का कितना सेवन करना चाहिए यह मौसम पर निर्भर है। इसकी प्रकृति कुछ गर्म होती है इसीलिए गर्मियों में इसकी मात्रा कम लेनी चाहिए। गोमूत्र के साइंटिफिक फायदों में लिखा है- “गौमूत्र में आयरन, कॉपर, नाइट्रोजन, सल्फर, मैगनीज, कार्बोलिक एसिड, एंजाइम्स, मिनरल्स, विटामिन जैसे ए, बी, सी, डी, ई, यूरिक एसिड, हॉर्मोन, गोल्ड एरिड आदि पाए जाते हैं। यह विषैले पदार्थों को शरीर से बाहर निकलाता है। इससे रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है और साथ ही यह एक संक्रमण रोधी की तरह काम करता है।”

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